अस्मिता और अहंकार

अस्मिता को केवल ‘पहचान’ कहना उसके अर्थ को बहुत छोटा कर देना है। अस्मिता व्यक्ति के भीतर वह बोध है जिसके द्वारा वह अपने अस्तित्व को किसी संदर्भ, संबंध, इतिहास, अनुभव, भाषा, संस्कृति, देह, विचार और मूल्य-व्यवस्था के साथ जोड़कर यह अनुभव करता है कि “मैं कौन हूँ, किस रूप में हूँ और दुनिया में मेरी जगह क्या है।” इस अर्थ में अस्मिता कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर बनती हुई चेतना है। मनुष्य जन्म लेते ही पूर्ण अस्मिता लेकर पैदा नहीं होता; वह परिवार, भाषा, समाज, स्मृतियों, संघर्षों, उपलब्धियों, अपमानों, संबंधों और अपने चुनावों के बीच धीरे-धीरे अपने ‘मैं’ की आकृति निर्मित करता है।
अस्मिता की सबसे सूक्ष्म बात यह है कि इसमें ‘मैं’ आवश्यक है, लेकिन ‘मैं ही सब कुछ हूँ’ आवश्यक नहीं है। यहीं से अस्मिता और अहंकार के बीच की महीन रेखा दिखाई देती है। अस्मिता कहती है—“मैं हूँ।” अहंकार कहता है—“सिर्फ मैं ही हूँ” या कम-से-कम “मेरे होने का मूल्य दूसरों से अधिक है।” अस्मिता व्यक्ति को अपनी विशिष्टता का बोध कराती है; अहंकार उसी विशिष्टता को श्रेष्ठता में बदल देता है। अस्मिता अपने अस्तित्व को पहचानती है, अहंकार अपने अस्तित्व को प्रमाणित करवाना चाहता है। अस्मिता को अपने होने के लिए दूसरे को छोटा करने की आवश्यकता नहीं होती; अहंकार अक्सर अपने बड़े होने का अनुभव तभी करता है जब सामने वाला छोटा सिद्ध हो जाए।
इसे और सूक्ष्मता से देखें तो अस्मिता के भीतर एक स्वस्थ स्व-बोध होता है। व्यक्ति जानता है कि उसकी अपनी भाषा है, अपनी स्मृतियाँ हैं, अपनी संवेदनाएँ हैं, अपने विचार हैं, अपनी सीमाएँ हैं और अपने निर्णय हैं। इसलिए अस्मिता आत्मसम्मान को जन्म देती है। लेकिन जब यही आत्मसम्मान बाहरी स्वीकृति पर निर्भर होने लगता है, तब अस्मिता धीरे-धीरे अहंकार की ओर मुड़ सकती है। “मैं अपने काम का सम्मान करता हूँ” अस्मिता है; “सबको मेरे काम की प्रशंसा करनी ही चाहिए” अहंकार की शुरुआत है। “मुझे अपनी बात कहने का अधिकार है” अस्मिता है; “मेरी बात को अस्वीकार करने का अधिकार किसी को नहीं” अहंकार है। “मैं अलग हूँ” अस्मिता है; “इसलिए मैं बेहतर हूँ” अहंकार है।
इसलिए अस्मिता और अहंकार के बीच की रेखा वास्तव में स्वीकार और आग्रह के बीच की रेखा है। अस्मिता अपने अस्तित्व को स्वीकार करती है, अहंकार उसे लगातार स्थापित करने का आग्रह करता है। अस्मिता को आत्मज्ञान से शक्ति मिलती है, अहंकार को तुलना से। अस्मिता भीतर से पुष्ट होती है, अहंकार बाहर से पुष्टि चाहता है। अस्मिता कह सकती है—“मैं गलत हो सकता हूँ”; अहंकार के लिए यह स्वीकार करना कठिन होता है। अस्मिता अपनी सीमा जानती है; अहंकार अपनी सीमा को भी अपनी उपलब्धि समझ सकता है।
लेकिन अस्मिता को केवल सकारात्मक शब्द मान लेना भी उचित नहीं होगा। अस्मिता के भीतर एक गहरी द्वंद्वात्मकता है। क्योंकि व्यक्ति की पहचान केवल उसकी अपनी बनाई हुई नहीं होती; समाज भी उसे पहचान देता है। कोई व्यक्ति स्त्री है, पुरुष है, शिक्षक है, किसान है, ब्राह्मण है, दलित है, आदिवासी है, भारतीय है, हिंदीभाषी है, किसी क्षेत्र का निवासी है, किसी विचारधारा से जुड़ा है—इनमें से कुछ पहचानें वह स्वयं चुनता है और कुछ उसे समाज प्रदान करता है। इसलिए अस्मिता का निर्माण हमेशा व्यक्ति और समाज के बीच संवाद तथा संघर्ष में होता है। समाज यदि किसी व्यक्ति को कोई ऐसी पहचान देता है जिसे वह स्वीकार नहीं करता, तो वहाँ अस्मिता का संघर्ष शुरू होता है।
