शब्दों से पहले

शब्दों से पहले

विचार का जन्म हमेशा शब्दों की प्रसूति-गृह में नहीं होता। कई बार वह शरीर की त्वचा पर उभरती एक अनाम लहर होता है, कान के भीतर ठहर गई कोई अधूरी प्रतिध्वनि, आँख की पुतली पर क्षणभर चमककर मिट जाने वाला कोई दृश्य, या मांसपेशियों में जमा वह तनाव जिसे चेतना अभी कोई नाम नहीं दे पाई है। हम प्रायः मान लेते हैं कि जो सोचा गया है, वह किसी वाक्य में ही सोचा गया है, और जो वाक्य में नहीं आया, वह अभी सोच ही नहीं बना। पर अपने भीतर थोड़ा ठहरकर देखें तो यह मान्यता डगमगाने लगती है। भाषा को यहाँ प्रमाण की तरह नहीं, उस घटना की तरह देखना होगा जो अनुभव के बाद आती है।

कल्पना कीजिए कि एक शिशु पहली बार जलती हुई लौ के निकट हाथ ले जाता है। त्वचा तक पहुँचती ऊष्मा, हाथ का अचानक पीछे हट जाना, चेहरे पर उभरता विस्मय और देह में उतर आई सावधानी, ये सब घटित हो जाते हैं, जबकि उसके पास ‘गर्मी’, ‘खतरा’, ‘दूरी’ या ‘आग’ जैसा कोई शब्द नहीं है। फिर भी संसार के बारे में एक भेद उसके भीतर अंकित हो चुका है। वह अभी वाक्य नहीं है, पर वह ऐसा अनुभव है जो आगे के व्यवहार की दिशा बदल देता है।

वयस्क जीवन में भी यही होता है। किसी अपरिचित कमरे में प्रवेश करते ही कभी-कभी एक असहजता हमें घेर लेती है, और हम बता नहीं पाते कि क्यों। बाद में ध्यान जाता है कि रोशनी कुछ अस्वाभाविक थी, आवाज़ों के बीच अजीब ठहराव था, या लोगों की दृष्टि में कोई अनकहा तनाव तैर रहा था। निर्णय पहले एक धुँधली, समग्र अनुभूति के रूप में उपस्थित हुआ, और उसके कारणों की भाषाई पहचान बाद में बनी। इसका अर्थ यह नहीं कि हर अंतर्ज्ञान सही होता है। अर्थ केवल इतना है कि मानसिक प्रक्रिया का आरंभ किसी स्पष्ट कथन से होना आवश्यक नहीं।

संगीत में यह बात और साफ़ दिखती है। राग में उतरता हुआ कोई स्वर, तबले की अप्रत्याशित थाप के बाद पसरी रिक्ति, बाँसुरी की काँपती हुई ध्वनि, ये हमारे भीतर ऐसी अनुभूति जगा देते हैं जिसे अनेक वाक्य भी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। संगीत सुनते हुए हम केवल ध्वनियाँ नहीं गिनते। हमारा ध्यान बदलता है, स्मृतियाँ जाग उठती हैं, शरीर की गति धीमी या तीव्र हो जाती है, और कभी कोई बीता हुआ समय अपनी पूरी उपस्थिति के साथ वर्तमान में लौट आता है। यहाँ अर्थ किसी शब्दकोश में नहीं रहता। वह स्वरों के संबंध, उनके अंतराल और हमारी अनुभूति के पारस्परिक स्पंदन में बनता है।

चित्रकला भी यही रहस्य खोलती है। मान लीजिए किसी चित्र में एक खाली कुर्सी है, आधा खुला दरवाज़ा है और खिड़की से आती फीकी रोशनी है। कलाकार ने कहीं नहीं लिखा कि कोई व्यक्ति अनुपस्थित है, कोई प्रतीक्षा अधूरी है या कोई संबंध टूट चुका है। फिर भी देखने वाले के भीतर अनुपस्थिति, प्रतीक्षा या विछोह का अर्थ आकार ले सकता है। इस अर्थ का स्रोत अकेले चित्र में नहीं है। वह दर्शक की स्मृति, उसके सांस्कृतिक अनुभव और उसकी कल्पना के साथ चित्र की अंतःक्रिया में है। चित्र ने विचार को वाक्य में नहीं कहा, उसने विचार के जन्म के लिए परिस्थितियाँ रच दीं।

