जीवन: संबंध और संरचना की व्याकरण
अगर यह मान लिया जाए कि जीवन की मूल इकाई वस्तु नहीं, संबंध है, तो फौरन एक काँटेदार सवाल खड़ा होता है — क्या यह संबंध खुद जीवन से उपजा है, या समाज-सत्ता ने उसे नाम, नियम और अर्थ देकर गढ़ा है? जवाब शायद इतना सीधा नहीं जितना सवाल है, पर एक बात साफ की जा सकती है: संबंध का मूल जीवन में है, उसका सामाजिक रूप सत्ता, भाषा और संस्कृति की देन है।
संबंध समाज से पहले का है। शरीर में दो कोशिकाएँ बिना किसी अनुबंध के एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। कोई जीव पर्यावरण के साथ पदार्थ और ऊर्जा बाँटता चलता है, कोई पौधा रोशनी के साथ एक रिश्ता बना लेता है, कोई प्राणी बस साँस लेकर वायु से जुड़ जाता है, और जन्म लेने वाला हर शिशु दूसरे किसी जीव की मौजूदगी पर टिका होता है — इनमें से किसी को भी समाज, भाषा, राज्य या कानून की दरकार नहीं। इसी से यह अनुमान निकलता है कि संबंध सामाजिक आविष्कार नहीं, जीवन का मूल स्वभाव है। ब्रह्मांड में शायद किसी अकेली, निपट स्वतंत्र वस्तु की कल्पना करना ही मुश्किल है।
कोशिका को “कोशिका” नाम मिलने से बहुत पहले वह अपने परिवेश के साथ पदार्थ और ऊर्जा का लेन-देन कर रही थी। वृक्ष को “वृक्ष” कहे जाने से पहले भी वह प्रकाश, जल, मिट्टी, वायु और जीव-जगत से जुड़ा हुआ था। नाम बाद में आया, रिश्ता पहले से चल रहा था — और यहीं से यह कहा जा सकता है कि जीवन वस्तुओं का संसार नहीं, अंतःक्रियाओं का संसार है।
हमारी आँख वस्तु देखने की अभ्यस्त है, संबंध देखने की नहीं। सामने सबसे पहले आती है वस्तु — यह शरीर, यह वृक्ष, यह नदी, यह पर्वत, यह मनुष्य, यह मिट्टी, यह जल। किसी चीज़ को पहचानते ही हम उसे एक नाम दे देते हैं, और नाम मिलते ही वह हमारे सामने एक स्वतंत्र इकाई बनकर खड़ी हो जाती है। पर अगर जीवन को नामों से थोड़ा पहले, वस्तुओं की पहचान से थोड़ा पीछे जाकर देखा जाए, तो पूरा दृश्य पलट जाता है। वहाँ अलग-अलग चीज़ें नहीं, एक-दूसरे में उतरती हुई प्रक्रियाएँ दिखती हैं। कोई वस्तु अपने आप में मुकम्मल नहीं होती — हर वस्तु या व्यक्ति किसी दूसरे के साथ अपने संबंध में ही वह बनता है, जो वह है।
एक कोशिका को ही लें। क्या वह सचमुच स्वतंत्र है? हम उसे स्वतंत्र जैविक इकाई कहते ज़रूर हैं, लेकिन वह अपने भीतर जितनी है, उससे कहीं ज़्यादा अपने बाहर के साथ जुड़ी है — उसके भीतर जो कुछ घट रहा है, वह बाहर से आते-जाते पदार्थों, ऊर्जा और संकेतों से बँधा है। उसकी सीमा उसे संसार से काटती नहीं, बल्कि संसार के साथ उसके रिश्ते को मुमकिन बनाती है। कोशिका की झिल्ली महज़ एक दीवार नहीं — वह चुनती है, पहचानती है, ग्रहण करती है, रोकती है, छोड़ती है, प्रतिक्रिया करती है। कोशिका की पहचान उतनी उसके भीतर बंद किसी स्थायी पदार्थ में नहीं, जितनी इस बात में है कि वह बाहर के साथ किस तरह पेश आती है।
