“अर्थ का अदृश्य व्याकरण : कविता और गणित में संबंध, संरचना और सत्य की एकात्मकता”

      अर्थ संबंध की तारतम्यता में पैदा होता है। यह तारतम्यता ही व्याकरण है।

   मनुष्य जब किसी वस्तु को देखता है तो सामान्यतः यह मान लेता है कि उसका अर्थ उस वस्तु में पहले से मौजूद है। शब्द का अर्थ शब्द में है, रंग का अर्थ रंग में है, संख्या का अर्थ संख्या में है और कविता का अर्थ उसके शब्दों में है। लेकिन थोड़ा गहरे जाकर देखने पर यह धारणा टूटने लगती है। वस्तु अकेली जितना कहती है, उससे कहीं अधिक वह दूसरी वस्तुओं, संकेतों, क्रियाओं और संरचनाओं के साथ अपने संबंध में कहती है। यही वह बिंदु है जहाँ भाषा, कविता और गणित एक-दूसरे के अत्यंत निकट आ जाते हैं। तीनों के भीतर अर्थ की एक मूलभूत व्याकरण काम करती है—अर्थ किसी एक प्रतीक में बंद नहीं होता; वह प्रतीकों के बीच स्थापित संबंधों की तारतम्यता में उत्पन्न होता है।

    इसीलिए व्याकरण को केवल भाषा के नियमों की सूची मानना उसके वास्तविक स्वरूप को बहुत छोटा कर देना है। व्याकरण मूलतः संबंधों को व्यवस्थित करने की वह शक्ति है जो अलग-अलग इकाइयों को एक ऐसी संरचना में रखती है जहाँ उनसे एक नया अर्थ उत्पन्न हो सके। शब्द अकेला एक संकेत है; शब्दों का संबंध वाक्य बनाता है। रंग अकेला एक दृश्य-संवेदना है; रंगों का संबंध चित्र बनाता है। ध्वनि अकेली एक कंपन है; ध्वनियों का संबंध संगीत बनाता है। संख्या अकेली एक मात्रा है; संख्याओं का संबंध समीकरण और गणितीय संरचना बनाता है। और शब्द, बिंब, ध्वनि, मौन तथा उनके बीच के संबंध जब एक विशिष्ट संरचना ग्रहण करते हैं, तब कविता जन्म लेती है।

    इस अर्थ में कविता और गणित को एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव मानना भ्रामक है। कविता को हम सामान्यतः भाव, कल्पना और बहुअर्थता का क्षेत्र मानते हैं और गणित को तर्क, निश्चितता तथा असंदिग्धता का। लेकिन दोनों की गहराई में एक साझा संरचनात्मक प्रक्रिया काम करती है—इकाइयों का संबंध। अंतर केवल संबंध की प्रकृति, उसकी कठोरता और उसके परिणाम की निश्चितता में है।

   कविता में इस प्रक्रिया को एक छोटी-सी रचना से समझा जा सकता है—

   «एक बूँद गिरी सागर में,

     सागर बूँद में उतर आया।

     न बूँद खोई, न सागर बँटा,

     हर लहर ने नाम नया पाया।»

   यहाँ “बूँद” अकेली हो तो उसका अर्थ जल की एक छोटी मात्रा है। “सागर” अकेला हो तो वह विशाल जलराशि है। इन दोनों शब्दों में अपने-अपने शब्दकोशीय अर्थ मौजूद हैं। लेकिन कविता का अर्थ इन दोनों शब्दों के अलग-अलग अर्थों में नहीं है। अर्थ तब जन्मता है जब “बूँद” और “सागर” एक क्रियात्मक संबंध में प्रवेश करते हैं—”बूँद गिरी सागर में” और फिर कविता उस संबंध को उलट देती है—”सागर बूँद में उतर आया।”

    यहीं कविता शब्दकोश से आगे निकल जाती है। पहली पंक्ति में बूँद सागर में जाती है; दूसरी में सागर बूँद में आ जाता है। भौतिक स्तर पर यह कथन असंभव प्रतीत होता है, लेकिन काव्यात्मक स्तर पर इसी असंभवता के भीतर एक गहरा अर्थ जन्मता है—भाग और समग्र का संबंध, सूक्ष्म और विराट का संबंध, व्यक्ति और ब्रह्मांड का संबंध। बूँद सागर में समाती है तो वह अपना पृथक अस्तित्व खोती हुई दिखाई देती है; लेकिन यदि सागर बूँद में भी उतर आता है, तो बूँद केवल छोटी वस्तु नहीं रह जाती। वह समग्र का वाहक बन जाती है।

