जब महाविद्यालय आयोजन-स्थल बन जाएँ और शिक्षा पीछे छूट जाए
मध्य प्रदेश की उच्च शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य को यदि थोड़ी दूरी बनाकर देखा जाए तो सबसे पहले जो दृश्य दिखाई देता है, वह गतिविधियों से भरा हुआ है। महाविद्यालयों में कार्यक्रम हैं, समारोह हैं, प्रतियोगिताएँ हैं, अभियान हैं, कार्यशालाएँ हैं, प्रशिक्षण हैं, व्याख्यान हैं, जागरूकता कार्यक्रम हैं, दिवस-आयोजन हैं, रैलियाँ हैं, बैठकें हैं, निरीक्षण हैं, रिपोर्टिंग है और इन सबके साथ तस्वीरों तथा दस्तावेजों का एक निरंतर प्रवाह भी है। संस्थागत कैलेंडर भरे हुए हैं, नोटिस बोर्ड सक्रिय हैं, मंच सजते रहते हैं और प्रत्येक गतिविधि के बाद उसकी रिपोर्ट तैयार होती है। पहली दृष्टि में यह सब एक सक्रिय, जीवंत और गतिशील उच्च शिक्षा व्यवस्था का संकेत प्रतीत होता है।
लेकिन इसी दृश्य के भीतर एक अधिक गंभीर प्रश्न धीरे-धीरे उभरता है—क्या गतिविधियों की इस निरंतरता के बीच शिक्षा का मूल परिसर भी उतना ही जीवंत है? क्या महाविद्यालय अभी भी वह स्थान है जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक पर्याप्त समय लेकर पढ़ते, सोचते, प्रश्न करते, असहमति व्यक्त करते, शोध करते और अपने विचारों को विकसित करते हैं? या शिक्षा का वास्तविक संसार धीरे-धीरे उन गतिविधियों के पीछे चला गया है जो दिखाई अधिक देती हैं और जिनका दस्तावेजीकरण अपेक्षाकृत आसान है?
यह प्रश्न किसी कार्यक्रम या आयोजन के विरोध का प्रश्न नहीं है। उच्च शिक्षा में व्याख्यान, संगोष्ठी, कार्यशाला, सांस्कृतिक गतिविधि, प्रतियोगिता, प्रशिक्षण और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों का अपना महत्व है। एक सार्थक आयोजन कक्षा की सीमाओं को विस्तृत कर सकता है, विद्यार्थियों को नए अनुभव दे सकता है और उनके ज्ञान तथा व्यक्तित्व को समृद्ध कर सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब आयोजन शिक्षा का साधन न रहकर शिक्षा की पहचान बन जाता है; जब किसी संस्थान की सक्रियता को उसके अकादमिक जीवन की गहराई के बजाय उसके कार्यक्रमों की संख्या से मापा जाने लगता है।
यहीं उच्च शिक्षा की एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण दिशा-परिवर्तन दिखाई देता है। ज्ञान और गतिविधि के बीच संतुलन धीरे-धीरे गतिविधि की ओर झुकने लगता है। अध्ययन की जगह आयोजन, विचार की जगह प्रदर्शन और अकादमिक प्रक्रिया की जगह रिपोर्टिंग अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। यह परिवर्तन किसी एक आदेश, एक नीति या किसी एक व्यक्ति के कारण नहीं होता। यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली संस्थागत संस्कृति का परिणाम होता है, जिसमें वह काम अधिक दिखाई देने लगता है जिसे आसानी से दर्ज, प्रस्तुत और प्रमाणित किया जा सके।
उच्च शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा स्वभावतः अदृश्य होता है। शिक्षक का वास्तविक अकादमिक श्रम केवल उस समय नहीं होता जब वह कक्षा में खड़ा होकर व्याख्यान देता है। किसी अच्छे अध्यापन के पीछे विषय का निरंतर अध्ययन, नए शोध-पत्रों का पठन, पुस्तकों से संवाद, सामग्री का पुनर्गठन, विद्यार्थियों के प्रश्नों पर विचार, शोध की तैयारी और अपने विषय के बदलते विमर्श को समझने का समय लगा होता है। एक शिक्षक का बौद्धिक विकास भी उसी प्रकार शिक्षा की गुणवत्ता का हिस्सा है जिस प्रकार उसका कक्षा-अध्यापन।