“संवाद” शब्द को यहाँ मनुष्य की भाषा वाले अर्थ में मत लीजिए। फिर भी जीवन की दृष्टि से यह शब्द बहुत कुछ खोलता है — किसी पदार्थ का भीतर उतरना, किसी संकेत पर प्रतिक्रिया होना, किसी रासायनिक बदलाव का किसी दूसरी प्रक्रिया को हिला देना, ये सब जीवन के वे आदिम रिश्ते हैं जिनमें अभी कोई शब्द नहीं, कोई वाक्य नहीं, कोई व्याकरण नहीं, कोई “मैं” तक नहीं — फिर भी एक तरह का अर्थपूर्ण जुड़ाव मौजूद है। जीवन अपने सबसे शुरुआती बिंदु पर ही अलग-अलग चीज़ों का महज़ होना नहीं था; वह एक-दूसरे के लिए कुछ होना था। इसीलिए जीवन की पहली भाषा शायद नाम नहीं, संबंध रही होगी। जीवन का होना केवल इसमें नहीं है कि कोई चीज़ मौजूद है, बल्कि इसमें है कि वह दूसरी चीज़ों के साथ क्या करती है, और दूसरी चीज़ें उसके साथ क्या करती हैं।
एक बीज को देखिए — बाहर से एक छोटी, बंद-सी वस्तु। भीतर एक वृक्ष की संभावना छिपी है, पर वह संभावना भी अकेली नहीं जीती। मिट्टी चाहिए, जल चाहिए, ताप और प्रकाश चाहिए, सूक्ष्मजीवों की एक पूरी दुनिया चाहिए। बीज का अंकुरण उसके भीतर अकेले घटने वाली घटना नहीं, बीज और संसार के बीच चलती एक पूरी संवाद-श्रृंखला है। बीज मिट्टी से सिर्फ़ लेता नहीं, मिट्टी भी उसे बदलती है। जल भीतर सिर्फ़ जाता नहीं, उसकी मौजूदगी बीज के भीतर अनगिनत प्रक्रियाओं को जगा देती है। तापमान बदलता है तो अंकुरण की चाल बदल जाती है, प्रकाश आता है तो दिशा बदल जाती है — जड़ नीचे उतरती है, तना ऊपर उठता है, मानो जीवन किसी एक दिशा में नहीं, कई दिशाओं के साथ लगातार रिश्ता बनाते हुए खुद को गढ़ रहा हो। इसलिए वृक्ष का जन्म बीज का महज़ विस्तार नहीं — वह बीज और संसार के बीच उपजते संबंधों का उद्भव है।
वृक्ष बन जाने के बाद भी वह अपने आप में बंद नहीं होता। पत्तियाँ सूर्य से ऊर्जा खींचती हैं, जड़ें मिट्टी से पदार्थ लेती हैं, जल ऊपर चढ़ता है, वायु के साथ अदला-बदली होती रहती है, सूक्ष्मजीव उसकी जड़ों के इर्द-गिर्द जीवन की एक और परत बुनते हैं, पक्षी उसमें बसेरा पाते हैं, कीट अपना जीवन उसके साथ जोड़ लेते हैं, और मनुष्य उसके फल, छाया, लकड़ी, औषधि या सौंदर्य से नाता बनाता है। वृक्ष को केवल “एक वृक्ष” कह देने में हमने उसके नाम को तो बचा लिया, पर उसके जीवन का बड़ा हिस्सा गँवा दिया — क्योंकि उसकी असली सीमा जड़ या तने की सीमा से कहीं आगे तक फैली है। वह मिट्टी के उन तत्वों को, जिन्हें मनुष्य और दूसरे प्राणी सीधे ग्रहण नहीं कर सकते, पचाने लायक रूप में बदल देता है। और यही बात, थोड़े बदले हुए रूप में, मनुष्य पर भी लागू होती है।
मनुष्य को हम एक शरीर मानकर चलते हैं, जबकि शरीर खुद एक जीवंत संबंध-संगठन है। जिस भोजन को “मैं खाता हूँ” कहा जाता है, वही कुछ समय बाद “मैं” के शरीर का अंग बन जाता है। जो हवा अभी बाहर थी, वह भीतर आ जाती है; जो भीतर थी, बाहर लौट जाती है। शरीर की सीमा हर पल बदल रही होती है, पदार्थ भीतर-बाहर लगातार आवाजाही में रहता है — फिर भी हम बेझिझक कहते हैं, “यह मेरा शरीर है।” व्यवहार में यह ज़रूरी है, पर जीवन की तह में झाँकें तो शरीर कोई जड़ वस्तु नहीं, लगातार बदलता हुआ रिश्तों का जाल है। हमारा शरीर पृथ्वी से अलग नहीं — जल पृथ्वी का है, खनिज पृथ्वी के हैं, भोजन और वायु दोनों पृथ्वी से आए हैं। जिसे “मैं” कहा जा रहा है, वह किसी एक क्षण में पृथ्वी के अनगिनत संबंधों का एक ख़ास विन्यास भर है। हम पृथ्वी को बाहर मानते हैं और शरीर को भीतर, पर जीवन की दृष्टि से यह बँटवारा उतना पक्का नहीं है।