    इस प्रकार कविता में अर्थ “बूँद” में नहीं था, “सागर” में भी नहीं था। वह दोनों के बीच निर्मित संबंध में था। और यह संबंध भी स्थिर नहीं था; कविता ने उसे पहले एक दिशा में और फिर दूसरी दिशा में चलाया। यही गति अर्थ को जन्म देती है।

   यहाँ व्याकरण केवल “गिरी”, “उतर आया” जैसी क्रियाओं का व्याकरण नहीं है। यहाँ एक गहरी अर्थ-व्याकरण काम कर रही है—भाग से समग्र की ओर और समग्र से भाग की ओर गति। कविता का वास्तविक अर्थ इसी गति की तारतम्यता में खुलता है।

   यही बात गणित में एक अलग और अधिक कठोर रूप में दिखाई देती है। यूलर की प्रसिद्ध सर्वसमिका—

   e^(iπ) + 1 = 0

  को देखें। यहाँ e, i, π, 1 और 0 अलग-अलग गणितीय संदर्भों से आए प्रतीक हैं। e घातीय वृद्धि और प्राकृतिक लघुगणक की संरचना से जुड़ा है; i काल्पनिक संख्या की इकाई है; π वृत्त और ज्यामिति से जुड़ा है; 1 और 0 गणितीय संरचनाओं में अत्यंत मूलभूत तत्समता-संबंधों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि इन्हें अलग-अलग रखा जाए तो हमारे सामने केवल पाँच गणितीय संकेत हैं। लेकिन जब इन्हें एक विशेष संबंध में रखा जाता है, तो एक ऐसी गणितीय संरचना सामने आती है जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की अवधारणाएँ एक ही सत्य में संगठित हो जाती हैं।

   यहाँ भी अर्थ किसी एक प्रतीक में नहीं है। e अपने आप में वह सत्य नहीं कहता जो पूरी सर्वसमिका कहती है। i अकेला भी उस अर्थ को व्यक्त नहीं करता। π भी नहीं। अर्थ उत्पन्न होता है उनके बीच स्थापित संक्रियात्मक संबंध से। घातांक, गुणन, योग और समता-चिह्न मिलकर एक ऐसी संरचना बनाते हैं जिसमें ये विभिन्न गणितीय संसार एक बिंदु पर आकर जुड़ जाते हैं।

   यही कारण है कि गणितीय समीकरण को केवल प्रतीकों का समूह नहीं कहा जा सकता। समीकरण वास्तव में संबंध का दृश्य रूप है। “=” केवल दो पक्षों के बीच समानता नहीं बताता; वह पूरे समीकरण को एक संरचनात्मक संतुलन प्रदान करता है। इसी प्रकार “+” दो राशियों को जोड़ता है, घातांक किसी संख्या की पुनरावृत्त संरचना को बदल देता है, ऋणात्मक चिह्न दिशा और निरसन का संबंध बनाता है। गणित में संक्रियाएँ स्वयं व्याकरण की तरह काम करती हैं।

   यदि इसे और सरल रूप में देखें तो x + (-x) = 0 में x अकेला एक संख्या या राशि है और -x उसका विपरीत। लेकिन दोनों को अलग-अलग देखने से वह अर्थ उत्पन्न नहीं होता जो समीकरण देता है। जैसे ही दोनों एक योगात्मक संबंध में आते हैं, निरसन की संरचना पैदा होती है। x अपने विपरीत के साथ संबंध स्थापित करता है और परिणाम शून्य होता है। यहाँ शून्य केवल एक संख्या नहीं रह जाता; वह संबंध के परिणाम के रूप में प्रकट होता है। दो विपरीत राशियों के संबंध ने एक तीसरी स्थिति—संतुलन या निरसन—को जन्म दिया।

    यही संरचना कबीर के चिंतन में भी दिखाई देती है। “मैं” और “हरि” को अकेले देखें तो दोनों के अपने-अपने अर्थ हैं। लेकिन—

«जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।»

  यहाँ “मैं” और “हरि” दो शब्द मात्र नहीं रह जाते। “जब…तब” और “अब” के समयगत तथा प्रतिलोम संबंध उन्हें एक ऐसी संरचना में रख देते हैं जिसमें अहं और परम सत्ता के बीच का संबंध खुलता है। कबीर का आशय यह नहीं कि शब्दकोशीय अर्थ में “मैं” और “हरि” दो वस्तुएँ हैं जिनमें से एक को हटाना है। उनकी काव्य-व्यवस्था में “मैं” का विस्तार और “हरि” की अनुपस्थिति तथा “मैं” के क्षय के साथ “हरि” की उपस्थिति एक अंतःसंबंधित प्रक्रिया बन जाती है।