यहीं से अस्मिता केवल मनोवैज्ञानिक विषय नहीं रह जाती; वह सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन जाती है। स्त्री-अस्मिता का प्रश्न केवल “मैं स्त्री हूँ” कह देने का प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि समाज ने “स्त्री” होने के साथ कौन-कौन से अर्थ जोड़ दिए हैं और स्त्री स्वयं अपने लिए कौन-से अर्थ चुनना चाहती है। इसी तरह दलित अस्मिता केवल एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अनुभव की पुनर्प्राप्ति है जिसमें किसी समुदाय की मनुष्यता को ही प्रश्नांकित किया गया। आदिवासी अस्मिता में भूमि, जंगल, समुदाय, स्मृति और जीवन-पद्धति जुड़ जाते हैं। भाषायी अस्मिता में केवल भाषा नहीं होती; उसके भीतर इतिहास, संस्कृति, स्मृति और सामूहिक अनुभव का संसार होता है।
इसलिए अस्मिता की “कीमिया” को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि एक साधारण अनुभव किस प्रकार पहचान में बदलता है। कोई घटना घटती है—वह स्मृति बनती है; स्मृतियाँ अनुभव का संचय करती हैं; अनुभव व्यक्ति के भीतर एक अर्थ पैदा करता है; अर्थ स्वयं की किसी धारणा को जन्म देता है; और यही धारणा धीरे-धीरे अस्मिता का हिस्सा बन जाती है। उदाहरण के लिए किसी बच्चे को लगातार यह कहा जाए कि वह कमजोर है, तो वह केवल दूसरों की आवाज नहीं सुनता; धीरे-धीरे वह उस आवाज को अपने भीतर स्थापित कर सकता है। दूसरी ओर वही बच्चा यदि संघर्ष करके अपनी क्षमता पहचान ले, तो उसके भीतर एक नई अस्मिता निर्मित होती है। इस तरह अस्मिता बाहरी दुनिया द्वारा आरोपित और भीतर से निर्मित—दोनों प्रक्रियाओं का परिणाम है।
अस्मिता में स्मृति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य केवल वर्तमान में नहीं रहता; वह अपने अतीत को लेकर चलता है। परिवार की स्मृतियाँ, भाषा की स्मृतियाँ, अपमान की स्मृतियाँ, प्रेम की स्मृतियाँ, विजय और पराजय की स्मृतियाँ—ये सब मिलकर उसके ‘मैं’ को आकार देती हैं। इसलिए जब किसी समुदाय की स्मृति मिटाई जाती है, तो केवल उसका इतिहास नहीं मिटता; उसकी अस्मिता पर भी आघात होता है। इसी कारण साहित्य में स्मृति बार-बार अस्मिता की पुनर्प्राप्ति का माध्यम बनती है।
लेकिन अस्मिता केवल अतीत से चिपके रहने का नाम भी नहीं है। यदि अस्मिता पूरी तरह अतीत में बंद हो जाए तो वह जीवित चेतना के बजाय जड़ पहचान बन सकती है। स्वस्थ अस्मिता अपने इतिहास को स्वीकार करती है, लेकिन भविष्य के लिए स्वयं को पुनर्गठित करने की क्षमता भी रखती है। इसीलिए अस्मिता में स्मृति और चयन दोनों होते हैं। हम केवल यह नहीं कहते कि “मैं क्या था”; हम यह भी तय करते हैं कि “मैं आगे क्या होना चाहता हूँ।”
यहीं अस्मिता का सबसे रचनात्मक पक्ष सामने आता है। अस्मिता केवल समाज से प्राप्त पहचान नहीं है; वह स्वयं को पुनर्निर्मित करने की क्षमता भी है। व्यक्ति अपनी दी हुई पहचान के भीतर रहते हुए भी नई पहचान गढ़ सकता है। वह कह सकता है—“मुझे जिस रूप में परिभाषित किया गया था, मैं केवल वही नहीं हूँ।” यही क्षण अस्मिता को प्रतिरोध में बदल देता है। जब कोई व्यक्ति या समुदाय दूसरों द्वारा आरोपित हीन पहचान को अस्वीकार करके अपनी परिभाषा स्वयं करने लगता है, तब अस्मिता मुक्ति की प्रक्रिया बन जाती है।