शिशु के स्तर पर यह बात और खुलकर सामने आती है। जन्म के बाद उसका अस्तित्व किसी तैयार “मैं” की तरह शुरू नहीं होता — वह स्पर्श से शांत होता है, ऊष्मा से जुड़ता है, आवाज़ पहचानता है, दूध से पोषण पाता है, किसी चेहरे की मौजूदगी में सुरक्षित महसूस करता है। उसका शुरुआती संसार वस्तुओं का नहीं, संबंधों का संसार होता है। माँ उसके लिए सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं — भोजन भी है, ऊष्मा भी, स्पर्श भी, आवाज़ भी, सुरक्षा भी, एक लय भी। शिशु के लिए शायद पहला सवाल “यह कौन है?” नहीं, बल्कि इससे कहीं मूल है: यह उपस्थिति मेरे साथ क्या कर रही है — क्या यह शांत करती है, सुरक्षा देती है, भूख से बाहर निकालती है, छूती है, और इसका न होना क्या बदल देता है? संबंध की अनुभूति नाम से पहले आती है; “माँ” शब्द बाद में आता है। यह मामूली-सा दिखने वाला तथ्य असल में हमारी पूरी सभ्यता की बनावट को उलटकर देखने की ताकत रखता है।
और यहीं भाषा दाख़िल होती है। भाषा ने इन जीवंत रिश्तों को मिटाया नहीं — उसने उन्हें नाम देने, बाँटने और टिकाने की एक असाधारण क्षमता दी। पर नाम के साथ एक बदलाव भी आया: जो पहले प्रवाह था, वह पहचान बन गया। यह माँ है, यह बच्चा है, यह मेरा है, यह तुम्हारा है, यह घर है, यह भूमि है, यह परिवार है, यह राज्य है — नाम उपयोगी हैं, उनके बिना मनुष्य की साझा दुनिया इतनी बड़ी कभी नहीं बन पाती। लेकिन नाम में एक अजीब शक्ति भी छिपी है: वह प्रवाह को एक आकार दे देता है, और जब वही आकार बार-बार दोहराया जाता है तो हमें लगने लगता है कि आकार ही असल है। यहीं वस्तु का भ्रम जन्म लेता है। वृक्ष पहले से “वृक्ष” नहीं था — वह संबंधों के एक जीवंत विन्यास के रूप में पहले से था, हमने बस उस विन्यास को एक नाम दे दिया। नाम मिलते ही वह हमारे लिए स्वतंत्र वस्तु बन गया। अब हम कहते हैं “वृक्ष यहाँ है” और भूल जाते हैं कि उसका होना सिर्फ़ यहाँ खड़े रहने में नहीं — वह मिट्टी के साथ है, जल के साथ है, प्रकाश, हवा, सूक्ष्मजीव और ऋतुओं के साथ है। वस्तु दिखती है, संबंध छिपा रह जाता है।
हमारी पूरी सभ्यता की एक बड़ी बौद्धिक आदत यही रही है — जो दिखता है उसे असली मान लेना, और जो उसे संभव बनाता है उसे पृष्ठभूमि में धकेल देना। वृक्ष सामने है, मिट्टी पीछे है; मनुष्य सामने है, समाज पीछे है; शरीर सामने है, वायु पीछे है; व्यक्ति सामने है, संबंध पीछे है। पर हो सकता है कि वास्तविकता का उलटा पाठ ज़्यादा गहरा हो — वस्तु इसलिए सामने दिखती है क्योंकि संबंध पीछे से काम कर रहे होते हैं।
