संबंध प्राकृतिक हैं, समाज संबंध पैदा नहीं करता, यह पहली बात समझ लेनी चाहिए। समाज पहले से घट रहे संबंधों को पकड़ता है, उन्हें नाम देता है, वर्गीकृत करता है, स्थिर करता है और अंततः नियमों में ढाल देता है। एक बच्चे और माँ के बीच जो कुछ है, वह मूलतः जैविक है — स्पर्श, पोषण, निर्भरता, ऊष्मा, सुरक्षा, दो शरीरों के बीच का विनिमय, एक जीव का दूसरे पर गहरा आश्रय। यह संबंध किसी कानून की प्रतीक्षा करके शुरू नहीं होता। बच्चे को भूख लगती है, कोई उसे भोजन देता है; वह रोता है, कोई उसकी ओर बढ़ आता है; वह असुरक्षित महसूस करता है, किसी की मौजूदगी उसे थाम लेती है। इस वक़्त “माता” कोई संस्थागत पद नहीं, बस एक जीवित रिश्ता है। समाज इसी रिश्ते को पहचानकर उसे नाम देता है — माता। और नाम मिलते ही वह सिर्फ़ पहचाना नहीं जाता, उसके इर्द-गिर्द अपेक्षाओं का एक अदृश्य ढाँचा भी खड़ा हो जाता है: माता को ऐसा होना चाहिए, संतान को वैसा; यह दायित्व है, यह अधिकार है, यह उत्तराधिकार है। इस तरह जीवित रिश्ता धीरे-धीरे भूमिका बनता है, भूमिका नियम में ढलती है, नियम संस्था बन जाता है, और संस्था अंततः सत्ता द्वारा संरक्षित एक व्यवस्था में बदल जाती है — यानी जीवित संबंध से सामाजिक संबंध, और सामाजिक संबंध से संस्थागत संबंध तक की यही यात्रा है, और यहीं सत्ता का प्रवेश होता है।
इसी बिंदु पर समाज की इंजीनियरिंग का पहला रहस्य भी खुलता है — समाज महज़ संबंधों को नाम नहीं देता, वह नाम के भीतर व्यवहार का पूरा भविष्य छिपा देता है। “माता” कह देने का मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि इस व्यक्ति और इस बच्चे के बीच एक ख़ास रिश्ता है; इसका मतलब यह भी बनने लगता है कि अब इस व्यक्ति से कुछ अपेक्षित है — वह देखभाल करेगी, वह छोड़ नहीं सकती, उसका एक उत्तरदायित्व है, बच्चे के भी कुछ अधिकार हैं। फिर इन अपेक्षाओं को नैतिकता सहारा देती है — अच्छी माँ, बुरी माँ — और उसके बाद कानून घुस आता है: अभिभावकत्व, संरक्षण, उत्तराधिकार, संरक्षकता। फिर संस्था खड़ी होती है — परिवार — और उसके भीतर भूमिकाएँ व्यवस्थित हो जाती हैं। संबंध अब केवल जीवित नहीं रहा, वह सामाजिक रूप से परिभाषित एक जीवन-भूमिका बन चुका है।
सभ्यता के लिए यह बदलाव ज़रूरी भी है — इसके बिना किसी विशाल समाज में व्यवहार का पूर्वानुमान लगाना मुमकिन ही नहीं होता। लेकिन इसी ज़रूरत के भीतर सत्ता की संभावना भी छिपी बैठी है, क्योंकि जिस क्षण समाज यह तय करने लगता है कि किसी रिश्ते का “सही” रूप क्या है, उसी क्षण वह यह तय करने की ताक़त भी पा लेता है कि कौन-सा संबंध वैध है और कौन-सा अवैध, कौन-सा सामान्य है और कौन-सा असामान्य, कौन स्वीकार्य है और कौन नहीं। यहीं से समाज की इंजीनियरिंग महज़ व्यवस्था बनाना नहीं रह जाती — वह वास्तविकता की सामाजिक व्याख्या करने लगती है।
