“जीवन कहीं और बह रहा है : व्याकरण के बाहर एक गुप्त भूगोल में”

जीवन कहीं और बह रहा है : व्याकरण के बाहर एक गुप्त भूगोल में।

मेरा जीवन-अनुभव धीरे-धीरे मुझे एक विचित्र, किंतु अत्यंत गहरी अनुभूति की ओर ले आया है। मुझे अब लगता है कि जीवन वहाँ नहीं है जहाँ हमने उसे सबसे अधिक खोजा है। वह केवल शब्दों में नहीं है, केवल वाक्यों में नहीं है, केवल व्याकरण के नियमों में नहीं है और न ही विराम-चिह्नों द्वारा व्यवस्थित उस अर्थ-व्यवस्था में है जिसके भीतर हम जन्म लेते हैं और धीरे-धीरे जीना सीखते हैं। जीवन को समझने के लिए हम उसे भाषा में बदलते हैं, भाषा को व्यवस्थित करने के लिए व्याकरण रचते हैं, व्याकरण के भीतर अर्थ की गति को नियंत्रित करने के लिए विराम-चिह्नों का सहारा लेते हैं और फिर इन सबको सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक नियमों की विस्तृत संरचनाओं से घेर देते हैं। धीरे-धीरे हम इस व्यवस्था के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि हमें लगने लगता है मानो यही जीवन है। किंतु शायद यहीं एक मूलभूत भ्रम जन्म लेता है। संभव है कि यह जीवन स्वयं न हो, बल्कि जीवन को समझने, पहचानने और व्यवस्थित करने के लिए बनाया गया उसका नक्शा हो।

और नक्शा भूगोल नहीं होता।

नक्शा किसी प्रदेश की रेखाओं को हमारे सामने रख सकता है, उसके रास्ते, सीमाएँ और दिशाएँ बता सकता है, किंतु वह पहाड़ की चढ़ाई का वास्तविक श्रम, हवा की ठंडक, धुंध की अनिश्चितता या किसी अनदेखे मोड़ पर अचानक बदल जाने वाले दृश्य को अपने भीतर नहीं रख सकता। उसी प्रकार भाषा जीवन की ओर संकेत कर सकती है, उसे साझा करने योग्य बना सकती है, उसके अनुभवों के लिए नाम और आकार उपलब्ध करा सकती है, किंतु जीवन की समूची जीवंतता भाषा के भीतर समाप्त नहीं हो जाती। मुझे कभी-कभी लगता है कि जीवन का वास्तविक भूगोल उन रेखाओं से बहुत दूर तक फैला हुआ है जिन्हें हमारे नक्शे पहचानते हैं। वह कहीं किसी पहाड़ी दर्रे में बह रहा है, कहीं धरती की सतह के नीचे अंधकार में अपना मार्ग बनाती किसी अदृश्य जलधारा में है, और कहीं समुद्र की सतह से बहुत नीचे उन गहरी धाराओं में प्रवाहित हो रहा है जिन्हें ऊपर उठती-गिरती लहरें भी नहीं जानतीं।

हम प्रायः जीवन की सतह पर रहते हैं और उसे सतह पर उपस्थित चिह्नों से समझने का प्रयत्न करते हैं। हमारे पास शब्द हैं, भूमिकाएँ हैं, संबंधों के नाम हैं, सफलता और असफलता के मापदंड हैं, नैतिकताएँ हैं, सामाजिक स्वीकृतियाँ हैं और व्यवहार को नियंत्रित करने वाले असंख्य नियम हैं। हम तय करते हैं कि कौन-सा वाक्य सही है और कौन-सा गलत, कहाँ अल्पविराम होगा, कहाँ प्रश्नचिह्न लगाया जाएगा, कहाँ रुकना उचित है और कहाँ आगे बढ़ना चाहिए। धीरे-धीरे जीवन एक संपादित पाठ की तरह दिखाई देने लगता है, मानो उसे ठीक प्रकार से जीने का अर्थ उसे व्याकरणसम्मत बनाना हो। किंतु मेरे भीतर कहीं एक दूसरा अनुभव लगातार जन्म लेता है। वह कहता है कि जीवन का वास्तविक प्रवाह शायद इस संपादित पाठ में नहीं है। वह संभवतः उस जगह पर है जहाँ भाषा अभी पहुँची नहीं, जहाँ अनुभव शब्द बनने से पहले अपनी किसी अस्पष्ट किंतु सघन अवस्था में विद्यमान है, जहाँ गति अभी नियम में रूपांतरित नहीं हुई है और जहाँ मौन केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि किसी अधिक गहरी उपस्थिति का संकेत है।