लेकिन इस श्रम को देखने का कोई आसान तरीका नहीं है। शिक्षक के कई घंटे पुस्तकालय में बीत सकते हैं, वह किसी पुस्तक के एक अध्याय पर विचार कर सकता है, किसी शोध-पत्र को पढ़कर अपनी कक्षा की दृष्टि बदल सकता है या किसी विद्यार्थी के प्रश्न पर लंबे समय तक सोच सकता है। इन सबका कोई मंच नहीं होता, कोई उद्घाटन नहीं होता और सामान्यतः कोई फोटोग्राफ भी नहीं होता। इसके विपरीत एक आयोजन दिखाई देता है। मंच दिखाई देता है, अतिथि दिखाई देते हैं, बैनर दिखाई देता है, सभागार दिखाई देता है, तस्वीरें दिखाई देती हैं और उसके बाद एक रिपोर्ट भी तैयार हो जाती है। इस दृश्यता के कारण संस्थागत मूल्यांकन की दृष्टि से भी आयोजन का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।
यहीं एक खतरनाक भ्रम जन्म ले सकता है—जो दिखाई दे रहा है, वही सबसे महत्वपूर्ण काम है।
जब यह धारणा संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बन जाती है, तब शिक्षक की भूमिका भी धीरे-धीरे बदल सकती है। वह शिक्षक होने के साथ-साथ कार्यक्रम-समन्वयक, समिति-सदस्य, आयोजन प्रभारी, रिपोर्ट तैयार करने वाला और विभिन्न प्रशासनिक गतिविधियों का सहभागी बनता जाता है। इनमें से प्रत्येक कार्य अपने स्थान पर आवश्यक हो सकता है, लेकिन जब इनका संचयी भार इतना बढ़ जाए कि शिक्षक के पास अपने विषय को पढ़ने और उसके बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने का समय ही न बचे, तब इसका प्रभाव अंततः कक्षा पर पड़ना स्वाभाविक है।
कक्षा की गुणवत्ता केवल पाठ्यक्रम की निर्धारित सामग्री से नहीं बनती। वह शिक्षक की बौद्धिक तैयारी से बनती है। जो शिक्षक लगातार पढ़ता है, वह एक ही विषय को वर्षों तक पढ़ाने के बावजूद हर वर्ष उसे नए ढंग से देख सकता है। जो अपने विषय में शोध और विमर्श से जुड़ा रहता है, वह विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि विषय के भीतर मौजूद प्रश्नों से परिचित कराता है। इसके विपरीत यदि शिक्षक का अधिकांश समय प्रशासनिक दायित्वों, बैठकों और आयोजनों में चला जाए, तो कक्षा धीरे-धीरे पाठ्यक्रम-पूर्ति तक सीमित होने का जोखिम उठाती है। इसलिए शिक्षक के अध्ययन का समय कोई व्यक्तिगत सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आवश्यक संस्थागत संसाधन है।
यही बात विद्यार्थियों पर भी लागू होती है। उच्च शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल गतिविधियों में भाग लेने वाला सक्रिय व्यक्ति बनाना नहीं है। उसका उद्देश्य उन्हें विचारशील, जिज्ञासु और स्वतंत्र बौद्धिक व्यक्तित्व में विकसित करना है। विद्यार्थी को पुस्तक पढ़ने, लंबे समय तक किसी प्रश्न पर विचार करने, लिखने, असफल होने, फिर से प्रयास करने और अपने विचार को बदलने का अवसर चाहिए। उच्च शिक्षा की परिपक्वता इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह अपने विद्यार्थियों को बिना किसी तात्कालिक उपयोगिता के केवल सीखने और सोचने का कितना अवकाश देती है।