समाज की सबसे सूक्ष्म ताक़त यह नहीं कि वह हमें हुक्म देता है। उसकी असली गहराई इसमें है कि वह हमें कुछ ऐसी श्रेणियाँ थमा देता है, जिनके भीतर से हम ख़ुद को और दूसरों को देखना शुरू कर देते हैं — यह परिवार है, यह विवाह है, यह संपत्ति है, यह पद है, यह अपराध है, यह प्रतिष्ठा है, यह सफलता है, यह असफलता है, यह पुरुष है, यह स्त्री है, यह नागरिक है, यह शिक्षक है, यह विद्यार्थी है, यह अधिकारी है, यह अधीनस्थ है। धीरे-धीरे ये शब्द केवल वर्णन करना छोड़ देते हैं और व्यवहार के साँचे बन जाते हैं। एक व्यक्ति अब सिर्फ़ व्यक्ति नहीं रहता, वह “पिता” बन जाता है; दूसरा सिर्फ़ मनुष्य नहीं, “पुत्र” बन जाता है। कोई ज्ञान रखने वाला भर नहीं रहता, “शिक्षक” कहलाता है; कोई सीखने वाला भर नहीं रहता, “विद्यार्थी” कहलाता है। पद के साथ अपेक्षा जुड़ती है, अपेक्षा के साथ आचरण, आचरण के साथ मूल्यांकन, और मूल्यांकन के साथ पुरस्कार या दंड — और इसी शृंखला में जीवन का मूल रिश्ता धीरे-धीरे भूमिका-संबंध में बदल जाता है। भूमिका की ख़ासियत यही है कि वह व्यक्ति से पहले से तय व्यवहार माँगती है, और यहीं समाज व्यक्ति के भीतर उतर आता है — अब उसे हर पल यह सोचने की ज़रूरत नहीं रहती कि उसे क्या करना है, क्योंकि उसकी भूमिका पहले ही बहुत कुछ तय कर चुकी होती है। “मैं शिक्षक हूँ” कहते ही व्यवहार की एक पूरी शृंखला अपने आप साथ चली आती है, “मैं पिता हूँ” कहते ही दूसरी, “मैं अधिकारी हूँ” कहते ही तीसरी। व्यक्ति किसी परिस्थिति में उतरने से पहले ही सामाजिक अर्थों से भरा हुआ होता है — इसलिए समाज सिर्फ़ बाहर नहीं है, वह व्यक्ति के भीतर स्थापित हो चुका होता है।
यहीं समाज की इंजीनियरिंग का सबसे अनकहा स्तर शुरू होता है — बाहरी नियम का भीतरी इच्छा में बदल जाना। पहले समाज कहता है कि ऐसा करना चाहिए, फिर परिवार कहता है कि ऐसा करना उचित है, फिर नैतिकता कहती है कि अच्छा व्यक्ति ऐसा ही करता है, और आख़िर में व्यक्ति ख़ुद कहने लगता है कि मुझे ऐसा ही करना चाहिए। अब बाहरी सत्ता को हर पल आदेश देने की ज़रूरत नहीं रहती — व्यक्ति स्वयं अपने आचरण पर निगरानी रखने लगता है, और यहीं सामाजिक व्यवस्था अपनी सबसे ताक़तवर शक्ल में पहुँचती है। कानून बाहर से नियंत्रित करता है, पर अंतःस्थापित सामाजिक मानदंड भीतर से नियंत्रित करते हैं। कानून कह सकता है — यह मत करो; लेकिन प्रतिष्ठा, लज्जा, अपराधबोध, सम्मान, संस्कार और पहचान कहीं ज़्यादा महीन ढंग से कहते हैं — तुम ऐसे व्यक्ति हो, इसलिए तुम्हें ऐसा करना ही चाहिए। यहाँ सत्ता किसी पुलिस या अदालत की शक्ल में नहीं दिखती, वह अंतरात्मा की आवाज़ जैसी सुनाई देती है, और यही उसकी सबसे बड़ी सूक्ष्मता है।
