सरकारी बुद्धिजीवी और लाचार सहमति : शिक्षा, सत्ता और आत्मनिर्णय का संकट
मैं पिछले तीस वर्षों से सरकारी बुद्धिजीवियों की श्रेणी का एक पैरासाइट हूँ। इस वाक्य को लिखना मेरे लिए किसी व्यवस्था के विरुद्ध आरोप लगाना नहीं, बल्कि अपने ही जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखने जैसा है। इतने लंबे समय तक किसी संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा रहने के बाद व्यक्ति को एक दिन यह प्रश्न घेरने लगता है कि उसने उस व्यवस्था को कितना दिया और उस व्यवस्था ने उससे क्या लिया। वेतन, सुरक्षा, पद, सामाजिक प्रतिष्ठा और एक निश्चित जीवन-व्यवस्था के बदले क्या केवल श्रम लिया गया, या धीरे-धीरे कुछ ऐसा भी लिया गया जिसकी कीमत किसी वेतन-पर्ची में दर्ज नहीं होती—समय, स्वतंत्रता, प्रश्न करने की क्षमता, असहमति का साहस और अंततः अपने ही बौद्धिक अस्तित्व पर अधिकार?
सरकारी सेवा का अपना महत्व है। वह व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा देती है, उसके जीवन को स्थिरता देती है और उसे सामाजिक भूमिका प्रदान करती है। इसलिए समस्या सरकारी नौकरी में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब नौकरी की संस्थागत संरचना इतनी व्यापक हो जाती है कि वह व्यक्ति के मूल पेशेवर अस्तित्व को अपने भीतर समाहित कर लेती है। एक शिक्षक धीरे-धीरे शिक्षक कम और प्रशासनिक कार्यकर्ता अधिक होता जाता है। उसके सामने लगातार ऐसे कार्य आते रहते हैं जिनका शिक्षा, अध्ययन, शोध और अध्यापन से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। इनमें से प्रत्येक कार्य अपने आप में छोटा, आवश्यक या परिस्थितिजन्य दिखाई दे सकता है, लेकिन जब वे लगातार आते रहते हैं तो वे मिलकर शिक्षक के जीवन की मूल दिशा बदल देते हैं।
व्यवस्था शायद ही कभी सीधे कहती है कि तुम्हें पढ़ना नहीं है, शोध नहीं करना है, लिखना नहीं है या विद्यार्थियों से बौद्धिक संवाद नहीं करना है। वह केवल इतना करती है कि इन सबके लिए समय कम करती जाती है। यही प्रक्रिया सबसे अधिक अदृश्य होती है। शिक्षक को उसके मूल कार्य से हटाने के लिए किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती। उसे इतने काम दे दिए जाते हैं कि उसका मूल काम उसके पास बचा ही नहीं रहता। वह दिन भर व्यस्त रहता है, लेकिन उसकी व्यस्तता का बड़ा हिस्सा उसके पेशे की आत्मा से जुड़ा नहीं होता। वह संस्थान के लिए लगातार उपलब्ध रहता है, लेकिन अपने अध्ययन के लिए अनुपलब्ध होता जाता है।