   इस प्रकार यहाँ भी अर्थ किसी एक शब्द में नहीं है। अर्थ उस संबंध में है जिसमें एक की उपस्थिति दूसरे की अनुपस्थिति से और एक की अनुपस्थिति दूसरे की उपस्थिति से अर्थ ग्रहण करती है। यही प्रतिलोम की व्याकरण है।

   इसी संरचना को गणित में x + (-x) = 0 के माध्यम से समझा जा सकता है। कविता अनुभव और चेतना के स्तर पर वही संबंध रचती है जिसे गणित संख्यात्मक संरचना के स्तर पर रचता है। कविता में यह संबंध अस्तित्वगत और आध्यात्मिक अर्थ खोलता है; गणित में यह तार्किक और औपचारिक अर्थ देता है। लेकिन दोनों में अर्थ संबंध की संरचना से पैदा होता है।

   अब बहुलता और एकता की ओर चलें। भारतीय काव्य और संत परंपरा में बार-बार यह भाव आता है कि अनेक रूपों में एक ही मूल सत्ता या प्रकाश व्याप्त है। “एक ही चिराग से जले हैं लाखों दीप” जैसी कल्पना इसी संरचना को सरल दृश्य में सामने रखती है। एक दीपक अकेला है, दूसरा अलग है, तीसरा अलग है और हजारों दीपक अलग-अलग दिखाई देते हैं। उनके पात्र अलग हैं, स्थान अलग हैं, लौ की दृश्य स्थितियाँ अलग हैं। फिर भी यदि सभी दीप एक ही मूल अग्नि से प्रज्वलित हुए हैं तो उनकी बहुलता के भीतर एक संबंध मौजूद है।

    यहाँ अर्थ केवल “एक” और “अनेक” के पृथक अर्थों में नहीं है। अर्थ इस संबंध में है कि अनेक को एक से कैसे जोड़ा गया है। एक स्रोत अनेक अभिव्यक्तियों में प्रकट होता है। इस संबंध के बिना हमारे सामने केवल हजार अलग-अलग दीप हैं; संबंध स्थापित होते ही बहुलता के भीतर एकता का विचार जन्म लेता है।

    गणित में फूरिए श्रेणी इसी बात का एक अद्भुत औपचारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। किसी जटिल तरंग या संकेत को अनेक सरल साइन और कोसाइन तरंगों के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। अकेली साइन तरंग अत्यंत सरल है। वह नियमित रूप से ऊपर-नीचे होती है। लेकिन जब अनेक सरल तरंगें विशिष्ट आवृत्तियों और आयामों के साथ एक-दूसरे पर आरोपित होती हैं, तो उनसे अत्यंत जटिल संकेत निर्मित हो सकते हैं।

   इसे संगीत के माध्यम से और सरलता से समझा जा सकता है। किसी वाद्य की आवाज़ केवल एक शुद्ध सुर नहीं होती। उसके भीतर मूल आवृत्ति के साथ अनेक हार्मोनिक घटक होते हैं। इन घटकों का अनुपात बदलते ही ध्वनि का “स्वरूप” बदल जाता है। यही कारण है कि एक ही पिच पर बजने वाला वायलिन, बाँसुरी और मानव-स्वर अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं। मूल सुर समान हो सकता है, लेकिन उनके बीच का संबंध अलग है। इसलिए अनुभव अलग है।

   यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात सामने आती है—अर्थ केवल घटकों की उपस्थिति से नहीं, उनके अनुपात से भी उत्पन्न होता है। वही घटक अलग अनुपात में हों तो पूरी संरचना का अनुभव बदल सकता है। इसीलिए व्याकरण केवल यह निर्धारित नहीं करता कि कौन-सी इकाइयाँ मौजूद हैं; वह यह भी निर्धारित करता है कि वे किस क्रम, किस अनुपात, किस दिशा और किस संबंध में उपस्थित होंगी।