शायद इसीलिए समाज की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग संस्थाएँ खड़ी करना नहीं, बल्कि मानव-व्यवहार को पूर्वानुमेय बना देना है। अगर समाज को पहले से मालूम है कि “माता” कैसे व्यवहार करेगी, “शिक्षक” कैसे करेगा, “विद्यार्थी” क्या करेगा, “कर्मचारी” क्या करेगा, तो अनगिनत मनुष्यों को सीधे आदेश देने की नौबत ही नहीं आती — भूमिकाएँ ख़ुद व्यवहार का ख़ाका सौंप देती हैं। इस नज़र से सामाजिक संस्था एक तरह की स्मृति-संरचना भी है: उसने अनगिनत पीढ़ियों के अनुभव से कुछ व्यवहारों को जमाया और उन्हें अगली पीढ़ी को थमा दिया। व्यक्ति को हर बार रिश्ते की नई व्याख्या नहीं गढ़नी पड़ती, उसे तैयार सामाजिक व्याकरण मिल जाती है — और यही सभ्यता की ताक़त है। यही उसकी सीमा भी है, क्योंकि जो व्यवस्था कभी जीवन की किसी सच्ची ज़रूरत से जन्मी थी, वह वक़्त के साथ अपने मूल कारण से कट सकती है और ख़ुद ही उद्देश्य बन बैठती है — तब साधन साध्य में बदल जाता है। परिवार मनुष्य के लिए बना था, पर कई बार मनुष्य परिवार की प्रतिष्ठा के लिए जीने लगता है। शिक्षा मनुष्य की क्षमता खोलने के लिए बनी थी, पर कई बार मनुष्य सिर्फ़ प्रमाणपत्र के लिए पढ़ने लगता है। पद काम को व्यवस्थित करने के लिए बना था, पर व्यक्ति पद की रक्षा को ही काम से ज़्यादा अहम मानने लगता है। कानून न्याय के लिए बना था, पर कई बार न्याय की जगह कानून की प्रक्रिया ख़ुद सर्वोच्च हो जाती है। यहीं संस्था और जीवन के बीच दूरी पैदा होती है।
इस दूरी को समझने के लिए “जीवित संबंध” और “स्थिर सामाजिक संबंध” का फ़र्क़ बहुत काम आता है। जीवित रिश्ता लगातार बदलता रहता है — माँ और बच्चे का संबंध जन्म के क्षण में जैसा है, दस साल बाद वैसा नहीं रहता, बीस साल बाद और भी अलग हो जाता है; बच्चा निर्भरता से स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है, और रिश्ता भी साथ-साथ बदलता चलता है। लेकिन संस्था को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक स्थिर परिभाषा चाहिए, इसलिए वह कहती रहती है — माता, संतान, अभिभावक, उत्तराधिकारी। यानी जीवन रिश्ते को बदलता है, संस्था उसे पहचानने लायक बनाए रखने के लिए स्थिर करती है। यह स्थिरीकरण ज़रूरी है, पर हर स्थिरीकरण में एक ख़ामोश हिंसा भी छिपी होती है — वह जीवित सच्चाई के किसी हिस्से को बाहर छोड़ देता है। किसी को “माता” कहने से उसका एक रिश्ता तो दिखता है, पर वह व्यक्ति केवल माता नहीं है — वह ख़ुद एक स्वतंत्र चेतना है, उसकी अपनी इच्छाएँ हैं, अपनी आकांक्षाएँ, अपना भय, अपना इतिहास। “संतान” भी सिर्फ़ संतान नहीं है। जब सामाजिक भूमिका व्यक्ति की पूरी सच्चाई को ढक लेती है, तब पहचान व्यक्ति पर लादी गई एक संरचना बन जाती है — और जब भूमिका किसी ख़ास परिस्थिति को व्यक्त करने के बजाय व्यक्ति की सम्पूर्ण वास्तविकता ही बन बैठती है, तब सामाजिक संरचना जीवित रिश्ते पर हावी होने लगती है। यहीं से विकृति का सामाजिक रूप जन्म लेता है।
