भेड़-बकरियाँ और शैक्षणिक व्यवस्था : विद्यार्थी, आयोजन और शिक्षा के बीच द्वंद्व
शैक्षणिक संस्था की कल्पना करते समय हमारे सामने सामान्यतः एक ऐसा परिसर उभरता है जहाँ ज्ञान का निर्माण होता है, प्रश्न पूछे जाते हैं, अध्यापक और विद्यार्थी संवाद करते हैं, पुस्तकें पढ़ी जाती हैं, विचारों पर बहस होती है और मनुष्य अपने भीतर की बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करता है। विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय मूलतः इसी अर्थ में ‘शैक्षणिक’ संस्थाएँ हैं। उनका पहला दायित्व विद्यार्थी को किसी आयोजन का सहभागी बनाना नहीं, बल्कि उसे सीखने, सोचने, समझने और अपने विवेक का विकास करने का अवसर देना है।
लेकिन वर्तमान उच्च शिक्षा व्यवस्था को देखते हुए एक असुविधाजनक प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या हमारी शैक्षणिक संस्थाओं में विद्यार्थी वास्तव में शिक्षार्थी के रूप में केंद्र में है, या वह धीरे-धीरे संस्थागत गतिविधियों का एक संसाधन बनता जा रहा है?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति, किसी विभाग या किसी विशेष संस्था पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह उससे कहीं अधिक व्यापक प्रश्न है। यह उस संस्थागत संस्कृति से संबंधित है जिसमें शैक्षणिक गतिविधियों के अतिरिक्त कार्यक्रमों, अभियानों, समारोहों, प्रतियोगिताओं, जागरूकता अभियानों, रैलियों, कार्यशालाओं, उद्घाटनों, निरीक्षणों, उत्सवों और विभिन्न प्रकार की औपचारिक गतिविधियों का विस्तार लगातार होता जा रहा है। इनमें से बहुत-सी गतिविधियाँ अपने आप में उपयोगी भी हो सकती हैं। समस्या किसी एक कार्यक्रम के होने में नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब कार्यक्रम शिक्षा पर भारी पड़ने लगें।
यहीं ‘भेड़-बकरियों’ का रूपक असहज होते हुए भी विचारणीय हो जाता है।
भेड़-बकरियों का एक झुंड अपनी दिशा स्वयं निर्धारित नहीं करता। उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। उसकी उपयोगिता उसके अपने निर्णय में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की आवश्यकता में निर्धारित होती है जो उसे संचालित करती है। विद्यार्थी निश्चित रूप से भेड़-बकरियाँ नहीं हैं; वे चेतन, जिज्ञासु और स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले मनुष्य हैं। इसलिए इस रूपक का उद्देश्य विद्यार्थियों को छोटा करना नहीं, बल्कि उस संस्थागत प्रवृत्ति की ओर संकेत करना है जिसमें विद्यार्थियों की उपस्थिति को उनकी शिक्षा से अधिक किसी आयोजन की संख्या, दृश्यता, सहभागिता या सफलता के लिए उपयोगी माना जाने लगता है।
जब किसी कार्यक्रम में विद्यार्थियों की बड़ी संख्या उपस्थित हो जाती है, तो आयोजन सफल मान लिया जाता है। मंच पर भीड़ है, सभागार भरा हुआ है, तस्वीरें हैं, प्रमाणपत्र हैं, रिपोर्ट है और गतिविधि पूरी हो गई है। लेकिन एक प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है—उस समय विद्यार्थी ने वास्तव में सीखा क्या?