इसे मन पर लागू करें तो मामला और उलझ जाता है। “यह मेरा विचार है” — हम कहते तो हैं, पर यह विचार आया कहाँ से? इसमें कितनी भाषा है जो हमने खुद नहीं गढ़ी, कितनी स्मृतियाँ हैं जिन्हें जान-बूझकर नहीं चुना गया, कितने अनुभव बचपन से चुपचाप जमा होते गए, कितने शब्द समाज ने थमाए, कितनी धारणाएँ परिवार-शिक्षा-संस्कृति-इतिहास ने भीतर बिठा दीं, कितनी प्रतिक्रियाएँ शरीर की पुरानी बनावट से उठती हैं, कितनी इच्छाएँ दूसरों को देखकर पैदा होती हैं? फिर भी एक क्षण में यह सब सिमटकर एक वाक्य में उतर आता है — “मैं ऐसा सोचता हूँ।” वाक्य सुविधाजनक है, पर इसके पीछे रिश्तों का एक पूरा ब्रह्मांड छिपा है। शायद “मैं” भी कोई वस्तु नहीं, संबंधों का एक बेहद जटिल संकेंद्रण भर है।
“कर्ता एक सामाजिक इकाई है” — यह विचार यहाँ एक नए स्तर पर खुलता है। व्यक्ति अकेला कर्ता नहीं, वह रिश्तों के एक विशाल तंत्र का बस एक केंद्र है। परिवार, भाषा, शरीर, स्मृति, समाज, शिक्षा, परिस्थिति, इच्छा, भय, इतिहास — इन सबके बीच से कोई क्रिया निकलती है, और फिर भाषा उस क्रिया के आगे “मैं” टाँक देती है: “मैंने किया।” इस छोटे-से वाक्य में रिश्तों का विशाल जाल एक व्यक्ति में सिकुड़ जाता है — सामाजिक जीवन के लिए यह सुविधाजनक है, पर अस्तित्व की दृष्टि से अधूरा। क्योंकि क्रिया व्यक्ति से बड़ी होती है; व्यक्ति उसका केंद्र हो सकता है, उसका स्रोत नहीं। शायद यहीं जीवन की व्याकरण की कुंजी छिपी है। भाषा पूछती है — कौन? जीवन शायद पहले पूछता है — किसके साथ? भाषा कहती है “वह करता है”; जीवन दिखाता है कि वह अनेक रिश्तों के बीच घटित होता है। भाषा कहती है “वृक्ष बढ़ता है”; जीवन कहता है कि वृक्ष-मिट्टी, वृक्ष-जल, वृक्ष-प्रकाश, वृक्ष-वायु, वृक्ष-सूक्ष्मजीव — इन सबके बीच के रिश्तों में वृद्धि घटित होती है। यहाँ वृक्ष गायब नहीं होता, बल्कि और वास्तविक हो उठता है, क्योंकि अब वह अपने रिश्तों से कटी कोई बंद वस्तु नहीं रहता।
संबंध को महज़ दो वस्तुओं के बीच दूरी घटाने वाला पुल समझना भी नाकाफ़ी है। कई बार संबंध ही दोनों को वह बनाता है जो वे हैं — मधुमक्खी और फूल का रिश्ता कोई बाहरी संपर्क नहीं, उसके भीतर दोनों के जीवन की कई प्रक्रियाएँ आपस में गुँथी हुई हैं। जड़ और मिट्टी का रिश्ता “मिट्टी में जड़” जितना सरल नहीं — मिट्टी की रासायनिक-जैविक दुनिया जड़ के जीवन का हिस्सा बन जाती है। मनुष्य और भाषा का रिश्ता भी वैसा ही है: भाषा हमारे बाहर रखी कोई वस्तु नहीं, और हम भाषा से पूरी तरह आज़ाद कोई सत्ता नहीं। हम भाषा का उपयोग करते हैं, पर भाषा भी हमारा उपयोग करती है — हमारी सोच को ढालकर, स्मृति को सजाकर, दुनिया को खाँचों में बाँटकर। संबंध दो दिशाओं में बहता है — मैं उसे बनाता हूँ, वह मुझे बनाता है। यहीं उसकी असली गहराई है।
शायद जीवन की सबसे बड़ी उलझन यही है कि कोई भी रिश्ता एकतरफ़ा नहीं होता। मैं वृक्ष से जुड़ता हूँ, पर वृक्ष भी मुझ पर असर डालता है। मैं समाज को बदलता हूँ, समाज भी मुझे गढ़ता है। मैं भाषा बोलता हूँ, भाषा मेरी सोच की सीमा और संभावना दोनों तय करती है। यहाँ कारण और परिणाम भी एक सीधी रेखा में नहीं चलते — यह कहना काफ़ी नहीं कि A ने B को जन्म दिया; अक्सर A ने B को प्रभावित किया, B ने C को बदला, और C ने पलटकर A को ही बदल डाला। यही जीवित जटिलता है, और शायद इसी वजह से जीवन को वस्तुओं की सूची बनाकर नहीं समझा जा सकता।