तो सत्ता इस पूरी प्रक्रिया में कहाँ खड़ी है? सत्ता कोई ऊपर बैठी हुई संस्था भर नहीं — उसकी गहरी प्रकृति यह है कि वह यह तय करने की ताक़त पा लेती है कि कौन-सी सामाजिक व्याख्या मान्य होगी। कौन पति है, कौन पत्नी, कौन उत्तराधिकारी, किसके पास भूमि है, कौन नागरिक है, किसका बयान प्रमाण माना जाएगा, कौन शिक्षित है, कौन योग्य है, किसे पुरस्कार मिलेगा और किसे दंड, किसका व्यवहार “सामान्य” कहलाएगा — इन सवालों के जवाब केवल तथ्य से नहीं निकलते, सामाजिक व्यवस्था से निकलते हैं। और जब इन जवाबों को कानून, प्रशासन और दंड की ताक़त मिल जाती है, तब वे व्यक्ति के जीवन पर सचमुच असर डालने लगते हैं। इसलिए सत्ता हमेशा रिश्ते पैदा नहीं करती, अक्सर वह पहले से मौजूद सामाजिक वर्गीकरणों को वैधता, स्थायित्व और बाध्यता भर देती है — और यही वजह है कि सत्ता का सबसे असरदार रूप आदेश नहीं, वर्गीकरण होता है। एक बार किसी को किसी श्रेणी में डाल दिया जाए तो उसके साथ बर्ताव करने का पूरा ढाँचा अपने आप सक्रिय हो जाता है।
और फिर भाषा इस पूरी इंजीनियरिंग की सबसे बारीक़ तकनीक बन जाती है, क्योंकि सत्ता को हर व्यक्ति को अलग-अलग नियंत्रित नहीं करना पड़ता — उसे बस ऐसी भाषा चाहिए जिसमें दुनिया पहले से बँटी हो: अपना-पराया, योग्य-अयोग्य, उच्च-निम्न, वैध-अवैध, अधिकारी-कर्मचारी, मालिक-श्रमिक, अपराधी-निर्दोष। एक बार ये शब्द सामाजिक चेतना में बैठ जाएँ, तो मनुष्य ख़ुद इन्हीं श्रेणियों में स्वयं को देखने लगता है। भाषा अब केवल संप्रेषण का साधन नहीं रहती, वह सामाजिक वास्तविकता की वर्गीकरण-व्यवस्था बन जाती है, और व्याकरण उस वर्गीकरण को हर वाक्य में लगातार दोहराती रहती है। “उसने अपराध किया” और “वह अपराधी है” — पहला किसी घटना का बयान है, दूसरा किसी की पहचान गढ़ देता है। यहीं क्रिया से कर्ता तक और कर्ता से पहचान तक की यात्रा पूरी होती है, और एक बार पहचान बन जाए तो व्यक्ति के भविष्य की सामाजिक संभावनाएँ भी बदल जाती हैं — समाज की गहरी इंजीनियरिंग यही है कि वह सिर्फ़ वर्तमान व्यवहार नहीं, भविष्य के व्यवहार की संभावनाओं को भी व्यवस्थित कर देता है।
इसीलिए “कर्तव्य” सामाजिक व्यवस्था में इतना ताक़तवर शब्द बन जाता है — कर्तव्य का मतलब है भविष्य के व्यवहार को वर्तमान में ही तय कर देना। तुम पिता हो, इसलिए यह करना चाहिए; तुम शिक्षक हो, इसलिए यह करना चाहिए; तुम नागरिक हो, तुम कर्मचारी हो, इसलिए यह करना चाहिए — यानी वर्तमान में एक पहचान गढ़कर उसका असर भविष्य की क्रियाओं पर डाल दिया गया। यहीं सामाजिक समय और मनोवैज्ञानिक समय आपस में जुड़ जाते हैं — अतीत में तुम्हें एक भूमिका दी गई, वर्तमान में तुम उसी भूमिका में हो, और भविष्य में तुमसे उसी के अनुसार व्यवहार अपेक्षित है। समाज व्यक्ति को सिर्फ़ जगह नहीं देता, समय में एक निरंतरता भी देता है, और यही कर्तापन की सामाजिक बुनियाद बनती है।