यह प्रश्न असुविधाजनक इसलिए है क्योंकि किसी कार्यक्रम की दृश्य सफलता को मापना आसान है, जबकि उसके शैक्षणिक प्रभाव को मापना कठिन।
कितने विद्यार्थी आए—गिनना आसान है।
कितने विद्यार्थियों ने कुछ नया समझा—मापना कठिन है।
कितने विद्यार्थियों ने कोई प्रश्न विकसित किया—और कठिन।
कितने विद्यार्थियों के विचार में स्थायी परिवर्तन आया—और भी कठिन।
शायद इसी कारण संस्थागत व्यवस्था अनजाने में उन गतिविधियों की ओर अधिक आकर्षित होती है जिनका परिणाम दिखाई देता है। उपस्थिति दिखाई देती है, मंच दिखाई देता है, बैनर दिखाई देता है, तस्वीर दिखाई देती है, समाचार बनता है। कक्षा में बैठकर किसी कठिन अवधारणा को समझने वाला विद्यार्थी दिखाई तो देता है, लेकिन उसका सीखना किसी फोटो में दर्ज नहीं होता।
यहीं शिक्षा और प्रदर्शन के बीच एक महीन दूरी पैदा होती है।
जो दिखाई देता है, वह संस्थागत रूप से अधिक मूल्यवान समझ लिया जाता है; जो वास्तव में सीखने में घटित होता है, वह अदृश्य रह जाता है।
यहाँ समस्या गैर-शैक्षणिक गतिविधियों के अस्तित्व में नहीं है। किसी भी स्वस्थ शैक्षणिक परिसर में सांस्कृतिक, सामाजिक, खेल, साहित्यिक, सामुदायिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का अपना महत्व है। विद्यार्थी केवल पुस्तकीय ज्ञान से पूर्ण मनुष्य नहीं बनता। उसे कला चाहिए, खेल चाहिए, सामाजिक अनुभव चाहिए, संवाद चाहिए, नेतृत्व चाहिए और समाज के साथ संपर्क भी चाहिए।
लेकिन सह-पाठ्यक्रम और शिक्षा-विरोधी गतिविधि में अंतर है।
यदि कोई गतिविधि विद्यार्थी की समझ को विस्तृत करती है, उसके व्यक्तित्व को विकसित करती है, किसी विषय से जोड़ती है या उसे किसी वास्तविक सामाजिक अनुभव से परिचित कराती है, तो वह शैक्षणिक प्रक्रिया का विस्तार हो सकती है। लेकिन यदि विद्यार्थी को केवल इसलिए किसी कार्यक्रम में बैठाया जाता है कि सभागार भरा हुआ दिखाई दे, उपस्थिति पूरी हो, आयोजन की तस्वीर अच्छी आए या रिपोर्ट में संख्या प्रभावशाली दिखाई दे, तो वहाँ विद्यार्थी की शैक्षणिक गरिमा का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
विद्यार्थी किसी कार्यक्रम की ‘मानव-संपदा’ नहीं है।
वह शिक्षा का उद्देश्य है।
यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की दिशा इसी अंतर से तय होती है।
किसी विद्यार्थी के समय को हम कितना मूल्य देते हैं, इससे भी शिक्षा के प्रति हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट होता है। एक विद्यार्थी को एक घंटे की कक्षा से हटाकर किसी ऐसे कार्यक्रम में बैठाया गया जिसका उसके अध्ययन से कोई प्रत्यक्ष या सार्थक संबंध नहीं है, तो हमने केवल एक घंटा नहीं लिया; हमने उसके सीखने के समय का एक हिस्सा ले लिया। यदि ऐसा बार-बार होता है, तो उसका संचयी प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।
मान लीजिए प्रतिदिन केवल एक घंटा किसी ऐसी गतिविधि में चला जाता है जिसका विद्यार्थी के विषय-अध्ययन से कोई संबंध नहीं है। एक दिन का एक घंटा नगण्य लग सकता है। लेकिन महीने और पूरे सत्र में यही समय कई घंटों में बदल जाता है। शिक्षा में समय केवल घड़ी की इकाई नहीं है। समय ही सीखने की वास्तविक पूँजी है।
एक अध्याय पढ़ने में समय लगता है।
एक कठिन अवधारणा समझने में समय लगता है।
किसी पुस्तक के साथ बैठने में समय लगता है।
लिखने, सोचने और गलती करने में समय लगता है।
और सबसे महत्वपूर्ण—कुछ न करने, चुपचाप सोचने और अपने भीतर प्रश्न पैदा होने देने में भी समय लगता है।
यदि शैक्षणिक संस्था विद्यार्थी का लगभग पूरा समय निर्धारित गतिविधियों से भर दे, तो उसके पास स्वयं सीखने का समय कहाँ बचेगा?