   इसी सिद्धांत को भोजन के स्वाद से भी समझा जा सकता है। नमक, मिठास, खट्टापन, कड़वाहट और तीखापन अलग-अलग स्वादात्मक अनुभव हैं। लेकिन किसी व्यंजन की वास्तविक पहचान केवल इन तत्वों की उपस्थिति से नहीं बनती; वह इस बात से बनती है कि वे किस मात्रा और किस क्रम में एक-दूसरे के साथ आए हैं। थोड़ी-सी मिठास और अधिक खट्टापन एक स्वाद पैदा करेगा; वही मिठास यदि नमक और मसाले के साथ दूसरे अनुपात में आए तो बिल्कुल अलग स्वाद उत्पन्न होगा। इस अर्थ में व्यंजन भी एक प्रकार की “स्वाद-व्याकरण” का परिणाम है।

   यही बात रंगों पर लागू होती है। लाल अकेला लाल है, नीला अकेला नीला है। लेकिन चित्र में लाल और नीले का संबंध, उनकी दूरी, अनुपात, तीव्रता और आसपास के रंगों के साथ उनका संवाद पूरी दृश्य संरचना का अर्थ बदल देता है। इसलिए चित्रकला में भी रंग अपने आप में अर्थ का अंतिम स्रोत नहीं हैं; उनका संबंध दृश्य अर्थ की संरचना करता है।

   यहाँ से भाषा की ओर लौटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। “राम”, “वन”, “गया”—ये तीन शब्द अलग-अलग अर्थ रखते हैं। लेकिन “राम वन गया” और “वन राम गया” समान शब्दों से बने होते हुए भी समान अर्थ नहीं देते। शब्द वही हैं, लेकिन संबंधों का क्रम बदल गया। भाषा का व्याकरण इसी संबंध-संगठन को नियंत्रित करता है। शब्दों का क्रम, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, काल और वाक्य-संरचना मिलकर अर्थ की दिशा निर्धारित करते हैं।

   इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि शब्द अर्थ के कच्चे पदार्थ हैं, व्याकरण अर्थ की संरचना है।

   कविता इस संरचना को और जटिल बना देती है। सामान्य भाषा में वाक्य का उद्देश्य अपेक्षाकृत स्पष्ट अर्थ देना होता है, जबकि कविता में वही भाषा एक से अधिक अर्थ-स्तरों को सक्रिय कर सकती है। रूपक, प्रतीक, ध्वनि, लय, विराम, पुनरावृत्ति, विरोधाभास और बिंब—ये सब संबंधों के अतिरिक्त स्तर बनाते हैं।

   तुलसीदास की पंक्ति— “सिय राममय सब जग जानी” को देखें। “सिय”, “राम”, “जग” और “मय” अलग-अलग शब्द हैं। लेकिन “मय” की व्याप्ति-सूचक संरचना पूरे वाक्य को बदल देती है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि जगत में कहीं-कहीं सीता-राम हैं; बल्कि जगत को ही सीता-राममय देखने की दृष्टि निर्मित होती है। शब्दों का संबंध एक दार्शनिक दृष्टि में बदल जाता है।

   इसी प्रकार आइंस्टाइन का प्रसिद्ध समीकरण E = mc² भी अपने भीतर एक संबंधात्मक क्रांति रखता है। ऊर्जा और द्रव्यमान दैनिक अनुभव में अलग-अलग प्रतीत होते हैं। लेकिन समीकरण बताता है कि वे एक गहरे भौतिक संबंध में बँधे हैं। यहाँ “=” केवल भाषा का “है” नहीं है; यह भौतिक जगत की एक मात्रात्मक समानता को व्यक्त करता है, जिसमें प्रकाश की गति का वर्ग रूपांतरण का पैमाना निर्धारित करता है। इस संबंध के माध्यम से द्रव्यमान और ऊर्जा को एक ही भौतिक संरचना के परस्पर रूपांतरित होने वाले पक्षों के रूप में समझा जा सकता है।

   इस बिंदु पर कविता और गणित की समानता और उनका अंतर दोनों स्पष्ट होते हैं। कविता में संबंध बहुअर्थी हो सकता है; उसमें पाठक की स्मृति, संस्कृति, अनुभव और संवेदना प्रवेश करती है। गणित में संबंध औपचारिक नियमों से नियंत्रित होता है और उसके परिणाम को उसी प्रणाली के भीतर सत्यापित किया जा सकता है। कविता का अर्थ खुल सकता है; गणित का परिणाम सिद्ध किया जाता है। कविता अर्थ की संभावनाओं को विस्तृत करती है; गणित संभावनाओं को संरचना में बाँधता है। फिर भी दोनों में अर्थ का जन्म किसी अकेले प्रतीक से नहीं, बल्कि प्रतीकों के पारस्परिक संगठन से होता है।