यहीं से “मैं” भी उलझता चला जाता है। “मैं कौन हूँ” का जवाब व्यक्ति ख़ुद नहीं गढ़ता — वह सामाजिक रूप से उपलब्ध अनगिनत श्रेणियों में से कुछ को अपने ऊपर ओढ़ लेता है: मैं शिक्षक हूँ, मैं पिता हूँ, मैं नागरिक हूँ, मैं इस संस्था से हूँ, मैं सफल हूँ या असफल, सम्मानित हूँ या अपमानित। धीरे-धीरे ये सारे सामाजिक वर्णन मिलकर एक भीतरी कथा बुन देते हैं, और फिर व्यक्ति केवल समाज में भूमिका नहीं निभाता — वह उसी भूमिका को अपना अस्तित्व मान बैठता है। यहीं सामाजिक संरचना मनोवैज्ञानिक संरचना में बदल जाती है, और तब सत्ता को बाहर से बहुत कम काम करना पड़ता है, क्योंकि व्यक्ति ख़ुद अपने “मैं” की रक्षा करने लगता है — अपने पद की, अपनी प्रतिष्ठा की, अपने परिवार की छवि की, अपने विचार की, अपने सामाजिक तबके की। यहाँ यह “पकड़” केवल व्यक्तिगत मनोविज्ञान नहीं रह जाती — समाज ने व्यक्ति को ऐसी पहचानें दीं जिनसे उसकी पकड़ ख़ुद-ब-ख़ुद उपजने लगी।
फिर भी समाज की इस इंजीनियरिंग को सिर्फ़ दमन की कहानी मान लेना अधूरा होगा। समाज हमें सीमित भी करता है और संभव भी बनाता है। भाषा हमें वर्गीकृत करती है, पर उसी से हम साझा अर्थ रच पाते हैं। परिवार हमें भूमिकाएँ थमाता है, पर उसी से देखभाल और ज़िम्मेदारी की निरंतरता बनती है। कानून हमें बाँधता है, पर उसी से कुछ अधिकार सुरक्षित भी रहते हैं। संस्था व्यवहार को जमाती है, पर उसी की बदौलत लाखों लोग एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठा पाते हैं। इसलिए दिक़्क़त संरचना के होने में नहीं है — दिक़्क़त तब आती है जब संरचना यह भूल जाती है कि वह जीवन के लिए बनाई गई थी, और इससे भी बड़ी दिक़्क़त तब आती है जब मनुष्य यह भूल जाता है कि वह ख़ुद संरचना है, जीवन नहीं।
यहीं “सहजता और पकड़” वाली पूरी खोज सामाजिक स्तर पर उतर आती है। जीवन में जो पकड़ “यह मेरा है” के रूप में होती है, समाज उसे संस्था देकर कहता है “यह कानूनी रूप से तुम्हारा है।” जीवन में जो पहचान “मैं ऐसा हूँ” के रूप में होती है, समाज उसे भूमिका देकर कहता है “तुम्हारी सामाजिक स्थिति यही है।” जीवन में जो भविष्य की चिंता “मुझे ऐसा होना चाहिए” के रूप में उठती है, समाज उसे कर्तव्य देकर कहता है “तुम्हें ऐसा करना चाहिए।” इस तरह व्यक्ति की भीतरी पकड़ और समाज की बाहरी संरचना एक-दूसरे को लगातार मज़बूत करती चलती हैं, और शायद यही वह बिंदु है जहाँ सामाजिक इंजीनियरिंग और मनोवैज्ञानिक इंजीनियरिंग एक होकर घुल जाती हैं।