यहीं वर्तमान शैक्षणिक संस्कृति का एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है। हम विद्यार्थी को ‘सक्रिय’ बनाना चाहते हैं, लेकिन कभी-कभी उसकी सक्रियता का अर्थ केवल यह मान लेते हैं कि वह किसी कार्यक्रम में उपस्थित हो, किसी गतिविधि में भाग ले, कोई फॉर्म भरे, किसी अभियान में शामिल हो, किसी समारोह में बैठे या किसी आयोजन की संख्या बढ़ाए।
लेकिन व्यस्त विद्यार्थी और शिक्षित विद्यार्थी एक ही चीज नहीं हैं।
एक विद्यार्थी पूरे दिन व्यस्त रह सकता है और फिर भी कुछ महत्वपूर्ण न सीख पाए। दूसरी ओर कोई विद्यार्थी घंटों पुस्तकालय में बैठकर केवल एक प्रश्न पर विचार कर सकता है और उसकी बौद्धिक यात्रा उस पूरे दिन के किसी बड़े आयोजन से अधिक मूल्यवान हो सकती है।
शिक्षा की समस्या तब शुरू होती है जब ‘व्यस्तता’ को ‘शिक्षा’ का पर्याय मान लिया जाता है।
इस संदर्भ में एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है—विद्यार्थी की सहमति।
हम अक्सर मान लेते हैं कि विद्यार्थी युवा है, इसलिए उसे जहाँ भेजा जाए, वह चला जाएगा। जहाँ बैठाया जाए, बैठ जाएगा। जिस कार्यक्रम में बुलाया जाए, उपस्थित हो जाएगा। कई बार यह भी मान लिया जाता है कि विद्यार्थी की उपस्थिति स्वयं उसके हित में है, इसलिए उससे पूछने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन लोकतांत्रिक और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का मूल विचार इससे आगे जाता है। विद्यार्थी को केवल निर्देश ग्रहण करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि शैक्षणिक निर्णयों का सहभागी माना जाना चाहिए।
उसे यह समझने का अधिकार होना चाहिए कि किसी गतिविधि का उसके अध्ययन से क्या संबंध है। उसे यह भी समझना चाहिए कि उसका समय किस उद्देश्य से उपयोग किया जा रहा है। और जहाँ संभव हो, उसकी स्वैच्छिक भागीदारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यहाँ शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक केवल कार्यक्रमों को संचालित करने वाला व्यक्ति नहीं है। उसका मूल दायित्व विद्यार्थी और ज्ञान के बीच एक जीवंत संबंध स्थापित करना है। यदि शिक्षक स्वयं लगातार प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में उलझा रहेगा, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण संसाधन—उसका बौद्धिक समय—कहाँ बचेगा?
इसलिए यह प्रश्न केवल विद्यार्थियों का नहीं है। गैर-शैक्षणिक गतिविधियों की अधिकता शिक्षक को भी उसके मूल शैक्षणिक दायित्व से दूर कर सकती है।
कक्षा का समय कम होता है, पाठ्यक्रम पीछे रह जाता है, अध्ययन-सामग्री तैयार करने का समय घटता है, शोध प्रभावित होता है और अंततः शिक्षण की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे सूक्ष्म परिवर्तन शायद यह होता है कि संस्था धीरे-धीरे ‘शिक्षा’ से ‘गतिविधि’ की ओर खिसकने लगती है।
शिक्षा पूछती है—
क्या विद्यार्थी ने समझा?
गतिविधि पूछती है—
क्या कार्यक्रम हुआ?
शिक्षा पूछती है—
क्या विद्यार्थी ने प्रश्न किया?
गतिविधि पूछती है—
कितने विद्यार्थी उपस्थित थे?
शिक्षा पूछती है—
क्या उसके सोचने का ढंग बदला?
गतिविधि पूछती है—
क्या रिपोर्ट तैयार हुई?
इन दोनों के बीच अंतर को समझना आज उच्च शिक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
किसी संस्था का सक्रिय होना अच्छी बात है, लेकिन अतिसक्रिय संस्था आवश्यक रूप से अच्छी शैक्षणिक संस्था नहीं होती।
कभी-कभी संस्था इतनी अधिक गतिविधियाँ करने लगती है कि गतिविधियाँ ही उसकी पहचान बन जाती हैं। हर दिन कोई कार्यक्रम, हर सप्ताह कोई आयोजन, हर महीने कोई अभियान। कैलेंडर भरा हुआ है, लेकिन कक्षा का समय सिकुड़ रहा है। परिसर जीवंत दिखाई देता है, लेकिन विद्यार्थी के पास पुस्तक खोलकर बैठने का समय कम होता जा रहा है।
यहीं ‘कार्यक्रम’ और ‘शिक्षा’ के बीच का द्वंद्व सामने आता है।
कार्यक्रम बुरा नहीं है।
समस्या तब है जब कार्यक्रम शिक्षा का साधन न रहकर स्वयं शिक्षा का विकल्प बनने लगे।
शायद हमें प्रत्येक गतिविधि से पहले एक सरल लेकिन कठोर प्रश्न पूछना चाहिए—
यह विद्यार्थी के सीखने में क्या जोड़ती है?