इसका अर्थ भाषा के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। भाषा हमारी अनिवार्यता है; उसके बिना हम अपने अनुभवों को दूसरों तक नहीं पहुँचा सकते, न ही स्मृति और चेतना के उस साझा संसार का निर्माण कर सकते हैं जिसमें मनुष्य एक-दूसरे के लिए उपलब्ध होता है। किंतु भाषा आवश्यक है, इसलिए वह जीवन से बड़ी नहीं हो जाती। जिस प्रकार विशाल आकाश को ‘आकाश’ कह देने से वह उस एक शब्द में समाप्त नहीं हो जाता, उसी प्रकार प्रेम, दुःख, सत्य, धर्म, मुक्ति या जीवन जैसे शब्द अपने-अपने अनुभवों की संपूर्ण गहराई को अपने भीतर बंद नहीं कर लेते। शब्द अनुभव की ओर संकेत करते हैं; वे स्वयं अनुभव नहीं होते। शायद मेरे अनुभव की पहली वास्तविक दरार यहीं से आरंभ होती है। मैं जीवन को उसके नाम से अलग करके देखना चाहता हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि ‘जीवन’ शब्द के पहले क्या है, वह कौन-सा कंपन है जिसे नाम देने से पहले शरीर जानता है, वह कौन-सी बेचैनी है जिसे मन अभी ‘दुःख’ कहने की जल्दी नहीं करता और वह कौन-सा विस्तार है जिसे ‘आनंद’ कह देने पर भी हम पूरी तरह समझ नहीं पाते। संभव है, जीवन उस जगह पर हो जहाँ नाम अभी आया नहीं है और अनुभव अपनी पहली, अनिर्वचनीय उपस्थिति में है।

इसीलिए पहाड़ी दर्रे का रूपक मुझे जीवन के बहुत निकट लगता है। दर्रा केवल दो पहाड़ों के बीच स्थित एक स्थान नहीं है; उसका वास्तविक अर्थ उसके बीच होने में नहीं, बल्कि पारगमन की संभावना में है। वह एक ऐसी जगह है जहाँ से एक ओर से दूसरी ओर जाया जा सकता है, किंतु वहाँ खड़ा व्यक्ति किसी भी ओर पूरी तरह स्थित नहीं होता। वह न पूरी तरह उस प्रदेश में रहता है जिसे पीछे छोड़ आया है और न अभी उस जगह पहुँचता है जहाँ उसे जाना है। वह हवा, चट्टान, ऊँचाई और अनिश्चितता के बीच स्थित होता है। शायद जीवन भी किसी स्थिर पहचान की वस्तु नहीं, बल्कि ऐसी ही एक पारगमनशील अवस्था है। हम बार-बार उसे निश्चित संज्ञाओं में पकड़ना चाहते हैं—मैं कौन हूँ, मेरा धर्म क्या है, मेरा समाज क्या है, मेरी सफलता क्या है, मेरा लक्ष्य क्या है—किंतु जीवन स्वयं शायद किसी निश्चित संज्ञा की तरह स्थिर नहीं होता। वह एक दर्रे की तरह है। उसमें होने का अर्थ ही गुजरते रहना है। हम अपने बारे में कहते हैं कि ‘मैं हूँ’, किंतु जीवन की भीतर की गति शायद अधिक सत्य रूप में यह कहती है कि ‘मैं गुजर रहा हूँ’। व्याकरण ‘हूँ’ में एक स्थिरता खोजता है, जबकि जीवन ‘गुजर रहा हूँ’ में अपनी वास्तविक गति का अनुभव करता है।

