“जीवन कहीं और बह रहा है : व्याकरण के बाहर एक गुप्त भूगोल में” “जीवन कहीं और बह रहा है : व्याकरण के बाहर एक गुप्त भूगोल में” Read More »Blog
वर्तमानअस्तित्व के गुप्त कोड का जीवित अनुवादक वर्तमानअस्तित्व के गुप्त कोड का जीवित अनुवादक Read More »Blog
नाम में छिपी सत्ता — जीवन जब भाषा से गुज़रकर व्यवस्था बनता है नाम में छिपी सत्ता — जीवन जब भाषा से गुज़रकर व्यवस्था बनता है Read More »Blog
समाज की इंजीनियरिंग: जीवित संबंध से संस्थागत संबंध तक समाज की इंजीनियरिंग: जीवित संबंध से संस्थागत संबंध तक Read More »Blog
“अर्थ का अदृश्य व्याकरण : कविता और गणित में संबंध, संरचना और सत्य की एकात्मकता” “अर्थ का अदृश्य व्याकरण : कविता और गणित में संबंध, संरचना और सत्य की एकात्मकता” Read More »Blog
बीजों का गुप्त आवर्तनसोचकभी अकेली नहीं आती—वह अपने साथअर्थ की अनगिनत परछाइयाँ लाती है,जैसे कोई हवारेत के नीचे छिपे हुए कणों कोधीरे-धीरे जगा दे।अर्थ भीशांत नहीं रहता—वह सोच की तहों मेंअदृश्य बीज रख देता है,जो समय आने परअचानक फूट पड़ते हैं।कौन पहले है—यह प्रश्नदोनों के बीच टिक नहीं पाता।जैसेकोई लहर पूछेकि सागर कहाँ से शुरू होता है,और उत्तर मेंसागर खुद लहर बन जाए।सोचजब किसी अर्थ को छूती है,तो उसे खोलती नहीं—उसे बिखेर देती है,जैसे कोई हाथतारों की धूल कोआकाश में फैला दे।और उसी बिखराव मेंएक अजीब-सी व्यवस्था जन्म लेती है—बिना किसी नियम के,पर अपने आप संतुलित।अर्थजब सोच में उतरता है,तो उसे स्थिर नहीं करता—उसे हिला देता है,जैसे किसी गहरे जल मेंअचानक कोई पत्थर गिर जाए।और उस कंपन मेंनई दिशाएँ बनती हैं,जो पहले कहीं थीं ही नहीं।दोनोंएक-दूसरे कोपूरा नहीं करते—वे एक-दूसरे कोअधूरा बना देते हैं।और यही अधूरापनउनका सबसे गहरा संबंध है।सोचअर्थ के भीतरअराजकता के बीज बोती है—जो धीरे-धीरेसभी सीमाओं को ढीला कर देते हैं।अर्थसोच के भीतरव्यवस्था के बीज रखता है—जो बिखराव के बीचएक क्षणिक केंद्र बना देते हैं।पर कोई बीजअपनी जगह स्थिर नहीं रहता—हर अंकुरअपने ही आधार को बदल देता है।इसलिएन अराजकता स्थायी है,न व्यवस्था—दोनोंएक-दूसरे की छाया हैं,जो हर क्षणअपनी जगह बदलती रहती हैं।कभी सोचएक जंगल बन जाती है—जहाँ रास्ते खुद को खो देते हैं।कभी अर्थएक बिंदु बन जाता है—जहाँ सब कुछ सिमटकरएक क्षण को ठहर जाता है।फिर वही बिंदुटूट जाता है,और जंगलफिर से फैल जाता है।कोई आरंभ नहीं—कोई अंत नहीं—केवलबीजों का एक गुप्त आवर्तन,जहाँ हर गिरावटएक अंकुर है,और हर अंकुरएक नई गिरावट।सोच और अर्थ—दो नाम हैंएक ही अनकही प्रक्रिया के,जो खुद को रचती है,और उसी क्षणखुद को भंग भी कर देती है। बीजों का गुप्त आवर्तनसोचकभी अकेली नहीं आती—वह अपने साथअर्थ की अनगिनत परछाइयाँ लाती है,जैसे कोई हवारेत के नीचे छिपे हुए कणों कोधीरे-धीरे जगा दे।अर्थ भीशांत नहीं रहता—वह सोच की तहों मेंअदृश्य बीज रख देता है,जो समय आने परअचानक फूट पड़ते हैं।कौन पहले है—यह प्रश्नदोनों के बीच टिक नहीं पाता।जैसेकोई लहर पूछेकि सागर कहाँ से शुरू होता है,और उत्तर मेंसागर खुद लहर बन जाए।सोचजब किसी अर्थ को छूती है,तो उसे खोलती नहीं—उसे बिखेर देती है,जैसे कोई हाथतारों की धूल कोआकाश में फैला दे।और उसी बिखराव मेंएक अजीब-सी व्यवस्था जन्म लेती है—बिना किसी नियम के,पर अपने आप संतुलित।अर्थजब सोच में उतरता है,तो उसे स्थिर नहीं करता—उसे हिला देता है,जैसे किसी गहरे जल मेंअचानक कोई पत्थर गिर जाए।और उस कंपन मेंनई दिशाएँ बनती हैं,जो पहले कहीं थीं ही नहीं।दोनोंएक-दूसरे कोपूरा नहीं करते—वे एक-दूसरे कोअधूरा बना देते हैं।और यही अधूरापनउनका सबसे गहरा संबंध है।सोचअर्थ के भीतरअराजकता के बीज बोती है—जो धीरे-धीरेसभी सीमाओं को ढीला कर देते हैं।अर्थसोच के भीतरव्यवस्था के बीज रखता है—जो बिखराव के बीचएक क्षणिक केंद्र बना देते हैं।पर कोई बीजअपनी जगह स्थिर नहीं रहता—हर अंकुरअपने ही आधार को बदल देता है।इसलिएन अराजकता स्थायी है,न व्यवस्था—दोनोंएक-दूसरे की छाया हैं,जो हर क्षणअपनी जगह बदलती रहती हैं।कभी सोचएक जंगल बन जाती है—जहाँ रास्ते खुद को खो देते हैं।कभी अर्थएक बिंदु बन जाता है—जहाँ सब कुछ सिमटकरएक क्षण को ठहर जाता है।फिर वही बिंदुटूट जाता है,और जंगलफिर से फैल जाता है।कोई आरंभ नहीं—कोई अंत नहीं—केवलबीजों का एक गुप्त आवर्तन,जहाँ हर गिरावटएक अंकुर है,और हर अंकुरएक नई गिरावट।सोच और अर्थ—दो नाम हैंएक ही अनकही प्रक्रिया के,जो खुद को रचती है,और उसी क्षणखुद को भंग भी कर देती है। Read More »Blog
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