लेकिन यहाँ भी खतरा मौजूद है। जो अस्मिता कभी मुक्ति का माध्यम थी, वही दूसरे के प्रति असहिष्णुता का आधार बन सकती है। जब “मेरी पहचान” धीरे-धीरे “मेरी पहचान ही सही पहचान” में बदलती है, तब अस्मिता अहंकार और सामूहिक अहंकार दोनों में परिवर्तित हो सकती है। व्यक्ति के स्तर पर यह आत्ममुग्धता है और समूह के स्तर पर यह पहचान-आधारित श्रेष्ठताबोध। इसलिए अस्मिता का परिपक्व रूप अपनी विशिष्टता को बचाते हुए दूसरे की विशिष्टता को स्वीकार करता है।
इस दृष्टि से अस्मिता का सर्वोच्च रूप शायद “मैं” को बचाते हुए “दूसरे” के अस्तित्व को स्वीकार करना है। यदि मैं अपनी पहचान के लिए दूसरे की पहचान मिटाना चाहता हूँ, तो मेरी अस्मिता अभी असुरक्षित है। लेकिन यदि मैं कह सकता हूँ कि “मैं अपने होने में पूर्ण हूँ और तुम्हें तुम्हारे होने में पूर्ण होने का अधिकार है”, तब अस्मिता अहंकार से ऊपर उठती है।
यहीं अस्मिता और अहंकार की अंतिम सीमा दिखाई देती है। अस्मिता कहती है—“मैं कौन हूँ, इसे मैं जानना चाहता हूँ।” अहंकार कहता है—“तुम मुझे उसी रूप में स्वीकार करो, जैसा मैं स्वयं को देखता हूँ।” अस्मिता संवाद चाहती है; अहंकार स्वीकृति की मांग करता है। अस्मिता प्रश्न पूछ सकती है; अहंकार प्रश्न से असुरक्षित हो जाता है। अस्मिता परिवर्तन को स्वीकार कर सकती है; अहंकार अपनी बनाई हुई छवि को बचाने में लगा रहता है।
इसलिए अस्मिता को आत्ममुग्धता से अलग करना आवश्यक है। आत्मसम्मान अस्मिता का स्वस्थ रूप है; आत्ममुग्धता उसका विकृत रूप। आत्मसम्मान कहता है—“मेरी गरिमा है।” आत्ममुग्धता कहती है—“मेरी गरिमा दूसरों से अधिक है।” आत्मसम्मान व्यक्ति को भीतर से स्थिर करता है; अहंकार व्यक्ति को लगातार दूसरों की आँखों में अपनी छवि खोजने के लिए विवश करता है।
और शायद अस्मिता की सबसे गहरी विडंबना यही है कि जिस ‘मैं’ को खोजते-खोजते हम अस्मिता तक पहुँचते हैं, उसी ‘मैं’ से मुक्त हुए बिना हम उसके अहंकार में फँस सकते हैं। इसलिए अस्मिता की परिपक्वता ‘मैं’ को मिटाना नहीं है, बल्कि ‘मैं’ को पारदर्शी बनाना है। ऐसा ‘मैं’ जो अपनी उपस्थिति को जानता है, लेकिन अपनी उपस्थिति को संसार की अंतिम सच्चाई नहीं मानता। वह कह सकता है—“मैं हूँ, इसलिए मेरी गरिमा है; लेकिन तुम भी हो, इसलिए तुम्हारी गरिमा भी उतनी ही वास्तविक है।”
इस अर्थ में अस्मिता कोई अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली आंतरिक रसायन-प्रक्रिया है—अनुभव स्मृति में बदलता है, स्मृति अर्थ में, अर्थ पहचान में, पहचान आत्मबोध में, आत्मबोध आत्मसम्मान में; और यदि उसमें विवेक, संवाद और दूसरे के अस्तित्व की स्वीकृति जुड़ जाए तो वही अस्मिता मनुष्य को अहंकार से बचाकर स्वतंत्रता की ओर ले जाती है। लेकिन यदि उसी प्रक्रिया में तुलना, श्रेष्ठताबोध, असुरक्षा और मान्यता की भूख प्रवेश कर जाए, तो अस्मिता की वही रसायन-प्रक्रिया अहंकार पैदा कर देती है।
इसलिए अस्मिता का सार “मैं कौन हूँ?” में है, जबकि अहंकार का सार “मैं दूसरों से कितना बड़ा हूँ?” में। दोनों के बीच की दूरी शब्दों में बहुत छोटी है, लेकिन मनुष्य के व्यक्तित्व और समाज के इतिहास में यही छोटी-सी दूरी बहुत बड़े परिणाम पैदा करती है।

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