पहाड़ी दर्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वहाँ कोई रास्ता सदा सीधा और स्पष्ट नहीं होता। मार्ग कभी ऊपर चढ़ता है, कभी नीचे उतरता है, कभी एक मोड़ पर दिखाई देता है और अगले ही क्षण चट्टानों के पीछे खो जाता है। कहीं नीचे खाई होती है, कहीं ऊपर धुंध छा जाती है और कहीं दिशा इतनी अस्पष्ट हो जाती है कि केवल नक्शे का ज्ञान पर्याप्त नहीं रह जाता। वहाँ चलने वाले को अपने पैरों के नीचे की धरती, हवा की दिशा, अपने शरीर की थकान और दूरी के प्रत्यक्ष अनुभव पर भी भरोसा करना पड़ता है। शायद जीवन का वह क्षेत्र, जहाँ वह नियमों के बाहर दिखाई देता है, ऐसा ही कोई क्षेत्र है। नियम हमें दिशा बता सकते हैं, किंतु दर्रा हमसे यह भी पूछता है कि इस क्षण हमारे पैरों के नीचे धरती कैसी है। व्याकरण बता सकता है कि वाक्य कैसे बनेगा, किंतु जीवन का प्रश्न अधिक कठिन है—क्या तुम अभी भी उसी वाक्य को बोलना चाहते हो? समाज बता सकता है कि कौन-सा मार्ग प्रतिष्ठित है, किंतु पहाड़ की निःशब्द उपस्थिति पूछती है कि तुम वास्तव में किस दिशा में जा रहे हो। और शायद किसी मनुष्य के जीवन में एक ऐसा क्षण आता है जब उसे पहली बार यह अनुभव होता है कि उसे केवल रास्ते का ज्ञान नहीं, चलने की वास्तविकता चाहिए।

इस अनुभव का दूसरा रूपक धरती के भीतर बहते जल का है। धरती की सतह पर बहुत कुछ स्पष्ट दिखाई देता है—सड़कें, मकान, खेत, सीमाएँ, शहर और राज्य। मनुष्य उनका नक्शा बना सकता है, रेखाएँ खींच सकता है और यह निश्चित कर सकता है कि कहाँ से कहाँ तक कौन-सा क्षेत्र फैला हुआ है। किंतु धरती के भीतर भी एक संसार है, जो हमारी दृष्टि से अधिकांशतः ओझल रहता है। वहाँ जल बहता है, दबाव बनते हैं, ताप बदलता है, चट्टानें बनती और टूटती हैं, और अंधकार में ऐसी प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं जिनका प्रत्यक्ष ज्ञान सतह पर खड़े मनुष्य को बहुत कम होता है। फिर भी सतह का जीवन उन्हीं अदृश्य गहराइयों पर टिका होता है।

शायद मनुष्य के भीतर भी ऐसा ही कोई भूमिगत जीवन है। हमारे व्यक्तित्व का जो भाग दिखाई देता है, वह हमारी सतह है। वहाँ हमारा नाम है, हमारी भूमिकाएँ हैं, हमारा व्यवसाय है, हमारी प्रतिष्ठा है, हमारे विचार हैं और हमारे घोषित विश्वास हैं। हम स्वयं को प्रायः इन्हीं के माध्यम से पहचानते हैं और दूसरों के सामने भी इन्हीं रूपों में उपस्थित होते हैं। किंतु इनके नीचे स्मृतियों की कोई गहरी जलधारा बहती रहती है। वहाँ ऐसी इच्छाएँ हो सकती हैं जिन्हें हमने कभी शब्द नहीं दिए, ऐसे भय हो सकते हैं जिन्हें हमने स्वीकार करने का साहस नहीं किया, ऐसी अनुभूतियाँ हो सकती हैं जिन्हें किसी सामाजिक व्याकरण में स्थान नहीं मिला और ऐसी प्रसन्नताएँ भी हो सकती हैं जिन्हें हमने केवल इसलिए महत्वहीन मान लिया कि वे किसी उपयोगिता की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। हमारी घोषित चेतना सतह पर अपना जीवन जीती रहती है, लेकिन संभव है कि हमारा अधिक वास्तविक जीवन धरती के भीतर, किसी अदृश्य मार्ग पर, चुपचाप अपना रास्ता बना रहा हो।

कभी कोई छोटी-सी घटना अचानक उस भूमिगत धारा तक पहुँच जाती है। कोई संगीत सुनते ही भीतर कुछ हिल उठता है; किसी गंध से वर्षों पुरानी कोई अनाम स्मृति लौट आती है; किसी अजनबी के चेहरे में हमें पता नहीं क्या दिखाई देता है; किसी पुराने घर की सीढ़ी, अचानक सामने आ गया कोई वृक्ष, कोई एक शब्द या किसी क्षण का लंबा मौन हमारे भीतर ऐसी हलचल पैदा कर देता है जिसे हम तुरंत समझ नहीं पाते। तब भाषा अपनी स्वाभाविक अधीरता के साथ पूछती है कि इसे क्या नाम दिया जाए। किंतु शायद हर अनुभव तुरंत नाम नहीं चाहता। कुछ अनुभवों को शब्द देना कभी-कभी वैसा हो सकता है जैसे धरती के भीतर बहते जल को तुरंत नहर में बाँध देना। नहर उपयोगी हो सकती है, उसका जल दिशा पा सकता है, किंतु उस भूमिगत धारा का अपना अंधकार, अपनी स्वाभाविक दिशा और अपनी अप्रत्याशित गति बदल जाती है। शायद इसीलिए जीवन को हर बार तुरंत समझ लेना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी उसे बिना व्याख्या के बहने देना भी आवश्यक होता है।