इस पूरी प्रक्रिया को अगर एक साँस में देखा जाए तो यह जीवित संबंध से शुरू होकर नामकरण, वर्गीकरण, भूमिका, अपेक्षा, मानदंड, कर्तव्य, पहचान, संस्था, कानून, सत्ता और आख़िर में आंतरिक अनुशासन तक पहुँचती है — पर यह शृंखला एकतरफ़ा नहीं है। सत्ता फिर उलटी दिशा में भी काम करने लगती है: सत्ता संस्था गढ़ती है, संस्था नियम बनाती है, नियम भूमिका तय करता है, भूमिका पहचान बनाती है, पहचान व्यक्ति के व्यवहार को ढालती है, और वह व्यवहार अगली पीढ़ी का समाज रच देता है। इस तरह समाज ख़ुद को लगातार दोहराता रहता है, और यही कारण है कि कोई बच्चा समाज को पढ़कर नहीं, जीकर सीखता है — उसे बताया जाता है कौन अपना है, कौन पराया, किससे कैसे बोलना है, किससे डरना है, किसका सम्मान करना है, किससे क्या अपेक्षा रखनी है। धीरे-धीरे यह सामाजिक व्याकरण उसके भीतर इतनी गहराई तक उतर जाती है कि आगे चलकर उसे लगने लगता है — “मैं ऐसा ही हूँ।” जबकि उसके इस “ऐसा होने” में उसका अपना जिया हुआ अनुभव जितना है, उतना ही समाज की दी हुई संरचनाओं का इतिहास भी शामिल है।
और यहीं समाज की इंजीनियरिंग का सबसे रहस्यमय नतीजा सामने आता है — समाज अंततः ऐसे मनुष्य गढ़ता है जिन्हें बाहर से संचालित करने की ज़रूरत ख़ुद-ब-ख़ुद घटती जाती है, क्योंकि वे समाज की संरचना को अपने भीतर ही लेकर चलते हैं। यही संस्कृति है, यही संस्कार है, यही सामाजिक स्मृति है, यही आंतरिक अनुशासन है — और यहीं सत्ता अपनी सबसे महीन अवस्था तक पहुँचती है, जब वह बाहर से दिखाई ही नहीं देती, क्योंकि व्यक्ति ख़ुद उसके मुताबिक़ अपने को व्यवस्थित कर रहा होता है।
लेकिन इसी के भीतर मुक्ति की एक संभावना भी दबी है। अगर जागरूकता यह देख सके कि मेरी हर पहचान मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं है, मेरी हर भूमिका जीवन का अंतिम सत्य नहीं है, मेरे भीतर उठने वाली हर अपेक्षा मेरी अपनी मूल इच्छा नहीं है, और समाज की दी हुई हर श्रेणी वास्तविकता की आख़िरी श्रेणी नहीं है — तो सामाजिक संरचना टूटती नहीं, पर उसकी अंतिम सत्ता ज़रूर टूट जाती है। व्यक्ति समाज से बाहर नहीं चला जाता; वह पिता बना रहता है, शिक्षक बना रहता है, नागरिक बना रहता है, अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाता रहता है — फ़र्क़ बस इतना पड़ता है कि अब भूमिका और अस्तित्व एक नहीं रह जाते। कर्तव्य बना रहता है, पर कर्तापन की जकड़न कम हो जाती है। रिश्ता बना रहता है, पर स्वामित्व की पकड़ ढीली पड़ जाती है। संस्था बनी रहती है, पर उसे जीवन का पर्याय मान लेने की भूल घटती जाती है। और यहीं, समाज की इसी इंजीनियरिंग के भीतर से, जीवन की सहजता एक बार फिर झलकने लगती है।
शायद इस पूरे विमर्श का सबसे संक्षिप्त सार यही है — जीवन संबंध पैदा करता है, समाज उन्हें नाम देता है, संस्कृति उन्हें अर्थ देती है, संस्था उन्हें स्थिर करती है, कानून उन्हें वैधता देता है, सत्ता उन्हें लागू करती है, और मनुष्य आख़िरकार उन्हें अपने भीतर उतार लेता है — फिर वही मनुष्य अपनी सामाजिक संरचना को अपना स्वाभाविक अस्तित्व मान बैठता है। यहीं से जीवित संबंध और सामाजिक संबंध के बीच वह दूरी शुरू होती है जिसे शायद जागरूकता का काम मिटाना नहीं, बल्कि पहली बार देख लेना भर है।

