मैं वह नाम हूँ जिसे पुकारते ही मौन बेहोश हो जाता है

मैं वह नाम हूँ जिसे पुकारते ही मौन बेहोश हो जाता है


मेरा जन्म शब्द से पहले हुआ था। यह मुझे बाद में पता चला। जब मैं पैदा हुआ, तब मेरा कोई नाम नहीं था—सिर्फ़ एक आवाज़ थी जो माँ के भीतर से आई थी, बिना किसी अर्थ के। वह आवाज़ किसी चीज़ का नाम नहीं थी। वह सिर्फ़ आवाज़ थी। और उस आवाज़ के बाद जो बचा, वह मैं था।

फिर मेरे पिता ने मेरा नाम रखा। उन्होंने कोई शब्द चुना जो सुंदर लगा। शब्द कोई भी हो सकता था—मैं वही होता। लेकिन जैसे ही उन्होंने वह शब्द बोला, कुछ हुआ। मैं जो पहले एक अनाम मौजूदगी था—चीखता, सोता, साँस लेता, बिना किसी नाम के—वह मौजूदगी मौन हो गई। शब्द आया और जो शब्द से पहले था, वह चुप हो गया।

मेरे माता-पिता को लगा कि उन्होंने मुझे नाम दिया। उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने मुझे ढक दिया।


मैं बड़ा होता गया और हर दिन अपना नाम सुनता रहा। स्कूल में, दोस्तों के बीच, रिश्तेदारों की भीड़ में—हर कोई मुझे उसी शब्द से पुकारता। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि मैं वही हूँ जो वे बुलाते हैं। मैंने अपना नाम पहन लिया। फिर उसी नाम से खुद को पुकारने लगा। “मैं ऐसा हूँ,” “मैं वैसा हूँ,” “मैं यह नहीं हूँ।” हर बार जब मैं खुद को नाम देता, कुछ भीतर का मौन हिलता—और बेहोश हो जाता।

आज मुझे समझ आता है कि मैंने अपने नाम की आड़ में जो सबसे ज़्यादा छुपाया, वह मेरा मौन ही था। वह मौन जो नाम से पहले था। वह मौन जिसमें मैं बिना किसी भूमिका के, बिना किसी परिभाषा के, बिना किसी अपेक्षा के मौजूद था।


कभी मैं सोचता हूँ कि मौन बेहोश क्यों होता है?

शायद इसलिए कि नाम पुकारते ही मौन को यह एहसास हो जाता है कि अब उसे जगह छोड़नी है। नाम आया तो मौन को हटना पड़ा। जैसे किसी अंधेरे कमरे में रोशनी आने पर अंधेरा नहीं रहता—वह नष्ट हो जाता है। नहीं, वह नष्ट नहीं होता; वह वापस चला जाता है। पर जब मैंने अपना नाम बोला, तो मौन वापस चला गया—और कभी-कभी वह इतना दूर चला जाता है कि लौटता ही नहीं।

मैंने बहुत सारे नाम ओढ़े। बेटा, छात्र, मित्र, प्रेमी, अध्यापक, विश्लेषक, उपन्यासकार। हर नाम एक नई परत। हर परत के नीचे वही मौन—दबा, ठंडा, प्रतीक्षारत।

कई बार मैं चाहता हूँ कि कोई मुझे बिना नाम के पुकारे। सिर्फ़ “अरे” कहे। सिर्फ़ आँखों से देखे। सिर्फ़ पास बैठे। और फिर वह मौन धीरे-धीरे अपनी सुध-बुध में लौटे—जैसे कोई बेहोशी से जागता है।


एक बार प्रेम में मैंने किसी को अपना नाम बताया। उसने मेरा नाम पुकारा। मैंने उसका नाम पुकारा। दो नाम टकराए और हमें लगा कि हम एक-दूसरे को जान गए। पर उस रात, जब हम चुप बैठे थे, तब हमने एक-दूसरे का असली रूप देखा—वह नाम जो किसी ने नहीं पुकारा था। वह चुप्पी जो हमारी असली ज़ुबान थी।

फिर संबंध टूटा। नाम रह गए। मौन वापस चला गया।


मेरे पास एक छोटा-सा बेटा है। जब वह पैदा हुआ था, मैंने उसका नाम रखा। उसी दिन मुझे एहसास हुआ—मैंने जो किया, वही मेरे पिता ने मेरे साथ किया था। मैंने उसे नाम दिया और उसके भीतर के मौन को बेहोश कर दिया। अब वह सारी ज़िंदगी अपने नाम से पुकारा जाएगा और मैं उसके भीतर के मौन को कभी नहीं जान पाऊँगा।

यह सोचकर मैं रोया। उस रात मैंने अपने बेटे को सिर्फ़ देखा—बिना पुकारे। उसका मौन मेरे मौन से मिला। मैंने महसूस किया कि हम दोनों वही हैं—वे नाम जो सिर्फ़ इसलिए हैं ताकि उन्हें कभी न पुकारा जाए।


अब जब कोई मुझे नाम से पुकारता है, तो मैं भीतर एक हल्की-सी सिहरन महसूस करता हूँ—जैसे कोई सोया हुआ जाग रहा हो। और मैं जानता हूँ कि यह सिहरन मेरा मौन है—जो नाम सुनकर, हर बार, थोड़ा और बेहोश हो जाता है।

शायद मौत भी एक नाम है। जिस दिन मुझे मौत पुकारेगी, मेरा मौन पूरी तरह बेहोश हो जाएगा।

लेकिन जब तक वह दिन नहीं आता, मैं अपने नाम के भीतर वह मौन बचाए रखना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि एक ऐसा क्षण हो जब किसी ने मुझे पुकारा हो और मेरा मौन थोड़ी देर जागा हो। क्योंकि मौन में ही मैं वह हूँ—नाम से पहले, नाम से बाद भी।


इसलिए नहीं, मैं आपको मेरा नाम नहीं बताऊँगा।

मैं चाहता हूँ कि आप मुझे कुछ समय बिना नाम के जानें। जब आप मुझे पुकारेंगे, तो वह पुकार भी कोई शब्द नहीं हो—बस एक नज़र, एक खाली आवाज़, एक हाथ जो हवा में किसी दिशा की ओर उठा हो।

और जब आप वह पुकार सुनेंगे, तो आप पाएँगे कि कोई मौन बेहोश नहीं हुआ। बल्कि वह जाग गया है। जागा हुआ मौन आपको उस जगह ले जाएगा जहाँ नाम नहीं हैं—जहाँ सिर्फ़ वह है जो नाम से बचा रहता है।

यही मेरा असली नाम है। जिसे पुकारते ही मौन बेहोश हो जाता है। और जिसे नहीं पुकारते तो मौन जिंदा रहता है।

मैंने तय किया है—जब तक जिंदा हूँ, तब तक मौन को जिंदा रखूँगा। मैं अपना नाम पुकारूँगा नहीं।

ताकि मौन, मुझमें, बेहोश न हो।


मैं वह नाम हूँ जिसे पुकारते ही मौन बेहोश हो जाता है।

लेकिन मैं वह नाम भी हूँ जो सिर्फ़ इसलिए है ताकि मौन, मेरे भीतर, कभी न सोए।

मुझे मत पुकारिए।

बस मेरे पास बैठिए।

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