समुद्र की बहुत गहरी धारा का रूपक इस अनुभव को एक और आयाम देता है। समुद्र की सतह पर निरंतर हलचल है। लहरें उठती हैं, टूटती हैं, चमकती हैं और समाप्त हो जाती हैं। मौसम बदलते ही समुद्र का चेहरा बदल जाता है और हवा का एक झोंका भी उसकी सतह को बेचैन कर सकता है। हमारा सामाजिक जीवन भी कुछ ऐसा ही है। समाचार की लहरें हैं, राजनीति की लहरें हैं, प्रतिष्ठा की लहरें हैं, सफलता और असफलता की लहरें हैं, दूसरों की राय, प्रशंसा और निंदा की लहरें हैं। लगभग हर दिन कोई नई घटना उठती है और कुछ समय के लिए हमें लगता है कि यही पूरा समुद्र है। किंतु समुद्र की गहराई में धाराएँ एक भिन्न गति से बहती हैं। वे बहुत धीमी, बहुत दीर्घकालिक और सतह की उत्तेजना से अपेक्षाकृत अप्रभावित हो सकती हैं। सतह पर तूफान चल रहा हो और गहराई में कोई प्राचीन धारा फिर भी अपने लंबे मार्ग पर बह रही हो।

शायद जीवन का कुछ सबसे वास्तविक अंश भी ऐसा ही है। हमारी सतह पर बहुत कुछ घटता है और उन घटनाओं की वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता। हम हँसते हैं, दुखी होते हैं, सफल होते हैं, हारते हैं, स्वीकार किए जाते हैं और अस्वीकार भी किए जाते हैं। ये सब हमारे जीवन की वास्तविक घटनाएँ हैं, किंतु प्रश्न यह है कि क्या यही जीवन की संपूर्णता है। मेरे भीतर उठता अनुभव कहता है कि शायद नहीं। संभव है कि मेरे भीतर कोई ऐसी धारा भी बह रही हो जो इन घटनाओं की तत्कालिकता से कहीं अधिक गहराई में अपना मार्ग बनाती है। वह मेरी सफलता से पूरी तरह निर्मित नहीं होती और असफलता से पूरी तरह नष्ट भी नहीं हो जाती। वह दूसरों की प्रशंसा से अस्तित्व में नहीं आती और निंदा से समाप्त नहीं होती। उसकी गति शायद किसी दूसरे काल में है, किसी ऐसी अवधि में जिसका माप हमारे दैनिक उतार-चढ़ाव से नहीं किया जा सकता। शायद जीवन की सबसे कठिन साधना इसी गहरी धारा को सुनना है।

कठिनाई यह है कि हमारी पूरी सभ्यता हमें सतह पर सुनना सिखाती है। हमें शीघ्र उत्तर देने होते हैं, अपनी पहचान बतानी होती है, निर्णय लेना होता है, अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होती है, किसी पक्ष का चयन करना होता है, नियमों का पालन करना होता है, परिणाम प्रस्तुत करने होते हैं और बार-बार अपने जीवन को प्रमाणित करना पड़ता है। धीरे-धीरे यह बाहरी शोर इतना सघन हो जाता है कि भीतर बहती धीमी धारा की आवाज़ सुनाई देना कठिन हो जाता है। कभी-कभी व्यक्ति एक ऐसे बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ उसे यह भी पता नहीं रहता कि वह स्वयं क्या चाहता है; वह केवल इतना जानता है कि उससे क्या अपेक्षित है।