यहाँ शिक्षा व्यवस्था का एक गहरा विरोधाभास सामने आता है। शिक्षक का सबसे मूल्यवान योगदान उसका प्रशासनिक श्रम नहीं, उसकी बौद्धिक उपस्थिति है। वह जितना अधिक पढ़ता है, जितना अधिक सोचता है, जितना अधिक शोध करता है और जितना अधिक अपने विद्यार्थियों के साथ विषय और जीवन के प्रश्नों पर संवाद करता है, उतना ही वह एक शिक्षक के रूप में अर्थवान होता है। लेकिन संस्थागत व्यवस्था में इन कार्यों के परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देते। किसी शिक्षक ने एक वर्ष में कितनी फाइलें निपटाईं, कितनी रिपोर्टें भेजीं, कितने कार्यक्रमों में विद्यार्थियों की उपस्थिति सुनिश्चित की, कितने प्रमाणपत्र तैयार किए—इन सबका हिसाब लगाया जा सकता है। लेकिन उसने कितने विद्यार्थियों में प्रश्न करने की क्षमता जगाई, कितनी छात्राओं को पहली बार किसी गंभीर पुस्तक की ओर प्रेरित किया, कितनी बौद्धिक बातचीत ने किसी विद्यार्थी की दृष्टि बदली, कितनी रातें उसने किसी विचार को समझने में बिताईं—इनका कोई आसान प्रशासनिक मापदंड नहीं है।
इसलिए संस्थागत संस्कृति धीरे-धीरे उन कार्यों को अधिक महत्व देने लगती है जिन्हें दर्ज किया जा सकता है और उन कार्यों को कम महत्व मिलने लगता है जिन्हें अनुभव किया जा सकता है लेकिन आसानी से मापा नहीं जा सकता। यहीं से शिक्षा की आत्मा और प्रशासन की प्राथमिकताओं के बीच दूरी पैदा होती है।
शिक्षक इस दूरी को सबसे पहले अपने समय में महसूस करता है। अध्ययन का समय टूटता है। शोध का समय टूटता है। लेखन का समय टूटता है। विद्यार्थियों से संवाद का समय टूटता है। मन में उठने वाले प्रश्नों पर ठहरने का समय टूटता है। विचार को परिपक्व होने के लिए जिस मानसिक एकांत की आवश्यकता होती है, वह लगातार आने वाले छोटे-छोटे दायित्वों के बीच बिखर जाता है। व्यक्ति पढ़ना चाहता है, लेकिन तभी कोई आदेश आता है। वह लिखना चाहता है, तभी कोई बैठक होती है। वह विद्यार्थियों के साथ किसी विषय पर गहराई से चर्चा करना चाहता है, तभी किसी आयोजन की व्यवस्था सामने आ जाती है। वह शोध की किसी नई दिशा पर विचार करना चाहता है, तभी किसी प्रशासनिक रिपोर्ट की समय-सीमा सामने आ जाती है।
धीरे-धीरे मनुष्य अपने समय को स्वयं व्यवस्थित करना छोड़ देता है। उसके दिन का अर्थ उसके अपने बौद्धिक उद्देश्यों से नहीं, बाहर से आने वाले कार्यों से तय होने लगता है। उसकी दिनचर्या में प्राथमिकताएँ उसकी अपनी नहीं रह जातीं। वह प्रतिक्रियाशील जीवन जीने लगता है। कोई काम आया, उसने किया। दूसरा आया, उसने किया। तीसरा आया, उसने किया। इस निरंतर प्रतिक्रिया के बीच एक समय ऐसा आता है जब उसे यह याद करना कठिन हो जाता है कि वह स्वयं क्या करना चाहता था।
यहीं आत्मनिर्णय का प्रश्न उठता है।
आत्मनिर्णय केवल यह अधिकार नहीं है कि व्यक्ति अपने जीवन का कोई बड़ा निर्णय स्वयं ले सके। आत्मनिर्णय का अर्थ अपने समय, अपने श्रम और अपनी बौद्धिक ऊर्जा की प्राथमिकताएँ निर्धारित करने की क्षमता भी है। जिस व्यक्ति को अपने समय के उपयोग पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं है, वह औपचारिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी व्यवहार में सीमित स्वायत्तता का जीवन जी सकता है। वह अपनी नौकरी नहीं छोड़ना चाहता, वह व्यवस्था को नष्ट नहीं करना चाहता, वह अपने दायित्वों से भागना नहीं चाहता; लेकिन वह यह भी चाहता है कि उसकी पेशेवर पहचान उसके मूल कार्य से बनी रहे। जब यह संभव नहीं होता, तब भीतर एक निरंतर तनाव पैदा होता है।