यदि महाविद्यालय का वातावरण लगातार गतिविधियों से भरा रहता है, तो विद्यार्थी की दृष्टि भी अनजाने में बदल सकती है। कॉलेज उसके लिए ज्ञान और विचार का स्थान होने के बजाय कार्यक्रमों, प्रमाणपत्रों, प्रतियोगिताओं और सहभागिता का स्थान बन सकता है। तब प्रश्न यह नहीं रहता कि “मैंने क्या समझा?”, बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि “मैंने किस गतिविधि में भाग लिया?” यह परिवर्तन छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसके भीतर शिक्षा के उद्देश्य में एक गहरा बदलाव छिपा हो सकता है। सहभागिता उपयोगी है, लेकिन सहभागिता स्वयं शिक्षा नहीं है। प्रमाणपत्र उपलब्धि का प्रमाण हो सकता है, लेकिन वह सीखने का पर्याय नहीं है।
इसीलिए महाविद्यालय को केवल सक्रिय परिसर नहीं, बल्कि बौद्धिक परिसर होना चाहिए। किसी अच्छे महाविद्यालय की पहचान इस बात से भी होनी चाहिए कि वहाँ कितने विद्यार्थी पुस्तकालय में लंबे समय तक बैठते हैं, कितने शिक्षक अपने विषय पर गंभीर चर्चा करते हैं, कितने विभागों में पाठ्यक्रम से बाहर भी अकादमिक संवाद होता है, कितने शोध प्रश्नों पर महीनों काम किया जाता है और कितने विद्यार्थी अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं खोजने की आदत विकसित करते हैं।
शिक्षा को एक निश्चित मात्रा में मौन और एकांत की आवश्यकता होती है। विचार हमेशा सामूहिक गतिविधि के बीच पैदा नहीं होता। कभी वह पुस्तकालय की शांति में जन्म लेता है, कभी किसी कठिन पुस्तक को पढ़ते हुए, कभी किसी विद्यार्थी के असामान्य प्रश्न से, कभी किसी शिक्षक के अकेले चिंतन से और कभी लंबे समय तक किसी समस्या के समाधान न मिलने के बाद। उच्च शिक्षा की यह धीमी प्रक्रिया बाहर से निष्क्रिय दिखाई दे सकती है, जबकि वास्तव में वही उसकी सबसे रचनात्मक प्रक्रिया होती है।
इसलिए “हर समय कुछ न कुछ होना” किसी अकादमिक परिसर की गुणवत्ता का विश्वसनीय संकेत नहीं है। एक ऐसा परिसर जहाँ प्रतिदिन कार्यक्रम हो सकते हैं, लेकिन जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी को किसी विषय पर गहराई से सोचने का समय नहीं मिलता, संभव है कि वह अत्यधिक सक्रिय दिखाई दे और फिर भी बौद्धिक रूप से कमजोर हो। इसके विपरीत कोई छोटा-सा विभाग, जहाँ कम कार्यक्रम हों लेकिन नियमित पठन, चर्चा, शोध और लेखन की परंपरा हो, शिक्षा की दृष्टि से कहीं अधिक उत्पादक वातावरण निर्मित कर सकता है।
यहाँ प्रश्न कार्यक्रमों की संख्या का नहीं, उनके शैक्षणिक औचित्य का है। किसी आयोजन से पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि वह किस शैक्षणिक आवश्यकता को पूरा कर रहा है, विद्यार्थियों के सीखने में उसका क्या योगदान होगा, उसके लिए शिक्षक और विद्यार्थियों से कितने समय की अपेक्षा है और क्या उस आयोजन के कारण नियमित अध्यापन या अन्य अकादमिक कार्य प्रभावित होंगे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी मूल्यांकन केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने लोग उपस्थित हुए या कितनी तस्वीरें उपलब्ध हैं। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उससे क्या सीखा गया, कौन-सा प्रश्न उठा, क्या नया संवाद शुरू हुआ और क्या उसका कोई स्थायी शैक्षणिक परिणाम निकला।
