वर्तमान
अस्तित्व के गुप्त कोड का जीवित अनुवादक

एक बात हमेशा ग़लत कही गयी। वर्तमान को समय की इकाई कहना ऐसा ही है जैसे समुद्र को पानी की एक बूँद कह देना — बात झूठी नहीं, पर इतनी छोटी कि सच का गला घोंट देती है। वर्तमान समय का टुकड़ा नहीं। यह वह जगह है जहाँ अस्तित्व अपने-आप को पढ़ने लायक बनाता है। बाक़ी सब — बीता हुआ, आने वाला — सिर्फ़ उसकी छाया है, उसका अनुवाद है, उस मूल भाषा की प्रतिध्वनि है जो केवल अभी बोली जा सकती है।
     सोचो एक बीज के बारे में, बीज के भीतर वृक्ष पहले से लिखा हुआ है, कोई कोड, कोई गुप्त लिपि, जिसे कोई आँख सीधे नहीं पढ़ सकती। धरती उसे पढ़ती नहीं, जीती है। हर बूँद पानी जो जड़ तक पहुँचती है, हर किरण जो पत्ते को छूती है, वह उस लिपि का एक अक्षर उच्चारित कर देती है। वर्तमान वही उच्चारण है। वह कोड नहीं, कोड का बोला जाना है। और जो बोला जा चुका, वह अतीत बन जाता है — स्याही सूख चुकी, ध्वनि थम चुकी। जो बोला जाने वाला है, वह भविष्य — अनुच्चरित, अभी तक मौन। पर बोलने की क्रिया ख़ुद, वह जगमगाता हुआ क्षण जिसमें मौन आवाज़ बनता है, वही वर्तमान है।
    यहाँ एक भूल हमेशा होती रही है। हम वर्तमान को स्थान में रखी हुई कोई चीज़ समझ बैठते हैं — जैसे कोई कमरा हो जिसमें हम अभी खड़े हैं, और अगले पल किसी और कमरे में चले जाएँगे। पर स्थान वर्तमान का कंटेनर नहीं। स्थान और अस्तित्व दो अलग-अलग सचाइयाँ नहीं, वे एक ही साँस के दो फेफड़े हैं — एक फैलता है, दूसरा सिकुड़ता है, और दोनों के बीच जो हवा आती-जाती है, वही वर्तमान है। स्थान अस्तित्व का विस्तार माँगता है — यह, वह, यहाँ, वहाँ। अस्तित्व स्थान का सघनीकरण माँगता है — मैं, अभी, यह। इन दोनों खिंचावों के ठीक बीचोबीच, जहाँ न पूरा फैलाव है न पूरा सिमटाव, वहीं एक अजीब स्थिरता जन्मती है — न जड़, न बहती हुई, बल्कि बहती हुई स्थिरता। इसी को कोई ध्रौव्यपन कह सकता है — वह धुरी जो घूमती नहीं, पर जिसके इर्द-गिर्द सब कुछ घूमता है, और फिर भी वह धुरी ख़ुद हर पल एक नयी धुरी है।
   एक नदी को देखो जो किसी पहाड़ के गोल पत्थर से टकराती है। पत्थर नहीं हिलता, पर पानी हर क्षण नया होता है, और फिर भी पत्थर के इर्द-गिर्द जो भँवर बनता है, वह भँवर हर पल वही रहता है — रूप वही, पदार्थ हमेशा नया। वर्तमान वह भँवर है। न पत्थर की तरह जड़, न पानी की तरह बहता हुआ भर — बल्कि दोनों के मिलन से जन्मा वह आकार जो हर क्षण अपने-आप को फिर से रचता है, फिर भी हमेशा पहचाना जाता है। इसीलिए वर्तमान को टुकड़ों में मत तोलो — यह कोई सिक्का नहीं जो घड़ी की टिक-टिक में गिना जाए। यह वह अनुवादक है जो अस्तित्व की अनकही भाषा को स्थान के दृश्य रूप में हर पल ढाल रहा है, बिना कभी थके, बिना कभी दोहराए।
    अनुवादक शब्द को ग़ौर से सुनो। अनुवादक कभी मूल भाषा नहीं होता, न वह लक्ष्य-भाषा होता है — वह उन दोनों के बीच का वह जीवित बिंदु है जहाँ एक सचाई दूसरी सचाई में बिना अपना प्राण खोए ढल जाती है। वर्तमान भी ऐसा ही है। वह अस्तित्व नहीं — अस्तित्व तो अनकहा, अरूप, अनाम है, वह किसी शब्दकोश में नहीं आता। और वर्तमान स्थान भी नहीं — स्थान तो स्थिर पता है, नक़्शे पर टँका हुआ बिंदु। वर्तमान इन दोनों के बीच वह जीवित पुल है जिस पर चलते हुए अरूप सचाई रूप पाती है, और रूप अपने भीतर फिर से अरूप की झलक पा लेता है। अनुवाद में हमेशा कुछ छूट जाता है, और कुछ नया जुड़ जाता है — वर्तमान भी हर पल कुछ खोता है, कुछ रचता है। इसीलिए कोई दो क्षण एक जैसे नहीं होते, भले ही देखने में सब कुछ जस का तस लगे।