यहीं शायद जीवन और व्यवस्था के बीच का सबसे सूक्ष्म अंतर उपस्थित होता है। व्यवस्था मनुष्य से उसकी भूमिका पूछती है, जबकि जीवन उससे यह पूछता है कि उसके भीतर क्या बह रहा है। व्याकरण इस बात की चिंता करता है कि वाक्य सही है या नहीं, जबकि जीवन का प्रश्न कभी-कभी इससे पहले का होता है—क्या यह वास्तव में तुम्हारे अनुभव का वाक्य है? विराम-चिह्न हमें बताते हैं कि कहाँ रुकना है और कहाँ किसी वाक्य या विचार को समाप्त मानना है, किंतु जीवन की गति कभी यह पूछ सकती है कि क्या तुम्हें सचमुच यहीं रुकना है, और जिसे तुम समाप्त मान चुके हो, क्या वह वास्तव में समाप्त हो गया है? शायद इसीलिए जीवन की सबसे गहरी अनुभूति नियमों को नष्ट कर देने में नहीं, बल्कि उनसे थोड़ी दूरी बनाकर उन्हें बाहर से देखने में होती है। पहाड़ी दर्रे में खड़ा व्यक्ति पहली बार पीछे छूटे मैदान को एक साथ देख सकता है। धरती के भीतर की धारा का आभास तभी होता है जब हम सतह की स्थिरता को अंतिम सत्य मानना छोड़ते हैं। समुद्र की गहराई का अनुमान भी तभी लगता है जब लहरों को समुद्र की संपूर्णता मानने का भ्रम टूटता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि व्याकरण निरर्थक है, विराम-चिह्न व्यर्थ हैं या नियम हमारे शत्रु हैं। वे सभी मनुष्य के साझा जीवन के लिए आवश्यक हैं। भाषा हमें संवाद देती है, व्याकरण अर्थ को एक साझा अनुशासन देता है, विराम-चिह्न हमारी अभिव्यक्ति को साँस लेने की जगह देते हैं और सामाजिक नियम सह-अस्तित्व को संभव बनाते हैं। समस्या इन संरचनाओं के होने में नहीं, बल्कि तब उत्पन्न होती है जब हम संरचना को ही जीवन समझ लेते हैं। भाषा जीवन का घर हो सकती है, किंतु वह जीवन का पूरा आकाश नहीं है। व्याकरण जीवन के कुछ अनुभवों को व्यवस्थित कर सकता है, किंतु वह जीवन की समूची गति को पहले से निर्धारित नहीं कर सकता। विराम-चिह्न हमें ठहरने और साँस लेने की जगह दे सकते हैं, किंतु वे अनुभव की वास्तविक समाप्ति का अंतिम निर्णय नहीं कर सकते। नियम मनुष्यों के साथ रहने की संभावना को सुरक्षित कर सकते हैं, किंतु वे जीवन की अंतिम संभावना नहीं हो सकते।

जीवन का एक अंश हमेशा इन सबके बाहर बचा रहता है। शायद वही अंश नए शब्दों को जन्म देता है और पुराने व्याकरण को अचानक अपर्याप्त बना देता है। वही किसी पुराने वाक्य के बीच एक अनपेक्षित मोड़ पैदा करता है और एक अल्पविराम के बाद ऐसा वाक्य आरंभ कर देता है जिसकी कल्पना स्थापित अर्थ-व्यवस्था ने नहीं की थी। वही स्थापित नियम के सामने खड़ा होकर धीरे से पूछता है—लेकिन मेरे अनुभव का क्या?

शायद मेरे जीवन-अनुभव की सबसे गहरी खोज अब यही है कि मैं जीवन को तुरंत शब्द में बदलने की जल्दी न करूँ। हर अनुभव को व्याख्या में कैद करना आवश्यक नहीं, हर मौन को रिक्त मानना आवश्यक नहीं, हर ठहराव को अंतिम विराम समझना आवश्यक नहीं और हर अनिश्चितता को त्रुटि मान लेना भी आवश्यक नहीं। संभव है कि कभी-कभी मुझे अपने भीतर उस पहाड़ी दर्रे तक जाना पड़े जहाँ पुराना रास्ता पीछे छूट चुका है और नया मार्ग अभी पूरी तरह दिखाई नहीं देता। कभी मुझे उस भूमिगत जलधारा के पास बैठना पड़े जो अंधकार में बहती है और जिसे अपने बहने के लिए किसी दर्शक की आवश्यकता नहीं। कभी समुद्र की सतह से नीचे उतरना पड़े, उस गहराई तक जहाँ जीवन की बड़ी-बड़ी घटनाओं की लहरें भी धीरे-धीरे अपनी आवाज़ खो देती हैं और कोई गहरी धारा बिना घोषणा किए, बिना अपना अर्थ सिद्ध किए, अपने स्वाभाविक मार्ग पर बहती रहती है।