यहाँ से उच्च शिक्षा में मूल्यांकन की पूरी दृष्टि पर विचार करने की आवश्यकता सामने आती है। संस्थानों के लिए गतिविधियों का दस्तावेजीकरण आवश्यक हो सकता है, लेकिन दस्तावेजीकरण को शिक्षा का मापदंड नहीं बनाया जा सकता। किसी संस्था के पास सैकड़ों कार्यक्रमों की रिपोर्टें हो सकती हैं और फिर भी वहाँ शोध की संस्कृति कमजोर हो सकती है। इसके विपरीत किसी विभाग में कम कार्यक्रम हुए हों, लेकिन वहाँ पुस्तकों का गंभीर अध्ययन, शोध-पत्रों का प्रकाशन, विद्यार्थियों के साथ बौद्धिक संवाद और विषयगत नवाचार लगातार हो रहे हों। इसलिए गतिविधियों की संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता को एक-दूसरे का पर्याय मानना एक गंभीर संस्थागत भूल होगी।
वास्तव में उच्च शिक्षा के वर्तमान संकट को संसाधनों या अवसंरचना की समस्या के साथ-साथ समय की समस्या के रूप में भी देखने की आवश्यकता है। शिक्षक के पास पढ़ने का समय कितना है? विद्यार्थी के पास स्वतंत्र अध्ययन का समय कितना है? विभाग के पास विषयगत विमर्श के लिए कितना समय है? शोधार्थी के पास अपने प्रश्न के साथ अकेले रहने का कितना समय है? इन प्रश्नों का उत्तर उच्च शिक्षा की वास्तविक स्थिति के बारे में कई औपचारिक गतिविधियों से अधिक बता सकता है।
समय का अभाव केवल व्यक्तिगत असुविधा नहीं है। यह ज्ञान-निर्माण को प्रभावित करता है। गहरी शिक्षा का स्वभाव ही धीमा है। एक पुस्तक को समझने, किसी सिद्धांत को आत्मसात करने, किसी शोध-समस्या को पहचानने और उसके समाधान तक पहुँचने में समय लगता है। यदि शिक्षा-व्यवस्था लगातार तात्कालिक गतिविधियों और समयबद्ध रिपोर्टिंग से भरी रहे, तो वह अनजाने में उन प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकती है जिनसे गंभीर ज्ञान पैदा होता है।
इसलिए समाधान कार्यक्रमों को समाप्त करना नहीं है। समाधान प्राथमिकताओं को पुनः व्यवस्थित करना है। महाविद्यालयों को आयोजन-विहीन नहीं, बल्कि आयोजन-प्रधान होने से बचाना होगा। कार्यक्रम शिक्षा के विस्तार का माध्यम रहें, शिक्षा के स्थानापन्न न बनें। शिक्षक की पहचान उसकी आयोजन क्षमता से अधिक उसकी अकादमिक तैयारी और बौद्धिक योगदान से हो। विद्यार्थी की सफलता केवल उसकी सहभागिता से नहीं, उसकी समझ, प्रश्नाकुलता, लेखन, शोध और स्वतंत्र चिंतन से भी मापी जाए। विभागों की सक्रियता उनके कार्यक्रमों की संख्या से अधिक उनके अकादमिक जीवन की गुणवत्ता से दिखाई दे।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि शिक्षा का हर महत्वपूर्ण काम सार्वजनिक प्रदर्शन योग्य नहीं होता। किसी शिक्षक का महीनों किसी विषय पर अध्ययन करना, किसी विद्यार्थी का एक पुस्तक के साथ लंबे समय तक संघर्ष करना, किसी शोधार्थी का अपने प्रश्न को बार-बार संशोधित करना या किसी विभाग में दो घंटे की गंभीर चर्चा—ये सभी ऐसे कार्य हैं जिनका तत्काल दृश्य प्रभाव नहीं होता, लेकिन उच्च शिक्षा की वास्तविक नींव इन्हीं से बनती है।