यही तनाव धीरे-धीरे लाचार सहमति में बदलता है।
लाचार सहमति वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति किसी निर्णय या कार्य से भीतर से पूरी तरह सहमत नहीं होता, लेकिन उसे अस्वीकार करने की वास्तविक स्वतंत्रता भी अनुभव नहीं करता। वह जानता है कि कार्य उसके मूल दायित्व का हिस्सा नहीं है, फिर भी वह उसे करता है। वह जानता है कि उसका समय शोध और अध्यापन के लिए अधिक मूल्यवान है, फिर भी वह उसे प्रशासनिक कार्य में लगाता है। वह किसी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना चाहता है, लेकिन यह सोचकर चुप रह जाता है कि प्रश्न को असहयोग समझा जा सकता है। वह किसी आदेश से असहमति रखता है, लेकिन उसे स्वीकार कर लेता है क्योंकि असहमति की संभावित कीमत उसके लिए बहुत अधिक है।
इस स्थिति में सत्ता को हर बार बल प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। व्यक्ति स्वयं अपनी सीमा तय करने लगता है। वह पहले से अनुमान लगाने लगता है कि किस बात पर आपत्ति करना सुरक्षित है और किस बात पर नहीं। वह अपनी भाषा को नियंत्रित करता है। अपने प्रश्नों को नरम करता है। अपनी असहमति को टालता है। कई बार तो वह प्रश्न को अपने भीतर ही दबा देता है। इस तरह बाहरी अनुशासन धीरे-धीरे आत्म-अनुशासन में बदल जाता है।
यहीं ‘सहमति का लोकतंत्र’ अपनी सबसे जटिल स्थिति में दिखाई देता है। लोकतांत्रिक संस्था में सहमति आवश्यक है, लेकिन यदि सहमति प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी हो जाए कि व्यक्ति के पास असहमति की वास्तविक स्वतंत्रता न बचे, तो सहमति की लोकतांत्रिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। किसी शिक्षक का किसी कार्य को स्वीकार कर लेना अपने आप में उसकी स्वतंत्र सहमति का प्रमाण नहीं है। यह देखना होगा कि उसके पास उस कार्य को अस्वीकार करने की कितनी वास्तविक क्षमता थी और अस्वीकार करने पर उसे किस प्रकार के प्रशासनिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता था।
शिक्षा संस्थाओं में यह प्रश्न विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि शिक्षक से हम विद्यार्थियों में स्वतंत्र विचार और आत्मनिर्णय विकसित करने की अपेक्षा करते हैं। लेकिन यदि वही शिक्षक स्वयं संस्थागत दबावों के कारण अपनी असहमति व्यक्त करने से डरता हो, तो वह विद्यार्थियों को स्वतंत्रता का वास्तविक अनुभव कैसे दे सकेगा? यदि शिक्षक हर आदेश को प्रश्न-विहीन रूप से स्वीकार करने के लिए बाध्य है, तो वह विद्यार्थी को प्रश्न करने की संस्कृति कैसे सिखाएगा? यदि शिक्षक का स्वयं का बौद्धिक जीवन लगातार प्रशासनिक कामों में दब रहा है, तो वह विद्यार्थी के लिए बौद्धिक ऊर्जा का स्रोत कैसे बनेगा?
यहाँ संकट केवल शिक्षक का नहीं रह जाता। वह शिक्षा के भीतर प्रवेश कर जाता है।
विद्यार्थी को शिक्षक से केवल पाठ्यक्रम नहीं मिलता। विशेष रूप से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के स्तर पर विद्यार्थी शिक्षक के व्यक्तित्व से भी सीखता है। वह देखता है कि शिक्षक किसी प्रश्न पर कैसे सोचता है, किसी स्थापित विचार पर कैसे संदेह करता है, किसी पुस्तक को कैसे पढ़ता है, किसी सामाजिक समस्या को कैसे समझता है और असहमति को किस प्रकार संभालता है। शिक्षक का बौद्धिक जीवन स्वयं एक पाठ होता है। यदि शिक्षक का वह जीवन ही धीरे-धीरे क्षीण हो जाए तो विद्यार्थियों के सामने ज्ञान का जीवंत उदाहरण कम होता जाता है।
तब कक्षा में पाठ तो रहता है, लेकिन विमर्श कम हो जाता है। पाठ्यक्रम रहता है, लेकिन जिज्ञासा कम होती है। परीक्षा रहती है, लेकिन प्रश्न की स्वतंत्रता कम होती है। विद्यार्थी उपस्थित रहता है, लेकिन शिक्षा की आंतरिक प्रक्रिया कमजोर पड़ने लगती है।
विशेष रूप से छात्राओं के संदर्भ में इसका प्रभाव और अधिक गंभीर है। महाविद्यालय की कक्षा कई छात्राओं के लिए पहली ऐसी जगह होती है जहाँ वे परिवार और सामाजिक अपेक्षाओं से बाहर अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना सीखती हैं। वे साहित्य, इतिहास, समाज, स्त्री-अनुभव, भाषा, प्रेम, रोजगार, राजनीति, परिवार और अपने भविष्य पर प्रश्न उठाती हैं। शिक्षक यदि उनके साथ केवल निर्धारित पाठ्यक्रम तक सीमित रहता है तो शिक्षा का वह व्यापक मानवीय पक्ष सीमित हो जाता है जिसमें विद्यार्थी अपने अनुभव को विचार में बदलना सीखता है।
एक शिक्षक के लिए छात्राओं के साथ किया गया वह लंबा संवाद, जिसमें कोई विद्यार्थी अपने मन का प्रश्न पहली बार खुलकर रखता है, किसी भी प्रशासनिक कार्यक्रम से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन इस संवाद की कोई उपस्थिति सूची नहीं बनती, इसकी कोई फाइल नहीं बनती और इसकी कोई तस्वीर नहीं होती। इसलिए संस्थागत मूल्यांकन की भाषा में वह अक्सर दिखाई नहीं देता। यही शिक्षा की त्रासदी है कि जिस काम का सामाजिक प्रभाव सबसे गहरा हो सकता है, वही सबसे कठिन तरीके से मापा जाता है।
इस स्थिति में शिक्षक धीरे-धीरे एक पुर्जे में बदल सकता है। पुर्जा मशीन के लिए आवश्यक होता है, लेकिन उसकी अपनी दिशा नहीं होती। उसे यह जानने की आवश्यकता नहीं होती कि पूरी मशीन कहाँ जा रही है। उसे केवल अपना निर्धारित कार्य करना होता है। शैक्षणिक संस्था के संदर्भ में यह रूपक असुविधाजनक है, क्योंकि शिक्षक का काम ही विद्यार्थियों को मशीन का पुर्जा बनने से बचाना है। वह उन्हें विचारशील, विवेकशील और आत्मनिर्णयी नागरिक बनाने के लिए है। यदि वही शिक्षक स्वयं केवल संस्थागत मशीन का एक कार्यशील पुर्जा बन जाए, तो शिक्षा के उद्देश्य और संस्था की कार्यप्रणाली के बीच एक गहरी विडंबना पैदा होती है।
लेकिन इस विडंबना का पूरा दोष केवल व्यवस्था पर डाल देना भी आसान रास्ता होगा। आत्मालोचन आवश्यक है। पिछले तीस वर्षों में हमने स्वयं कितनी बार अपनी प्राथमिकताओं को छोड़ा? कितनी बार हमने कहा कि अभी यह काम कर लेते हैं और बाद में पढ़ेंगे? कितनी बार हमने शोध को स्थगित किया? कितनी बार हमने विद्यार्थियों के साथ होने वाली बातचीत को किसी प्रशासनिक दायित्व के कारण छोटा किया? कितनी बार हमने यह कहकर अपने भीतर के असंतोष को शांत किया कि सरकारी व्यवस्था ऐसी ही होती है? और कितनी बार हमने अपनी चुप्पी को विवेक, अपने समझौते को व्यावहारिकता और अपनी थकान को जिम्मेदारी का नाम दिया?
यह आत्मालोचन इसलिए आवश्यक है क्योंकि सत्ता केवल बाहर नहीं होती। सत्ता धीरे-धीरे व्यक्ति की आदतों में भी प्रवेश करती है। पहले व्यवस्था हमें काम देती है। फिर हम अपने जीवन को उन कामों के अनुसार व्यवस्थित करते हैं। कुछ समय बाद हम उसी व्यवस्था की प्राथमिकताओं को अपनी प्राथमिकताएँ मानने लगते हैं। तब बाहर से दबाव कम भी हो जाए तो भीतर का अनुशासन काम करता रहता है।
यही वह क्षण है जहाँ मनुष्य को अपने आप से पूछना पड़ता है कि क्या वह वास्तव में व्यस्त है या केवल व्यस्त रखा गया है। दोनों के बीच अंतर सूक्ष्म है। व्यस्त व्यक्ति अपने उद्देश्य की ओर बढ़ता है; व्यस्त रखा गया व्यक्ति लगातार प्रतिक्रिया देता है। व्यस्त व्यक्ति अपने समय का अर्थ स्वयं निर्धारित करता है; व्यस्त रखा गया व्यक्ति दूसरों की प्राथमिकताओं के अनुसार अपना समय खर्च करता है। व्यस्त व्यक्ति थकने के बाद भी जानता है कि उसने अपने लिए क्या किया; व्यस्त रखा गया व्यक्ति दिन के अंत में बहुत कुछ करने के बावजूद यह नहीं बता पाता कि उसका अपना काम कहाँ हुआ।
यहीं से बौद्धिक स्वायत्तता का प्रश्न फिर सामने आता है। किसी शिक्षक की सबसे बड़ी पूँजी उसका पद नहीं, उसका विषय नहीं और केवल उसकी डिग्री भी नहीं है। उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसकी सोचने की स्वतंत्रता है। यदि वह पढ़ सकता है, प्रश्न कर सकता है, लिख सकता है, शोध कर सकता है और अपने विद्यार्थियों के साथ स्वतंत्र संवाद कर सकता है, तभी वह अपने पेशे की वास्तविक गरिमा को जीता है। जब ये क्षमताएँ लगातार दबती जाती हैं तो व्यक्ति बाहर से सफल दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से उसका बौद्धिक जीवन सिकुड़ सकता है।
इसलिए शैक्षणिक संस्थाओं को यह समझना होगा कि गैर-शैक्षणिक कार्यों का प्रश्न केवल कार्य-विभाजन का प्रश्न नहीं है। यह ज्ञान की गुणवत्ता का प्रश्न है। यदि किसी शिक्षक को लगातार ऐसे कामों में लगाया जाता है जो उसके मूल पेशे से संबंधित नहीं हैं, तो उसका प्रभाव केवल उसके व्यक्तिगत समय पर नहीं पड़ता। वह शोध की गति को प्रभावित करता है, अध्यापन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, विद्यार्थियों के साथ संवाद को प्रभावित करता है और अंततः समाज की बौद्धिक पूँजी को प्रभावित करता है।
समाज केवल प्रशासन से नहीं बनता। समाज विचारों से भी बनता है। और विचारों के निर्माण के लिए ऐसे मनुष्य चाहिए जिन्हें सोचने का समय मिले। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं हैं; वे समाज के बौद्धिक भविष्य की प्रयोगशालाएँ हैं। यदि इन प्रयोगशालाओं में काम करने वाले लोग अपना अधिकांश समय प्रशासनिक गतिविधियों में खर्च करेंगे, तो ज्ञान का उत्पादन स्वाभाविक रूप से कमजोर होगा।
यहाँ समाधान हर गैर-शैक्षणिक कार्य से पलायन नहीं है। संस्था को चलाने के लिए कुछ सामूहिक जिम्मेदारियाँ आवश्यक हैं। शिक्षक भी संस्था का सदस्य है और उसे अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन यह आवश्यक है कि गैर-शैक्षणिक दायित्वों की सीमा स्पष्ट हो, उनका वितरण न्यायपूर्ण हो और वे शिक्षक के मूल शैक्षणिक कार्य को विस्थापित न करें। शिक्षक को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने अध्यापन, शोध और विद्यार्थी-संवाद को अपनी पेशेवर प्राथमिकताओं में सुरक्षित रख सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि असहमति को अनुशासनहीनता के समानार्थी के रूप में देखना बंद करना होगा। किसी शिक्षक का किसी कार्य पर प्रश्न उठाना संस्था के विरुद्ध होना आवश्यक नहीं है। किसी आदेश के औचित्य पर सवाल उठाना व्यवस्था को नष्ट करना नहीं है। किसी वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव देना अवज्ञा नहीं है। यदि संस्था में प्रश्न के लिए जगह नहीं होगी तो वहाँ वास्तविक सुधार की संभावना भी कम होती जाएगी।
लोकतांत्रिक संस्था वह नहीं जिसमें कोई असहमति न हो। लोकतांत्रिक संस्था वह है जिसमें असहमति को संस्थागत रूप से संभालने की क्षमता हो। शिक्षक यदि यह कह सके कि यह कार्य मेरे मूल शैक्षणिक दायित्व को प्रभावित कर रहा है और संस्था उसके प्रश्न को सुन सके, तो संस्था मजबूत होती है। यदि वह प्रश्न उठाते ही प्रशासनिक रूप से संदिग्ध व्यक्ति बन जाए, तो संस्था बाहर से अनुशासित दिखाई दे सकती है, लेकिन भीतर से संवादहीन होती जाएगी।
शिक्षा की वास्तविक शक्ति इसी संवाद में है। विद्यार्थी को यह अनुभव होना चाहिए कि उसका शिक्षक स्वयं सोचता है। शिक्षक को यह अनुभव होना चाहिए कि संस्था उसके सोचने के अधिकार का सम्मान करती है। और संस्था को यह समझना होगा कि शिक्षक की बौद्धिक स्वतंत्रता संस्था के विरुद्ध कोई खतरा नहीं, बल्कि संस्था की शैक्षणिक विश्वसनीयता की शर्त है।
शायद इसीलिए अब अपने आप से यह पूछना आवश्यक है कि सरकारी बुद्धिजीवी होने का अर्थ क्या है। क्या सरकारी होना बौद्धिक रूप से सरकारी हो जाना भी है? क्या वेतन पाने का अर्थ अपनी चेतना को वेतनदाता संस्था को सौंप देना है? क्या प्रशासनिक आदेश का पालन करना अपने विवेक को स्थगित कर देना है? क्या संस्था के प्रति निष्ठा का अर्थ उसके हर निर्णय से सहमत होना है?
इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ होना चाहिए, यदि हम शिक्षा को सचमुच शिक्षा मानते हैं।
सरकारी शिक्षक व्यवस्था का कर्मचारी अवश्य है, लेकिन वह केवल कर्मचारी नहीं है। उसका एक बौद्धिक अस्तित्व भी है। वह राज्य से वेतन लेता है, लेकिन उसका ज्ञान केवल राज्य का नहीं होता। उसका विषय, उसका शोध, उसका साहित्य, उसकी कक्षा और उसके विद्यार्थी उससे एक ऐसी स्वतंत्रता की माँग करते हैं जो किसी प्रशासनिक आदेश से समाप्त नहीं की जा सकती।
शायद हमें इसी बिंदु पर ‘लाचार सहमति’ से ‘विवेकपूर्ण सहमति’ की ओर बढ़ना होगा। हर आदेश का विरोध करना स्वतंत्रता नहीं है और हर आदेश को स्वीकार कर लेना भी जिम्मेदारी नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता उस विवेक में है जिसमें व्यक्ति यह तय कर सके कि कहाँ सहयोग आवश्यक है, कहाँ प्रश्न आवश्यक है, कहाँ वैकल्पिक सुझाव देना चाहिए और कहाँ अपनी मूल शैक्षणिक जिम्मेदारी की रक्षा के लिए सीमा निर्धारित करनी चाहिए।
यह सीमा व्यक्तिगत अहंकार की सीमा नहीं होनी चाहिए; यह शिक्षा की गरिमा की सीमा होनी चाहिए।
क्योंकि अंततः प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षक ने कितने सरकारी काम किए। प्रश्न यह है कि उसने अपने विद्यार्थियों के लिए कितना विचार बचाया। उसने अपने भीतर कितना प्रश्न जीवित रखा। उसने कितना पढ़ा। कितना लिखा। कितना शोध किया। कितनी छात्राओं को यह विश्वास दिया कि वे प्रश्न कर सकती हैं। कितने विद्यार्थियों को यह अनुभव कराया कि ज्ञान केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं, बल्कि दुनिया को नए ढंग से देखने की क्षमता है।
यदि इन प्रश्नों के उत्तर धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं, तो समस्या केवल शिक्षक के जीवन की नहीं है। यह शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य का संकट है।
और शायद इसी कारण पिछले तीस वर्षों की ओर देखते हुए सबसे कठिन स्वीकारोक्ति यह नहीं है कि व्यवस्था ने हमें बहुत काम दिया। कठिन स्वीकारोक्ति यह है कि हमने उन कामों को स्वीकार करते-करते अपने मूल काम की रक्षा करना धीरे-धीरे छोड़ दिया।
हमसे हमारी चेतना किसी एक आदेश ने नहीं छीनी।
हमने उसे छोटे-छोटे समझौतों में बाहर रख दिया।
अब उसे वापस लेना किसी विद्रोह से अधिक कठिन और अधिक गहरा काम है। वह अपने समय पर फिर से अधिकार प्राप्त करने से शुरू होगा। अपनी किताब की ओर लौटने से शुरू होगा। अपने शोध के अधूरे प्रश्न को फिर से उठाने से शुरू होगा। विद्यार्थी के साथ बिना किसी प्रशासनिक उद्देश्य के बैठकर बात करने से शुरू होगा। कक्षा को फिर से संवाद का स्थान बनाने से शुरू होगा। और शायद उस छोटे-से साहस से शुरू होगा जिसमें हम किसी आवश्यक क्षण पर यह कह सकें कि इस कार्य की अपेक्षा मेरे मूल शैक्षणिक दायित्व से बाहर है और इसे करने के कारण मेरे विद्यार्थियों, मेरे अध्यापन और मेरे शोध का नुकसान हो रहा है।
यह ‘नहीं’ किसी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं होगा। यह शिक्षा के पक्ष में कहा गया ‘नहीं’ होगा।
और शायद इसी ‘नहीं’ के भीतर एक सच्ची ‘हाँ’ छिपी होगी—शिक्षा के प्रति, विद्यार्थी के प्रति, ज्ञान के प्रति, अपने बौद्धिक अस्तित्व के प्रति और उस लोकतांत्रिक समाज के प्रति जिसमें नागरिक केवल आदेश मानने वाले मनुष्य नहीं, बल्कि अपने विवेक से निर्णय लेने वाले मनुष्य होते हैं।
किसी व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वह लोगों से काम करवा ले। उसकी सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब लोग उसके द्वारा निर्धारित दिशा में स्वयं चलने लगें और उसे अपनी स्वतंत्रता समझने लगें। शिक्षा का सबसे बड़ा दायित्व इस सफलता को चुनौती देना है। उसे ऐसे मनुष्य बनाने हैं जो चल सकें, लेकिन यह भी तय कर सकें कि किस दिशा में चलना है; जो सहयोग कर सकें, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर प्रश्न भी कर सकें; जो संस्था का हिस्सा हों, लेकिन अपनी चेतना को संस्था के हवाले न कर दें।
सरकारी बुद्धिजीवी होने का अर्थ शायद यही कठिन संतुलन है। व्यवस्था के भीतर रहना, लेकिन व्यवस्था में विलीन न हो जाना; वेतन लेना, लेकिन विवेक न बेचना; संस्थागत दायित्व निभाना, लेकिन अपने मूल बौद्धिक दायित्व को विस्मृत न करना; सहमति देना, लेकिन केवल भय के कारण नहीं; और असहमति करना, लेकिन केवल अहंकार के कारण नहीं।
जब यह संतुलन टूटता है तो शिक्षक धीरे-धीरे पुर्जा बन जाता है। जब यह संतुलन लौटता है तो वही शिक्षक फिर से बुद्धिजीवी बन सकता है।
और शायद शिक्षा की वास्तविक मुक्ति वहीं से शुरू होती है।