   यहीं “व्याकरण” की अवधारणा अपने सबसे व्यापक अर्थ में सामने आती है। व्याकरण केवल भाषा की पुस्तक में लिखे नियम नहीं हैं। व्याकरण वह अदृश्य संरचना है जो यह निर्धारित करती है कि कौन-सी इकाई किस दूसरी इकाई के साथ कैसे संबंध बनाएगी और उस संबंध से किस प्रकार की संरचना उत्पन्न होगी।

   इस अर्थ में गणित की अपनी व्याकरण है। संगीत की अपनी व्याकरण है। चित्रकला की अपनी व्याकरण है। स्थापत्य की अपनी व्याकरण है। विज्ञान की अपनी औपचारिक व्याकरण है। सामाजिक व्यवहार की भी एक व्याकरण होती है। यहाँ तक कि किसी संस्कृति में अभिवादन करने का तरीका भी एक संबंध-व्याकरण के भीतर अर्थ ग्रहण करता है।

   अर्थात् मनुष्य की समस्त प्रतीकात्मक दुनिया को यदि एक गहरी दृष्टि से देखें तो हम पाते हैं कि वह वस्तुओं की दुनिया से अधिक संबंधों की दुनिया है।

   एक शब्द अकेला हो तो वह संभाव्यता है। दूसरे शब्द से जुड़ते ही दिशा प्राप्त करता है। तीसरे से जुड़ते ही संरचना बनती है। अनेक संबंधों की तारतम्यता से वाक्य बनता है, वाक्यों से विचार, विचारों से दर्शन और अनुभवों से संस्कृति। इसी प्रकार एक संख्या दूसरी संख्या से संबंध बनाती है तो गणना होती है; अनेक गणनाएँ किसी नियम में संगठित होती हैं तो गणितीय संरचना बनती है; और अनेक संरचनाएँ मिलकर विज्ञान की भाषा बनाती हैं।

   इसलिए “अर्थ” को किसी वस्तु के भीतर बंद पदार्थ की तरह देखना शायद पर्याप्त नहीं है। अर्थ अधिकतर एक उद्भूत सत्ता है—जो संबंधों के बनने पर प्रकट होती है। बूँद और सागर के बीच संबंध से अद्वैत का बोध निकलता है। x और -x के संबंध से निरसन और शून्य की संरचना निकलती है। अनेक सरल तरंगों के संबंध से जटिल ध्वनि निकलती है। ऊर्जा और द्रव्यमान के संबंध से भौतिक जगत की एकता का नया बोध मिलता है। अलग-अलग शब्दों के संबंध से कविता बनती है।

   यहीं से एक और गहरी बात सामने आती है—संबंध केवल अर्थ को जोड़ता नहीं, अर्थ को उत्पन्न करता है।

    यदि संबंध हटा दें तो हमारे पास प्रतीकों का ढेर बचता है। शब्द हैं, लेकिन वाक्य नहीं। रंग हैं, लेकिन चित्र नहीं। ध्वनियाँ हैं, लेकिन संगीत नहीं। संख्याएँ हैं, लेकिन समीकरण नहीं। पात्र हैं, लेकिन कथा नहीं। घटनाएँ हैं, लेकिन इतिहास की व्याख्या नहीं।

    इसलिए किसी भी जटिल रचना को समझने का सबसे गहरा तरीका उसके घटकों की सूची बनाना नहीं, बल्कि उनके बीच के संबंधों को देखना है। कविता में यह देखना कि कौन-सा शब्द किस शब्द को बदल रहा है; गणित में यह देखना कि कौन-सी राशि किस संक्रिया से जुड़ी है; संगीत में यह देखना कि कौन-सा सुर किस सुर के साथ किस अनुपात में है; रंग में यह देखना कि कौन-सा रंग दूसरे के निकट या विपरीत किस प्रभाव को पैदा कर रहा है।

   यहीं “तारतम्यता” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। केवल संबंध पर्याप्त नहीं है; संबंधों की क्रमबद्धता और अनुपातिकता भी आवश्यक है। शब्दों को किसी भी क्रम में रख देने से कविता नहीं बनती। संख्याओं को किसी भी तरह जोड़ देने से गणितीय सत्य नहीं बनता। ध्वनियों को बेतरतीब मिला देने से संगीत नहीं बनता। संबंधों को एक ऐसी संरचना में आना पड़ता है जहाँ उनके बीच का तनाव, संतुलन, पुनरावृत्ति, परिवर्तन और दिशा एक समग्र अर्थ रच सकें।