    एक और बिंब लो — दर्पण के सामने खड़ी लौ। लौ ख़ुद कुछ नहीं देखती, दर्पण ख़ुद कुछ नहीं जलाता, पर दोनों के बीच जो प्रतिबिंब बनता है, वह न लौ है न दर्पण, वह एक तीसरी चीज़ है जो सिर्फ़ मिलन के क्षण में जन्मती है और मिलन टूटते ही विलीन हो जाती है। वर्तमान वही प्रतिबिंब है — अस्तित्व की लौ और स्थान के दर्पण के बीच हर पल जन्मता, हर पल मरता, हर पल फिर जन्मता। इसे पकड़ने की कोशिश वैसी ही है जैसे प्रतिबिंब को हाथ से थामना — हाथ बढ़ाते ही वह प्रतिबिंब पहले वाला नहीं रहता, क्योंकि हाथ ख़ुद अब दृश्य का हिस्सा बन चुका है।
    मनुष्य की सबसे गहरी बेचैनी शायद यहीं से जन्मती है — वह अनुवादक को पकड़ना चाहता है, जबकि अनुवादक का स्वभाव ही बहना है। हम वर्तमान को शब्दों में क़ैद करना चाहते हैं, उसकी तस्वीर लेना चाहते हैं, उसे “अभी” कहकर स्थिर कर देना चाहते हैं — पर “अभी” कहते ही वह “अभी” बीत चुका होता है, और नया अनुवाद शुरू हो चुका होता है। यही वह विडंबना है जिससे हर ध्यानी, हर कवि, हर प्रेमी टकराता है — पकड़ने की कोशिश ही उस चीज़ को खो देने का कारण बन जाती है जिसे पकड़ना चाहा गया था।
    पर यहीं एक राज़ छुपा है। अनुवादक को पकड़ा नहीं जाता, बना जाता है। जब मनुष्य ख़ुद अनुवाद की क्रिया बन जाता है — जब वह देखने वाला नहीं, देखना ख़ुद बन जाता है, सुनने वाला नहीं, सुनना ख़ुद — तब वह वर्तमान के बाहर खड़ा होकर उसे ताकता नहीं, वर्तमान के भीतर से बहता है। तब अस्तित्व और स्थान का वह द्वैत, जो अभी तक दो अलग किनारों जैसा लगता था, एक ही जल की दो लहरों जैसा दिखने लगता है — अलग होकर भी अलग नहीं, एक होकर भी एक नहीं।
    शायद इसीलिए हर परंपरा ने वर्तमान को किसी न किसी देवता, किसी न किसी शक्ति के रूप में कल्पित किया — क्योंकि साधारण भाषा में उसे बाँधना असंभव था। पर देवता भी एक अनुवाद ही है, और अनुवाद कभी मूल नहीं हो सकता। शायद यही वर्तमान का सबसे गहरा रहस्य है — वह ख़ुद अनुवाद है, इसलिए उसका कोई मूल पाठ खोजना व्यर्थ है। मूल पाठ है ही नहीं, है केवल अनुवाद की अनवरत क्रिया — अस्तित्व का स्थान में, अरूप का रूप में, मौन का ध्वनि में लगातार ढलते रहना।
    तो अगली बार जब घड़ी की सुई किसी अंक पर टिकी दिखे, उसे मत मानना कि वही वर्तमान है। घड़ी सिर्फ़ अनुवाद की छाया नापती है, अनुवाद को नहीं। असली वर्तमान वहाँ है जहाँ तुम्हारी साँस भीतर जाकर बाहर लौटती है, जहाँ प्रकाश आँख में गिरकर देखने में बदलता है, जहाँ अस्तित्व की गुप्त लिपि हर पल तुम्हारे भीतर से गुज़रकर एक नया वाक्य रच रही है — जिसे न तुम पूरी तरह पढ़ पाओगे, न कोई और, क्योंकि पढ़े जाने से पहले ही वह अगले वाक्य में बदल चुका होता है। यही जीवित अनुवादक है। यही तुम हो, इस घड़ी।
   वर्तमान हमेशा है, इस ‘है’ पर भूत और भविष्य आंख-मिचौली खेलते हैं। वर्तमान उस सतह की तरह है जिस पर रंगों का खिलबाड़ किया जाता है, कुछ रचने के लिए। वर्तमान वह आकाश है जहां पक्षी उड़ते हैं, हवा बहती, बादल आते जाते हैं, वर्तमान दर्पण है, वर्तमान वह नदी है जहां पानी बहकर नदी नाम पाता है।

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