शरीर की गति में भी यही दिखता है। साइकिल चलाना सीखते समय हम हर क्षण यह वाक्य नहीं दोहराते कि अब दायाँ हाथ थोड़ा मोड़ना है, भार संतुलित करना है और पैडल पर इतना दबाव देना है। अभ्यास के साथ अनेक समन्वयात्मक प्रक्रियाएँ ऐसी दक्षता में ढल जाती हैं जिसे हम सहज भाव से निभा लेते हैं। यह प्रक्रियात्मक ज्ञान है, यानी ऐसा जानना जो हमेशा स्पष्ट भाषाई व्याख्या के रूप में उपलब्ध नहीं होता। मस्तिष्क की अनेक प्रक्रियाएँ सचेत शब्दांकन से स्वतंत्र रहकर भी अपना काम करती रहती हैं।

और प्रेम? किसी परिचित के चेहरे पर क्षणभर को उतर आई थकान देखकर हम समझ जाते हैं कि आज कुछ ठीक नहीं है। अभी कोई प्रश्न नहीं पूछा गया, कोई उत्तर नहीं मिला, कोई निष्कर्ष शब्दों में नहीं बना। फिर भी चेहरे की सूक्ष्म हलचल, आवाज़ की बदली हुई लय और व्यवहार में आए परिवर्तन से एक अर्थ ग्रहण किया जा चुका है। यह अर्थ अधूरा या भ्रामक भी हो सकता है, पर भाषा से पहले उसका उभर आना संभव है, और अक्सर यही होता है।

इन सारे उदाहरणों को एक सूत्र में रखें तो एक क्रम उभरता है: अनुभव का बीज, फिर संवेदना का कंपन, फिर अर्थ की आकृति, फिर विचार का संगठन, और अंत में वाक्य का जन्म। पर यह क्रम हर परिस्थिति में अनिवार्य या सीधी रेखा में चलने वाला नहीं है। कभी शब्द पुराने अनुभव को नया आकार दे देते हैं। कभी भाषा स्वयं ऐसी अवधारणा को जन्म देती है जिसकी कल्पना पहले संभव ही नहीं थी। फिर भी इन उदाहरणों से इतना स्पष्ट है कि मानसिक जीवन का पूरा क्षेत्र भाषाई कथनों तक सीमित नहीं है।

यहाँ एक निर्णायक अंतर समझना ज़रूरी है। अनुभूति, सूचना, मानसिक प्रतिरूप और विचार एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। हर स्पर्श विचार नहीं बन जाता, हर चित्र अर्थ नहीं दे देता, और हर भावना कोई सुव्यवस्थित निष्कर्ष नहीं होती। पर ये सब विचार के निर्माण में हिस्सा ले सकते हैं। मन कभी संसार को शब्दों में पढ़ता है, कभी संबंधों में पहचानता है, कभी शरीर के माध्यम से सीखता है, और कभी किसी अस्पष्ट संकेत को धीरे-धीरे अर्थ में बदल लेता है।

इसीलिए मूल कथन का सबसे सटीक प्रमाण यह नहीं कि शब्द अनावश्यक हैं। प्रमाण यह है कि शब्द विचार की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति और संगठन-व्यवस्था हैं, पर विचार के हर संभावित आरंभ की अनिवार्य शर्त नहीं। वाक्य मन की पूरी गतिविधि नहीं है। वह उस गतिविधि का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें बिखरे हुए अनुभवों को क्रम, संबंध और सार्वजनिक संप्रेषण की क्षमता मिलती है। उससे पहले भी मन में बहुत कुछ चलता रहता है, और उसके बाद भी अर्थ का बहुत कुछ ऐसा बचा रह जाता है जिसे भाषा छू तो सकती है, पर पूरी तरह समेट नहीं सकती।

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