अब उस मूल सवाल पर लौटें — संबंध समाज ने गढ़ा या जीवन ने? जीवन के तल पर संबंध पहले से मौजूद है, समाज बाद में आता है और उस मूल रिश्ते पर परत-दर-परत चढ़ाता जाता है — नाम, भूमिका, अधिकार, कर्तव्य, स्वामित्व, नैतिकता, कानून, प्रतिष्ठा, पहचान। दो मनुष्य जुड़े थे, समाज ने कहा ये भाई हैं, और उत्तरदायित्व जुड़ गया। दो मनुष्य साथ रहते थे, समाज ने कहा यह विवाह है, और अधिकार-कर्तव्य जुड़ गए। कोई भूमि पर काम करता था, समाज ने कहा यह उसकी भूमि है, और स्वामित्व आ गया। समाज ने संबंध को शून्य से पैदा नहीं किया, उसने जीवंत संबंध पर अर्थ और संरचना की परतें चढ़ाईं, और सत्ता ने उन्हें स्थायित्व और बाध्यता दी। यहीं जीवन और समाज के बीच एक खिंचाव पैदा होता है — जीवन रिश्ते को बदलता रहता है, समाज उसे नाम देकर जमाना चाहता है। जीवन कहता है यह बदल सकता है, सत्ता कहती है यह वैध ढाँचा है। जीवन प्रवाह है, संस्था स्थायित्व की भूखी है। यह टकराव हमेशा विनाशकारी नहीं — सामूहिक जीवन के लिए कुछ स्थायित्व चाहिए ही होता है — पर जब स्थायित्व जीवंत रिश्ते से बड़ा हो जाए, तब संरचना जीवन पर भारी पड़ने लगती है, और शायद वहीं से विकृति जन्म लेती है।
इसीलिए संबंध खुद एक जीवंत चीज़ है, कोई जड़ वस्तु नहीं — वह बनता है, बदलता है, गहराता है, ढीला पड़ता है, टूटता है, कभी नए रूप में लौट आता है। प्रेम का रिश्ता ऐसा ही है, माता-पिता और संतान का भी, मनुष्य और प्रकृति का भी, मनुष्य और अपने ही शरीर का भी। अगर संबंध को किसी स्थिर परिभाषा में कैद कर दिया जाए, तो उसकी जीवंत प्रकृति ही हाथ से निकल जाती है। इसलिए जीवन की व्याकरण में संबंध का अर्थ शायद यही है — दो या अधिक अस्तित्वों के बीच लगातार बदलता हुआ प्रभाव, विनिमय और सह-अस्तित्व। “बीच” शब्द यहाँ बेहद अहम है, क्योंकि संबंध न सिर्फ़ A है, न सिर्फ़ B — वह A और B के बीच घटित होने वाली एक तीसरी जीवंत सच्चाई है। दो मनुष्य मिलते हैं और एक रिश्ता जन्म लेता है जो किसी एक के भीतर अकेले कभी मौजूद नहीं था। दो संस्कृतियाँ मिलती हैं और तीसरी संभावना उठ खड़ी होती है। दो विचार टकराते हैं और नया विचार निकल आता है। दो प्रजातियाँ सहजीवन में उतरती हैं और दोनों की दिशा बदल जाती है। संबंध बस जोड़ता नहीं — वह नया रचता है, और शायद यही जीवन की रचनात्मकता का असली भेद है।
यहीं से इस विचार – “जीवन की मूल इकाई संबंध है” – को थोड़ा और आगे ले जाना ज़रूरी लगता है। वस्तु कहती है “मैं हूँ।” संबंध कहता है “मैं हूँ क्योंकि मैं किसी के साथ हूँ।” जीवन दूसरी भाषा में ही ज़्यादा सच्चा उतरता है — कोशिका परिवेश से कटकर कोशिका नहीं रह सकती, शरीर पर्यावरण से कटकर शरीर नहीं रह सकता, मन भाषा और स्मृति से कटकर वैसा मन नहीं रह सकता, मनुष्य समाज से कटकर वैसा मनुष्य नहीं रह सकता, और समाज प्रकृति