(भारतीय साहित्य और संस्कृति का अंतर्संबंध)
धरती के नीचे
जहाँ हल की नोक
सिर्फ मिट्टी नहीं काटती,
वहाँ समय
बीज की तरह पड़ा रहता है—
सदियों से भीगा हुआ,
अनकहा,
अनलिखा,
फिर भी जीवित।
भारतीयता
किसी झंडे का रंग नहीं,
वह उस बूढ़े किसान की हथेली है
जिसमें दरारें
सूखी नदियों की तरह फैली होती हैं,
और उन्हीं दरारों में
ऋग्वेद की पहली ध्वनि
अब भी राख बनकर गर्म रहती है।
यह देश
इतिहास की किताबों में कम,
रोटियाँ सेंकती स्त्रियों की उँगलियों में अधिक बचा है।
जब वे आटे पर पानी छिड़कती हैं,
तो लगता है
मानो सिंधु घाटी
फिर से अपनी पकी हुई ईंटों को
नमी दे रही हो।
भारतीय साहित्य
दरअसल
शब्दों का संग्रह नहीं—
वह उन आवाज़ों का कुआँ है
जिन्हें सभ्यताओं ने
बार-बार पत्थरों से ढँक दिया,
पर वे भीतर
जल की तरह बोलती रहीं।
कबीर
किसी पुस्तकालय में नहीं रहते,
वे अब भी
किसी बुनकर के करघे पर
धागों के बीच उलझे हैं।
जब चरखा घूमता है,
तो केवल सूत नहीं बनता—
समय अपने फटे हुए वस्त्र सिलता है।
तुलसीदास ने
राम को लिखा नहीं था,
उन्होंने
एक टूटती हुई सभ्यता के भीतर
करुणा का दीप रखा था,
जिससे अँधेरे में चलते लोग
अपनी ही आँखें पहचान सकें।
और मीरा—
वह स्त्री नहीं थी,
वह उस चुप्पी की दरार थी
जिससे होकर
स्त्री की आत्मा
पहली बार बाहर निकली थी
घुँघरुओं की आवाज़ में।
इस भूमि में
संस्कृति
मंदिरों की दीवारों पर कम,
पाँवों की धूल में अधिक लिखी गयी।
यात्राएँ यहाँ
सिर्फ दूरी नापने के लिए नहीं थीं—
वे आत्मा को
धीरे-धीरे मिट्टी में बदलने की साधना थीं।
काशी जाने वाला यात्री
दरअसल
अपने भीतर की मृत्यु तक जाता था।
और लौटता था
तो उसकी आँखों में
गंगा नहीं,
समय बहता था।
भारत में
नदियाँ जल से नहीं बहतीं,
वे स्मृतियों से बहती हैं।
गंगा में डुबकी लगाते हुए
मनुष्य केवल शरीर नहीं धोता,
वह अपने ऊपर चढ़े
हजारों वर्षों के भय उतारता है।
यहाँ पर्वत
पत्थरों के ढेर नहीं हैं।
हिमालय
एक मौन ऋषि है
जिसकी दाढ़ी में
बर्फ नहीं,
अनगिनत पीढ़ियों की थकी हुई प्रार्थनाएँ जमी हैं।
भारतीय साहित्य
बार-बार मिट्टी की ओर लौटता है,
क्योंकि उसे पता है—
मनुष्य का पहला अक्षर
धरती पर उगा था,
कागज़ पर नहीं।
एक आदिवासी स्त्री
जब जंगल में गीत गाती है,
तो वह सिर्फ गीत नहीं होता—
वह उन वृक्षों की भाषा होती है
जिन्हें मनुष्य ने अभी तक
पूरी तरह अनुवाद नहीं किया।
संस्कृति यहाँ
संग्रहालयों में बंद नहीं रहती,
वह बैलगाड़ियों के चरमराते पहियों में चलती है,
पसीने की गंध में रहती है,
मिट्टी के चूल्हों से उठते धुएँ में
आकाश पर अपनी लिपि लिखती है।
और देखो—
एक छोटा बच्चा
जब पहली बार
दादी से कोई कथा सुनता है,
तो केवल कहानी नहीं सुनता,
वह हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता की
धड़कन सुनता है।
भारत की सबसे बड़ी पुस्तक
कभी लिखी ही नहीं गयी।
वह
लोगों के व्यवहार में फैली हुई है।
किसी अतिथि के लिए
अचानक रख दिया गया पानी का गिलास,
थाली में बचाकर रखा गया आख़िरी कौर,
बरसात में अनजान आदमी को दी गयी छत—
यही वे पृष्ठ हैं
जिन पर संस्कृति
स्याही के बिना लिखी गयी।
यहाँ समय
सीधी रेखा में नहीं चलता।
वह पीपल के वृक्ष की तरह बढ़ता है—
जड़ों से फिर शाखाएँ,
शाखाओं से फिर जड़ें।
अतीत
यहाँ पीछे नहीं छूटता,
वह वर्तमान के भीतर
धीरे-धीरे साँस लेता रहता है।
इसलिए
जब कोई बूढ़ा आदमी
रामचरितमानस का दोहा गुनगुनाता है,
तो लगता है
जैसे किसी प्राचीन नगर का टूटा हुआ द्वार
अचानक खुल गया हो।
और जब कोई दलित कवि
अपने घावों को शब्द देता है,
तो भारतीय साहित्य
फिर से जन्म लेता है—
क्योंकि इस भूमि की असली परंपरा
मौन को आवाज़ देना है।
यह संस्कृति
सिर्फ उत्सवों की रोशनी नहीं,
वह उन अँधेरों की स्मृति भी है
जिनसे गुजरकर मनुष्य ने
दीप जलाना सीखा।
भारतीयता
एक साथ
संन्यासी की खामोशी भी है
और बाज़ार का शोर भी।
यह बुद्ध की आँखों का निर्वाण है,
तो लोकगीतों में रोती हुई विरहिणी भी।
यहाँ साहित्य
कभी केवल सौंदर्य नहीं रहा,
वह भूख का कटोरा भी रहा,
विद्रोह की मशाल भी,
और थके हुए मनुष्य के लिए
रात में रखा गया पानी भी।
धरती के भीतर
अब भी सोया हुआ है समय।
हर पुरानी ईंट के नीचे
एक सभ्यता की धड़कन दबी है।
हर लोकगीत के पीछे
किसी भूले हुए जनपद का आकाश छिपा है।
और शायद
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
कि वह कभी पूरी तरह दिखाई नहीं देती।
वह हमेशा
थोड़ी-सी मिट्टी के भीतर छिपी रहती है,
जैसे बीज
जो सदियों तक अंधेरे में पड़ा रहता है,
फिर अचानक
किसी ऋतु में
फूट पड़ता है
एक नए वृक्ष की तरह।
तभी
किसी कवि की पंक्ति में
अचानक
हल्दी, धुआँ, बारिश, वेद, करघा, चूल्हा, नदी, बांसुरी, राख, आँसू
सब एक साथ चमक उठते हैं—
और लगता है
मानो पूरी सभ्यता
फिर से साँस लेने लगी हो।
भारतीय साहित्य
दरअसल
भूमि के भीतर सोया हुआ वही समय है
जो हर पीढ़ी में
नई जड़ों की तलाश करता है।
और संस्कृति—
उसकी धीमी,
गहरी,
अनश्वर धड़कन।