यदि उत्तर स्पष्ट है, तो गतिविधि का औचित्य है।
यदि उत्तर है कि इससे संस्था की दृश्यता बढ़ेगी, रिपोर्ट बनेगी, संख्या दिखाई देगी या कोई औपचारिक लक्ष्य पूरा होगा, तो फिर यह पूछना चाहिए कि इसमें विद्यार्थी की वास्तविक शैक्षणिक भूमिका क्या है।
यही प्रश्न संस्थागत आत्मनिरीक्षण का आधार बन सकता है।
हमें विद्यार्थियों को कार्यक्रमों की भीड़ में नहीं, शिक्षा के केंद्र में वापस लाना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि परिसर को नीरस बना दिया जाए या सभी सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियाँ बंद कर दी जाएँ। इसका अर्थ केवल इतना है कि हर गतिविधि को शिक्षा के बड़े उद्देश्य से अपना संबंध सिद्ध करना होगा।
एक अच्छा सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यार्थी को संवेदनशील बना सकता है।
एक अच्छा वाद-विवाद उसकी तार्किकता विकसित कर सकता है।
एक अच्छा सामुदायिक कार्यक्रम उसे समाज से जोड़ सकता है।
एक अच्छा खेल उसके शरीर और मन को विकसित कर सकता है।
एक अच्छा व्याख्यान उसकी दृष्टि बदल सकता है।
लेकिन इन सबकी सार्थकता तभी है जब विद्यार्थी उनमें केवल संख्या बनकर उपस्थित न हो।
उसे सहभागी होना चाहिए, दर्शक नहीं।
उसे प्रश्नकर्ता होना चाहिए, भीड़ नहीं।
उसे सीखने वाला होना चाहिए, आयोजन की सजावट नहीं।
और सबसे बढ़कर, उसे अपने समय का स्वामी होना चाहिए।
शायद आज उच्च शिक्षा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमारे महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कितने कार्यक्रम हो रहे हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि उन कार्यक्रमों के बीच विद्यार्थी के लिए शिक्षा का कितना समय बच रहा है।
यदि कोई शैक्षणिक संस्था अपने विद्यार्थियों को लगातार एक कार्यक्रम से दूसरे कार्यक्रम की ओर ले जा रही है, तो उसे कभी-कभी रुककर स्वयं से पूछना चाहिए—हम उन्हें कहाँ ले जा रहे हैं?
क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को किसी निर्धारित दिशा में लगातार हाँकते रहना नहीं है।
शिक्षा का उद्देश्य अंततः उसे इतना सक्षम बनाना है कि एक दिन वह स्वयं अपनी दिशा चुन सके।
और यही वह बिंदु है जहाँ ‘भेड़-बकरियों’ का रूपक अपनी वास्तविक आलोचनात्मक शक्ति प्राप्त करता है। प्रश्न यह नहीं कि विद्यार्थी भेड़-बकरी हैं। प्रश्न यह है कि क्या हमारी संस्थागत प्रक्रियाएँ उन्हें कभी-कभी इस तरह संचालित तो नहीं करने लगतीं, जैसे उनकी अपनी कोई दिशा, अपनी प्राथमिकता और अपने समय पर कोई अधिकार न हो।
यदि ऐसा है, तो समस्या विद्यार्थियों में नहीं, व्यवस्था की दृष्टि में है।
शिक्षा का सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि विद्यार्थी को उसकी संख्या से नहीं, उसकी चेतना से देखा जाए; उसकी उपस्थिति से नहीं, उसकी जिज्ञासा से; उसके मंच पर बैठने से नहीं, उसके भीतर उठने वाले प्रश्नों से।
क्योंकि अंततः किसी महाविद्यालय की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसके परिसर में वर्ष भर कितने कार्यक्रम हुए।
उसकी असली सफलता इस बात से तय होती है कि वहाँ से निकलने वाला विद्यार्थी कितना अधिक सोचने वाला, प्रश्न करने वाला, समझने वाला और अपने निर्णय स्वयं लेने वाला मनुष्य बना।
यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी शैक्षणिक व्यवस्था को बार-बार स्वयं को परखना चाहिए।
और शायद इसी आत्मपरीक्षण से वह महीन रेखा स्पष्ट हो सकती है जिसके एक ओर शिक्षा है और दूसरी ओर शिक्षा के नाम पर गतिविधि।
दोनों के बीच का अंतर बहुत बड़ा नहीं दिखाई देता।
लेकिन विद्यार्थी का भविष्य अक्सर इसी छोटे-से अंतर में तय होता है।