से कटकर अस्तित्व में ही नहीं रह सकता। हम अपने चारों ओर जितनी सीमाएँ खींचते जाते हैं, जीवन उतना ही उन सीमाओं के आर-पार बहता रहता है। शायद अकेली वस्तु एक सुविधाजनक मानसिक अमूर्तन भर है, जीवन की अंतिम सच्चाई नहीं — हम वस्तु को इसलिए देखते हैं क्योंकि उसे पकड़ना आसान है, संबंध को पकड़ना कठिन। वृक्ष पकड़ में आता है, वृक्ष-मिट्टी का रिश्ता नहीं आता। मनुष्य दिखता है, मनुष्य-भाषा का रिश्ता नहीं दिखता। “मैं” दिखता है, “मैं” को गढ़ने वाले अनगिनत रिश्ते नहीं दिखते। इसीलिए हमारी दृष्टि वस्तु-केंद्रित बन गई, जबकि जीवन शायद संबंध-केंद्रित है — और जब देखने की दिशा वस्तु से संबंध की ओर मुड़ती है, तो दुनिया नहीं बदलती, दुनिया को देखने का हमारा ढाँचा बदल जाता है।
तब कोई वस्तु अकेली नहीं रह जाती — पत्थर भूगर्भीय समय से जुड़ा है, वृक्ष मिट्टी और प्रकाश से, मनुष्य दूसरे मनुष्यों से, शरीर पृथ्वी से, विचार भाषा से, भाषा समाज से, समाज इतिहास से, और इतिहास प्रकृति व मनुष्य की परस्पर क्रियाओं से। यह पूरा जाल किसी एक केंद्र पर जाकर ख़त्म नहीं होता — एक रिश्ता दूसरे रिश्ते को जन्म देता चला जाता है।
यहीं कहीं जीवन की व्याकरण का सबसे गहरा सूत्र दिखाई पड़ता है: जीवन में वस्तुएँ प्राथमिक नहीं, संबंध प्राथमिक हैं। वस्तुएँ रिश्तों में जमकर बने रूप हैं, क्रियाएँ रिश्तों में घटती प्रक्रियाएँ हैं, और कर्ता उन क्रियाओं को सामाजिक रूप से पहचानने के लिए गढ़े गए केंद्र भर हैं। इससे हमारी सामान्य दुनिया उलट जाती है। हम कहते हैं पहले वस्तु है, फिर उसका संबंध; जीवन कहता है पहले संबंध है, संबंधों के जमे हुए विन्यास से वस्तु उभरती है। हम कहते हैं पहले कर्ता है, फिर क्रिया; जीवन कहता है क्रिया रिश्तों के भीतर घटती है, भाषा बाद में उसे किसी कर्ता से जोड़ देती है। हम कहते हैं व्यक्ति समाज में रहता है; जीवन की गहरी नज़र शायद कहती है कि व्यक्ति खुद उन्हीं रिश्तों का जीवंत रूप है जिनसे समाज और प्रकृति दोनों मिलकर उसे रचते हैं।
और यहीं एक बेहद गहरा सूत्र खुलता है — जीवन वस्तुओं को जोड़कर संबंध नहीं बनाता, बल्कि संबंधों के प्रवाह में ही वस्तुएँ और उनकी पहचानें उभर आती हैं। इसलिए जीवन की मूल व्याकरण शायद “कौन?” से नहीं, “किसके साथ?” से शुरू होती है — और उससे भी पहले, “क्या घट रहा है?” से। जहाँ संबंध जीवंत है, वहाँ क्रिया है; जहाँ क्रिया है, वहाँ परिवर्तन है; जहाँ परिवर्तन है, वहाँ जीवन है।
जिस पल हम उस जीवंत रिश्ते को पकड़कर उसे स्थिर नाम, भूमिका, स्वामित्व और पहचान में बदल देते हैं, उसी पल जीवन के ऊपर हमारी गढ़ी हुई दुनिया की एक दूसरी व्याकरण चढ़ने लगती है। जीवन संबंधों में घटित होता है, समाज उन्हें व्यवस्थित करता है, भाषा उन्हें नाम देती है, सत्ता उन्हें स्थिर करती है — और जागरूकता, कभी-कभी, उस पूरी परत के नीचे उतरकर फिर से उसी मूल जीवंत रिश्ते को देख लेती है। शायद यही वह क्षण है जहाँ जीवन अपनी जमी हुई आकृतियों से निकलकर फिर एक बार अपने प्रवाह में लौट आता है।