    इस दृष्टि से व्याकरण वास्तव में “तारतम्यता का विज्ञान” कहा जा सकता है। वह बताता है कि अलग-अलग तत्वों को किस प्रकार एक ऐसी व्यवस्था में रखा जाए कि उनमें छिपी संभावनाएँ सक्रिय हो जाएँ। और शायद यहीं कविता और गणित का सबसे गहरा मिलन होता है। कविता कहती है—दो शब्दों को ऐसे मिलाओ कि उनके बीच तीसरा अर्थ जन्म ले। गणित कहता है—दो या अधिक राशियों को ऐसे संबंध में रखो कि उनके बीच कोई सत्य उद्घाटित हो। संगीत कहता है—ध्वनियों को ऐसे क्रम में रखो कि उनमें से स्वरूप और भाव प्रकट हो। चित्रकला कहती है—रंगों और रेखाओं को ऐसे संबंध में रखो कि दृश्य के भीतर एक अनुभव जन्म ले। विज्ञान कहता है—घटनाओं के बीच ऐसा संबंध खोजो कि प्रकृति का कोई नियम सामने आए।

   इस प्रकार सभी रचनात्मक और ज्ञानात्मक क्रियाओं के भीतर एक गहरी साझा प्रक्रिया दिखाई देती है—विभिन्नताओं को संबंध में लाना और संबंध से ऐसी संरचना उत्पन्न करना जो अकेले घटकों में दिखाई नहीं देती थी।

   इसलिए यह कहना कि “प्रतीक स्वयं मौन हैं; संबंध उन्हें बोलने पर विवश करता है” केवल एक काव्यात्मक कथन नहीं है। यह भाषा, गणित, संगीत, कला और विज्ञान के बीच एक गहरे संरचनात्मक संबंध की ओर संकेत करता है। प्रतीक संभावनाएँ लेकर आते हैं, लेकिन संबंध उन संभावनाओं को सक्रिय करता है। व्याकरण उस सक्रियता को दिशा देता है और संरचना उसे स्थायित्व देती है।

   अंततः कविता और गणित की व्याकरणिक एकता इस बात में नहीं है कि दोनों में कुछ समान प्रतीक मिल जाते हैं, बल्कि इस बात में है कि दोनों अर्थ को संबंधों की संरचना के रूप में निर्मित करते हैं। कविता में यह संरचना भाव, बिंब, रूपक, ध्वनि और सांस्कृतिक स्मृति के माध्यम से खुलती है; गणित में यह संक्रिया, समानता, अनुपात, क्रम और प्रमाण के माध्यम से। कविता अर्थ की संभावनाओं को खोलती है, गणित सत्य की संरचना को कठोर करता है; लेकिन दोनों के नीचे एक ही मूल प्रश्न धड़कता है—ये इकाइयाँ आपस में किस प्रकार संबंधित हैं?

   शायद इसी प्रश्न से मनुष्य की समस्त ज्ञान-यात्रा शुरू होती है। अकेली बूँद केवल बूँद है। अकेला सागर केवल सागर। लेकिन बूँद और सागर के संबंध से एक नया ब्रह्मांड खुल सकता है। अकेला x केवल x है। उसका प्रतिलोम केवल -x। लेकिन दोनों के संबंध से शून्य प्रकट हो सकता है। अकेला सुर केवल एक ध्वनि है। अनेक सुरों के संबंध से संगीत जन्म सकता है। अकेला शब्द केवल संकेत है। शब्दों की तारतम्यता से कविता जन्म सकती है। और शायद यही सबसे गहरी व्याकरण है—वस्तुओं की नहीं, संबंधों की व्याकरण।

   प्रतीक उस व्याकरण के अक्षर हैं, संबंध उसके शब्द, संरचना उसका वाक्य और अर्थ उसका उद्भव। जहाँ संबंध टूटता है, वहाँ अर्थ बिखर जाता है; जहाँ संबंध जीवित और सुसंगत होता है, वहाँ अर्थ अपने आप प्रकट होने लगता है।

   इसलिए कविता और गणित दो अलग भाषाएँ होकर भी एक ही गहरे रहस्य की ओर संकेत करती हैं—अर्थ वस्तुओं में नहीं रहता; अर्थ वस्तुओं के बीच घटित होता है। और शायद मनुष्य की पूरी सभ्यता इसी “बीच” को पढ़ने की कोशिश है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *