घटना-केंद्रित युवा मन और शिक्षा की गहराती सतहीकरण की त्रासदी
किसी समाज के भविष्य का संकेत उसके भवनों, योजनाओं, संस्थाओं और तकनीकी साधनों में नहीं, उसके युवा मन की उस अदृश्य वास्तुकला में मिलता है जो बताती है कि वह किस चीज़ को उत्साह, समय, उपलब्धि और अनुभव का मूल्य देता है। उच्च शिक्षा के वर्तमान परिवेश में इसी स्थान से एक प्रश्न उठता है: क्या हम ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसे गहराई से अधिक दृश्यता, अध्ययन से अधिक सहभागिता, ज्ञान से अधिक प्रमाणपत्र, आत्मबोध से अधिक प्रशंसा और दीर्घकालिक साधना से अधिक तात्कालिक उपलब्धि आकर्षित करती है? यदि ऐसा है, तो यह केवल शिक्षा की गुणवत्ता का संकट नहीं, मनुष्य बनने की प्रक्रिया का संकट है।
मनुष्य जो बार-बार करता है, धीरे-धीरे वही बनता जाता है। उसकी मानसिक संरचना किसी एक दिन में नहीं बनती; वह निरंतर अनुभवों, आदतों, पुरस्कारों, सामाजिक संकेतों और दोहराए गए व्यवहारों से आकार लेती है। यदि विद्यार्थी को बार-बार यह अनुभव कराया जाए कि मंच पर जाना, फोटो खिंचवाना, तालियाँ पाना, पुरस्कार पाना, तत्काल प्रशंसा पाना और किसी कार्यक्रम में दिखाई देना ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है, तो उसके भीतर सफलता का एक विशेष मनोविज्ञान विकसित होना स्वाभाविक है। वह पूछने लगता है कि “मुझे इससे क्या मिलेगा?”, जबकि गंभीर शिक्षा का प्रश्न है कि “मैं इससे क्या समझूँगा?” और शोध का प्रश्न इससे भी आगे जाता है कि “मैं जो समझ रहा हूँ, उसमें नया क्या खोज सकता हूँ?” इन दो मानसिकताओं के बीच की दूरी केवल भाषा की नहीं, अनुभव से संबंध की है। एक अनुभव का उपभोग करती है, दूसरी अनुभव का अर्थ खोजती है।
घटना का स्वभाव तात्कालिक होता है। एक कार्यक्रम आता है, तैयारी होती है, उत्साह पैदा होता है, मंच मिलता है, तालियाँ मिलती हैं, प्रशंसा मिलती है, फोटो खिंचती है, पुरस्कार मिलता है और कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। पुस्तक का स्वभाव लगभग इसका उलटा है। वह चुप रहती है; विद्यार्थी को तुरंत तालियाँ नहीं देती। किसी कठिन विचार को समझने में कई दिन लग सकते हैं, किसी दार्शनिक पुस्तक को समझने में महीनों, और किसी शोध-पत्र के तर्क को भीतर तक पहुँचने के लिए बार-बार पुनर्पाठ करना पड़ सकता है। वहाँ कोई मंच नहीं, कोई उद्घोषक नहीं, कोई प्रमाणपत्र नहीं, कोई तालियाँ नहीं; केवल मनुष्य और उसका विचार होता है। यहीं शिक्षा की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। यदि विद्यार्थी का मन लगातार तात्कालिक उत्तेजनाओं का अभ्यस्त हो जाए, तो वह धीरे-धीरे उन प्रक्रियाओं से ऊबने लगता है जिनमें परिणाम देर से मिलता है। अध्ययन मूलतः विलंबित संतोष की संस्कृति है। ज्ञान तुरंत पुरस्कार नहीं देता; वह पहले बेचैनी देता है, फिर प्रश्न, फिर भ्रम, फिर पुराने विश्वासों का टूटना, और तब धीरे-धीरे समझ का निर्माण। इसीलिए गंभीर शिक्षा हमेशा थोड़ी कठिन होती है।
समस्या यह नहीं कि विद्यार्थी कार्यक्रमों में जाते हैं। कार्यक्रम में जाना अपने आप में दोष नहीं है। समस्या तब है जब कार्यक्रम विद्यार्थी के लिए शिक्षा से अधिक आकर्षक और अध्ययन शिक्षा से कम आकर्षक हो जाए। जब विद्यार्थी एक-दो घंटे के सांस्कृतिक या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए तत्काल तैयार हो जाए, लेकिन नियमित कक्षा के प्रति उतनी गंभीरता न दिखाए; जब मंच पर कुछ मिनट बोलने की इच्छा हो, लेकिन किसी पुस्तक के सौ पृष्ठ पढ़ने की इच्छा न हो; जब पुरस्कार प्राप्त करना आकर्षक लगे, लेकिन किसी विषय पर पाँच पृष्ठ का स्वतंत्र विश्लेषण लिखना कठिन लगे; जब फोटो में दिखाई देना महत्वपूर्ण लगे, लेकिन पुस्तकालय में दो घंटे अदृश्य रहकर पढ़ना महत्वहीन लगे—तो विद्यार्थी को दोष देने से पहले उस वातावरण को देखना चाहिए जिसने उसके भीतर सफलता की परिभाषा बनाई है। युवा मन को वही आकर्षित करता है जिसे समाज मूल्यवान बनाकर प्रस्तुत करता है।
किसी विद्यार्थी का संदर्भ-ग्रंथों से अपरिचित होना केवल अकादमिक कमी नहीं है; वह उसके ज्ञान-संबंधी स्वभाव का संकेत भी हो सकता है। यदि विद्यार्थी केवल शिक्षक द्वारा दिए गए नोट्स पर निर्भर है, तो ज्ञान उसके लिए पहले से तैयार वस्तु बन जाता है। लेकिन जब वह स्वयं पुस्तक खोजता है, विभिन्न लेखकों को पढ़ता है, दो मतों की तुलना करता है और फिर अपनी समझ बनाता है, तब ज्ञान उसके लिए निर्माण की प्रक्रिया बन जाता है। यहीं शिक्षा और सूचना का अंतर पैदा होता है। नोट्स सूचना देते हैं, पुस्तक प्रश्न देती है, संदर्भ ग्रंथ दृष्टिकोण देते हैं, और शोध विद्यार्थी को अपनी दृष्टि बनाने की चुनौती देता है। इसलिए पुस्तकालय से विद्यार्थी की दूरी अंततः विचार से दूरी बन सकती है।
इसी प्रकार कक्षा में उपस्थित होना और शिक्षा में उपस्थित होना अलग-अलग बातें हैं। विद्यार्थी का शरीर कक्षा में हो सकता है, लेकिन उसका मन कहीं और। वास्तविक शैक्षणिक उपस्थिति तब है जब वह सुनता है, प्रश्न करता है, नोट करता है, असहमति व्यक्त करता है, तर्क करता है, पुनः पढ़ता है और अगले प्रश्न के साथ कक्षा में लौटता है। कक्षा केवल चार दीवारों के भीतर बैठने का नाम नहीं, बल्कि एक बौद्धिक घटना है—जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर किसी विषय के भीतर प्रवेश करते हैं। यदि यह प्रक्रिया समाप्त हो जाए और कक्षा केवल उपस्थिति, परीक्षा और औपचारिक पाठ्यक्रम तक सीमित रह जाए, तो उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण तत्व—विचार का जीवंत संवाद—कमजोर पड़ जाता है।
हमारे समय का एक विचित्र विरोधाभास यह है कि युवा पीढ़ी के पास पहले की तुलना में अधिक सूचना है, लेकिन अधिक सूचना का अर्थ अधिक ज्ञान नहीं है। सूचना की बाढ़ में मनुष्य बहुत कुछ जानता हुआ दिखाई दे सकता है, फिर भी किसी एक विषय पर गहराई से विचार करने में असमर्थ हो सकता है। एक कार्यक्रम से दूसरे कार्यक्रम तक, एक सूचना से दूसरी सूचना तक, एक वीडियो से दूसरे वीडियो तक, एक गतिविधि से दूसरी गतिविधि तक जाना मन को निरंतर उत्तेजित रख सकता है, लेकिन निरंतर उत्तेजना और निरंतर चिंतन एक ही चीज नहीं हैं। चिंतन के लिए रुकना पड़ता है, गहराई के लिए ठहरना पड़ता है, ज्ञान के लिए किसी एक प्रश्न के साथ लंबे समय तक रहना पड़ता है। और शायद यही ठहरना आधुनिक घटना-केंद्रित संस्कृति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
जब किसी कार्य के साथ बार-बार बाहरी पुरस्कार जोड़ दिया जाता है, तो धीरे-धीरे व्यक्ति उस कार्य के आंतरिक मूल्य को भूल सकता है। विद्यार्थी को पढ़ने में आनंद क्यों आए? क्योंकि उसे दुनिया समझ में आने लगे, वह किसी विषय के पीछे छिपे संबंधों को देख सके, उसकी जिज्ञासा बढ़े, उसकी भाषा समृद्ध हो, उसकी दृष्टि विस्तृत हो और वह स्वयं से बेहतर प्रश्न पूछ सके। यह शिक्षा का आंतरिक पुरस्कार है। लेकिन यदि प्रत्येक गतिविधि के साथ प्रमाणपत्र, पुरस्कार, मंच, फोटो और सार्वजनिक प्रशंसा को प्रमुख बना दिया जाए, तो उपलब्धि की मानसिकता बाहरी संकेतों पर टिकने लगती है। तब विद्यार्थी धीरे-धीरे यह भूल सकता है कि ज्ञान का सबसे गहरा पुरस्कार ज्ञान की प्रक्रिया में ही है, विचार करने का सबसे बड़ा पुरस्कार अधिक स्पष्ट होकर सोचना है, और अध्ययन का सबसे बड़ा पुरस्कार यह है कि मनुष्य पहले जैसा नहीं रहता।
राष्ट्र का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसके युवा कितने कार्यक्रमों में भाग लेते हैं; वह इस बात पर निर्भर करता है कि वे कितनी गहराई से सोचते हैं। क्या वे किसी विचार को उसके मूल तक ले जा सकते हैं? क्या वे किसी तर्क की कमजोर कड़ी पहचान सकते हैं? क्या वे किसी पुस्तक से असहमति व्यक्त कर सकते हैं और अपने मत का कारण दे सकते हैं? क्या वे लोकप्रिय विचार के विरुद्ध प्रश्न पूछ सकते हैं? क्या वे बिना तत्काल प्रशंसा के महीनों तक किसी विषय पर काम कर सकते हैं? क्या वे अकेले बैठकर पढ़ सकते हैं? क्या वे कठिनाई से भागे बिना किसी जटिल विचार के साथ रह सकते हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर कमजोर होते जा रहे हैं, तो यह केवल शिक्षा की समस्या नहीं, लोकतांत्रिक समाज की बौद्धिक क्षमता से जुड़ा प्रश्न है। लोकतंत्र को केवल मतदान करने वाले नागरिक नहीं, सोचने वाले नागरिक चाहिए।
शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यह नहीं कि विद्यार्थी कितने कार्यक्रमों में गया, कितने प्रमाणपत्र प्राप्त किए, या उसकी कितनी तस्वीरें महाविद्यालय के सोशल मीडिया पर आईं। शिक्षा का अंतिम प्रश्न यह है कि क्या वह व्यक्ति अपने भीतर एक स्वतंत्र चेतना विकसित कर पाया। क्या वह बिना किसी बाहरी निर्देश के पढ़ सकता है? क्या वह बिना पुरस्कार के काम कर सकता है? क्या वह बिना तालियों के अच्छा काम करने में सक्षम है? क्या वह लोकप्रियता से अलग सत्य का पीछा कर सकता है? क्या वह भीड़ में रहते हुए भी अपना विवेक बचा सकता है? क्या वह किसी पुस्तक के साथ अकेला बैठ सकता है? और क्या वह किसी प्रश्न को तब भी पकड़े रह सकता है जब उसके उत्तर में तत्काल कोई पुरस्कार न हो? यदि शिक्षा इन क्षमताओं का निर्माण नहीं कर रही, तो हमें अपनी सफलता के पैमानों पर पुनर्विचार करना होगा।
यहाँ बात किसी एक महाविद्यालय की छात्राओं की नहीं है; यह प्रश्न व्यापक है। यदि उच्च शिक्षा की संरचना लगातार युवाओं को दृश्य उपलब्धियों, तात्कालिक प्रशंसा और कार्यक्रम-केंद्रित सहभागिता की ओर प्रेरित करती है, जबकि गहन अध्ययन, स्वतंत्र पठन, शोध, लेखन और आलोचनात्मक चिंतन को पर्याप्त समय और संस्थागत महत्व नहीं देती, तो आने वाली पीढ़ी में उपलब्धि की एक ऐसी मानसिक संरचना विकसित हो सकती है जिसमें दिखाई देना जानने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए। और यदि ऐसा व्यापक स्तर पर होता है, तो उसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा। वह प्रशासन, राजनीति, समाज, संस्थाओं, परिवार और नेतृत्व में जाएगा। तब समाज में ऐसे लोग बहुत होंगे जो मंच पर प्रभावशाली दिखाई देते हैं, लेकिन किसी जटिल समस्या के भीतर उतरने का धैर्य नहीं रखते; जो बोल सकते हैं, लेकिन पढ़ नहीं सकते; प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन विचार नहीं कर सकते; प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन विश्लेषण नहीं कर सकते। और शायद सबसे बड़ी त्रासदी यह होगी कि उन्हें स्वयं अपनी इस कमी का बोध भी न हो।
इसलिए शिक्षा व्यवस्था को एक मौलिक सांस्कृतिक परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें विद्यार्थियों को यह पुनः अनुभव कराना होगा कि पुस्तक पढ़ना भी उपलब्धि है, कक्षा में नियमित रहना भी उपलब्धि है, एक कठिन प्रश्न पर लंबे समय तक काम करना भी उपलब्धि है, शोध-पत्र पढ़ना भी उपलब्धि है, अपने विचार को संशोधित कर पाना भी उपलब्धि है, गलत होने को स्वीकार करना भी बौद्धिक उपलब्धि है, किसी विषय पर गहराई से लिखना भी उपलब्धि है, और सबसे बढ़कर, बिना किसी मंच, पुरस्कार और तालियों के स्वयं को विकसित करना भी उपलब्धि है। क्योंकि मनुष्य का वास्तविक निर्माण अक्सर वहीं होता है जहाँ कोई दर्शक नहीं होता।
अंततः हमें तय करना होगा कि हमारे महाविद्यालयों का उद्देश्य क्या है—युवा मन को लगातार व्यस्त रखना, या उसे धीरे-धीरे गहरा बनाना? यदि हम केवल गतिविधियाँ बढ़ाते रहे, तो हमारे पास सक्रिय विद्यार्थी होंगे; लेकिन यदि हम अध्ययन, पठन, शोध, संवाद और चिंतन को केंद्र में लाएँगे, तभी हमारे पास विचारशील मनुष्य होंगे। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके युवाओं की भीड़ में नहीं, उनके विवेक की गहराई में होती है। किसी पीढ़ी की वास्तविक उपलब्धि यह नहीं कि उसने कितने मंच साझा किए, बल्कि यह है कि उसने कितने प्रश्न अपने भीतर जीवित रखे। मंच की रोशनी कुछ क्षणों के लिए मनुष्य को प्रकाशित करती है, लेकिन एक गंभीर पुस्तक, एक कठिन प्रश्न और एक स्वतंत्र विचार पूरे जीवन को प्रकाशित कर सकता है। और यदि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था युवा मन को लगातार मंच की रोशनी की ओर ले जाती रही और पुस्तक के शांत अंधकार से दूर करती रही, तो हमें यह समझना होगा कि हम केवल अध्ययन की आदत नहीं खो रहे हैं—हम मनुष्य के भीतर उस गहराई को खोने का जोखिम उठा रहे हैं, जहाँ से स्वतंत्र विचार, विवेक, सृजन और सभ्यता का निर्माण होता है।