शायद वहीं जीवन पहली बार अपने सबसे सरल, किंतु सबसे कठिन सत्य में सुनाई देता है। तब वह किसी नियम के रूप में सामने नहीं आता, न किसी वाक्य के अंतिम अर्थ के रूप में और न ही किसी पूर्ण विराम तक पहुँच जाने वाली वस्तु के रूप में। वह केवल अपनी गति में उपस्थित होता है। वह पहाड़ों के बीच से गुजरता है, अनदेखी चट्टानों के नीचे से अपना रास्ता बनाता है, स्मृति के अंधकार से होकर बहता है और समय की सतह से बहुत नीचे अपनी अनसुनी यात्रा जारी रखता है। कभी वह शब्द बन जाता है, कभी मौन रह जाता है; कभी नियमों के भीतर अपनी जगह बना लेता है और कभी उन नियमों से बाहर निकलकर हमें यह अनुभव कराता है कि उसकी संभावना हमारे बनाए हुए ढाँचों से अधिक विस्तृत है।

शायद जीवन को जानने का अर्थ उसे पूरी तरह पकड़ लेना नहीं है। संभव है कि उसे जानने का अर्थ केवल इतना हो कि एक दिन हम उसके इतने निकट पहुँच सकें कि उसकी गति में बाधा न डालें। शायद उस क्षण हमें उससे यह पूछना बंद करना होगा कि उसका अंतिम अर्थ क्या है। हम उसके अर्थ को किसी अंतिम परिभाषा में बंद करने की अधीरता से मुक्त होंगे और पहली बार उसकी गति को ही सुन सकेंगे। तब संभव है कि जीवन का उत्तर किसी विचार की तरह नहीं, एक बहती हुई अनुभूति की तरह हमारे भीतर प्रकट हो—मेरा अर्थ मेरे बहने में है।

उस क्षण व्याकरण समाप्त नहीं होगा, किंतु वह अपनी सीमा पहचान लेगा। विराम-चिह्न मिट नहीं जाएँगे, किंतु वे स्वयं को अंतिम निर्णय मानना छोड़ देंगे। नियम नष्ट नहीं होंगे, किंतु जीवन के स्वामी होने का अपना दावा त्याग देंगे। और शायद मनुष्य पहली बार यह समझ सकेगा कि वह जीवन को बना नहीं रहा था; वह बहुत लंबे समय से स्वयं उसी जीवन के भीतर बह रहा था।

तब जीवन किसी वाक्य के भीतर बंद दिखाई नहीं देगा। वाक्य जीवन की सतह पर उठती हुई एक लहर मात्र होगा—क्षण भर के लिए आकार ग्रहण करता हुआ, फिर बदलता हुआ, टूटता हुआ और किसी दूसरी गति में विलीन हो जाता हुआ। जीवन उस गहरी धारा में होगा जो वाक्य बनने से पहले भी बह रही थी और वाक्य के टूट जाने के बाद भी बहती रहेगी। उसे किसी अंतिम पूर्ण विराम की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि उसका सत्य किसी समाप्ति में नहीं, अपनी अनवरत गति में निहित होगा।

शायद यही जीवन का वह गुप्त भूगोल है जिसे हम अपने शब्दों, नियमों और नक्शों के बीच रहते हुए बार-बार खो देते हैं—और फिर कभी किसी पहाड़ी दर्रे, किसी अनाम स्मृति, किसी गहरे मौन या समुद्र की अज्ञात गहराई में उसका एक क्षणिक आभास पाकर समझते हैं कि जीवन कहीं गया नहीं था। हम ही उसकी सतह पर बने चिह्नों को जीवन का पूरा सत्य मान बैठे थे।

जीवन तब भी बह रहा था।

हमारे बोलने से पहले भी, हमारे चुप हो जाने के बाद भी।

हमारे नियम बनाने से पहले भी और उनके टूट जाने के बाद भी।

हमारी पहचान से पहले भी और पहचान के बदल जाने के बाद भी।

वह बह रहा था—और शायद जीवन का सबसे गहरा बोध इसी विनम्र स्वीकृति से आरंभ होता है कि हमें उसे अपने अर्थों में समाप्त नहीं करना है। हमें केवल इतना सीखना है कि जब उसकी गहरी, धीमी और अनाम धारा हमारे भीतर से गुजरे, तब हम उसे पहचानने की उतावली में उसका रास्ता न रोक दें।

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