“प्रतिध्वनि के पार”

मनुष्य ने सबसे पहले
रोटी नहीं बनाई थी—
उसने अँधेरे में
दीवार पर एक आकृति बनाई थी।

क्योंकि भूख केवल शरीर में नहीं लगती,
एक भूख ऐसी भी होती है
जो अर्थ खा जाती है।


रोटी शरीर को बचाती है,
पर मनुष्य केवल शरीर होकर जीवित नहीं रह सकता।

यदि ऐसा होता
तो सबसे संतुष्ट प्राणी
गोदाम होते।

लेकिन इतिहास में
सबसे अधिक भूखे वे लोग थे
जिनके पास अनाज बहुत था
और आकाश नहीं।


कविता कोई शब्दों की सजावट नहीं।

वह चेतना की हड्डियों में फँसी हुई
कठोर “मैं” को धीरे-धीरे गलाने वाली
अदृश्य वर्षा है।

एक सच्ची कविता पढ़ते समय
मनुष्य समझता नहीं—
वह थोड़ा-सा टूटता है।

और उसी टूटन से
उसके भीतर
दूसरों के लिए जगह बनती है।


दर्शन इसलिए आवश्यक नहीं
कि वह उत्तर देता है।

दर्शन इसलिए आवश्यक है
क्योंकि वह उन दीवारों पर प्रश्न लिख देता है
जिन्हें हम सत्य समझकर जी रहे होते हैं।

वह पूछता है—

तुम जो “मैं” कहते हो
वह कहाँ है?

शरीर में?
स्मृति में?
भाषा में?
या उन मौनों में
जिन्हें तुम सुन नहीं पाते?


और संगीत—

संगीत शायद ब्रह्मांड की
सबसे पुरानी स्मृति है।

वह अर्थ से पहले पैदा हुआ था।

जब कोई भाषा नहीं थी,
तब भी वर्षा की एक लय थी,
समुद्र की एक धड़कन,
तारों का एक मौन कंपन।

संगीत उसी आदिम कंपन की
मानवीय प्रतिध्वनि है।

इसीलिए
एक धुन सुनकर
कभी-कभी आँखें भर आती हैं
बिना यह जाने
कि दुख किस बात का है।


क्योंकि संगीत
घटना नहीं सुनाता—
वह हमें हमारे खोए हुए विस्तार की याद दिलाता है।

वह बताता है
कि हम केवल नाम, पेशा, शरीर, इतिहास नहीं हैं।

हम किसी बहुत बड़े मौन के
क्षणिक स्वर हैं।


कला मनुष्य को उपयोगिता से बाहर ले जाती है।

और उपयोगिता से बाहर जाना
सबसे खतरनाक स्वतंत्रता है।

क्योंकि वहाँ
मनुष्य मशीन नहीं रह जाता।

वह रुककर
एक पत्ती को देखता है,
एक बूढ़े चेहरे में समय पढ़ता है,
एक बच्चे की हँसी में
ब्रह्मांड का पहला प्रकाश सुन लेता है।


सभ्यताएँ तब मरती हैं
जब उनके पास रोटी तो बची रहती है
पर विस्मय मर जाता है।

जब कविता को अनुपयोगी कहा जाने लगता है,
जब संगीत केवल मनोरंजन रह जाता है,
जब दर्शन को बेकार प्रश्न मान लिया जाता है—

तब मनुष्य धीरे-धीरे
अपने ही बनाए हुए यंत्रों के भीतर
कैद होने लगता है।


क्योंकि उपयोगिता
जीवन को चलाती है,
पर अर्थ नहीं देती।

अर्थ हमेशा
उन चीज़ों से जन्म लेता है
जिनका कोई बाज़ार-मूल्य नहीं होता—

एक अधूरी धुन,
एक अनुत्तरित प्रश्न,
एक चित्र में छिपा हुआ मौन,
या किसी अजनबी के दुःख पर
अचानक भर आई आँखें।


शायद इसी कारण
ब्रह्मांड ने मनुष्य को केवल बुद्धि नहीं दी—
विस्मय भी दिया।

ताकि वह केवल जीवित न रहे,
बल्कि कभी-कभी
सितारों की ओर देखकर
अपनी सीमाओं से बाहर गिर सके।

और उस क्षण—

क्षणभर के लिए ही सही—

उसे याद आ जाए
कि वह पृथ्वी पर चलता हुआ शरीर नहीं,
अनंत की प्रतिध्वनि है।

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