उच्च शिक्षा का संकट तब गंभीर हो जाता है जब संस्था अपने सबसे मूल्यवान कार्य को पहचानने की क्षमता खो देती है। यदि मंच, बैनर, फोटो और रिपोर्ट आसानी से सफलता के प्रमाण बन जाते हैं, लेकिन पुस्तकालय में बिताए गए घंटे, शोध की गुणवत्ता, कक्षा में हुए बौद्धिक संवाद और विद्यार्थियों के विचारों में आए परिवर्तन दिखाई नहीं देते, तो संस्थागत दृष्टि स्वाभाविक रूप से दृश्य गतिविधियों की ओर झुक सकती है। इसलिए चुनौती केवल गतिविधियों को कम करने की नहीं, बल्कि शिक्षा को देखने और मापने की दृष्टि को बदलने की भी है।
महाविद्यालय आखिरकार किसलिए है? केवल विद्यार्थियों को विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागी बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सोचने की क्षमता देने के लिए। केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान के साथ संबंध स्थापित करने के लिए। केवल रोजगार की तैयारी के लिए नहीं, बल्कि विवेक, संवेदना और स्वतंत्र निर्णय की क्षमता विकसित करने के लिए। और केवल सूचनाओं के संचरण के लिए नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य तैयार करने के लिए जो अपने समय को समझ सकें, प्रश्न कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर स्थापित धारणाओं की आलोचनात्मक जाँच कर सकें।
इसलिए आज उच्च शिक्षा के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि महाविद्यालय कितने सक्रिय हैं। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे कितने अकादमिक हैं। परिसर में कितनी गतिविधियाँ हो रही हैं, यह उपयोगी सूचना हो सकती है; लेकिन वहाँ कितना पढ़ा जा रहा है, कितना सोचा जा रहा है, कितना शोध हो रहा है और विद्यार्थियों में कितनी स्वतंत्र बौद्धिकता विकसित हो रही है—यह शिक्षा की वास्तविक स्थिति को अधिक गहराई से बताता है।
यदि किसी महाविद्यालय में कार्यक्रमों की संख्या बढ़ती जाए लेकिन पुस्तकालय का उपयोग घटता जाए, यदि रिपोर्टों का विस्तार होता जाए लेकिन शोध-संवाद सिकुड़ता जाए, यदि मंच अधिक सक्रिय हों लेकिन कक्षाएँ अधिक औपचारिक होती जाएँ, तो यह आवश्यक है कि हम अपनी उपलब्धियों के उत्सव के बीच कुछ समय आत्मपरीक्षण के लिए भी निकालें।
क्योंकि उच्च शिक्षा को केवल व्यस्त परिसर नहीं चाहिए; उसे ऐसा परिसर चाहिए जहाँ ज्ञान के लिए समय हो, प्रश्नों के लिए जगह हो, असहमति के लिए स्वतंत्रता हो, शोध के लिए धैर्य हो और विचार के लिए मौन भी उपलब्ध हो।
किसी महाविद्यालय की वास्तविक जीवंतता इस बात से नहीं तय होती कि वहाँ हर दिन कुछ हो रहा है। उसकी वास्तविक जीवंतता तब दिखाई देती है जब वहाँ से निकलने वाला विद्यार्थी केवल गतिविधियों की स्मृतियाँ लेकर नहीं, बल्कि एक विकसित दृष्टि, प्रश्न करने की क्षमता और अपने ज्ञान का निर्माण करने की आदत लेकर निकलता है।
यही वह बिंदु है जहाँ हमें उच्च शिक्षा के उत्सव और शिक्षा के वास्तविक जीवन के बीच अंतर करना होगा। उत्सव आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा उनका परिणाम नहीं है। शिक्षा एक धीमी, जटिल और अक्सर अदृश्य प्रक्रिया है। उसे मंच की रोशनी से अधिक पुस्तकालय की शांति, रिपोर्ट से अधिक शोध, प्रमाणपत्र से अधिक समझ और गतिविधि से अधिक विचार की आवश्यकता होती है।
यदि हम इस अंतर को पहचान लेते हैं, तभी महाविद्यालय फिर से केवल आयोजन-स्थल नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थों में अकादमिक परिसर बन सकेंगे।

