दुनिया ने मनुष्य को
धीरे-धीरे औज़ार में बदल दिया।
पहले उसके हाथ खरीदे गए,
फिर उसका समय,
फिर उसकी नींद,
फिर उसकी आँखें,
और अंत में—
उसके सपनों की दिशा।
अब हर चीज़ से पूछा जाता है—
तुम्हारा उपयोग क्या है?
पेड़ से पूछा जाता है—
लकड़ी कितनी देगा?
नदी से—
बिजली कितनी बनेगी?
मनुष्य से—
उत्पादन कितना करेगा?
और बच्चे से—
भविष्य में क्या बनेगा?
किसी ने यह नहीं पूछा—
तुम्हारे भीतर
कितना आकाश बचा है?
उपयोगिता की सभ्यता
धीरे-धीरे पृथ्वी को कारखाना बना देती है।
जहाँ फूल
सुगंध नहीं,
डेटा बन जाते हैं।
जहाँ प्रेम
भावना नहीं,
मानसिक रसायन कहलाता है।
जहाँ कविता से पूछा जाता है—
उसका practical value क्या है?
और संगीत से—
उससे revenue कितना आएगा?
लेकिन सुनो—
मनुष्य सबसे अधिक मनुष्य
तब होता है
जब वह अनुपयोगी हो जाता है।
जब वह बिना कारण
आकाश देखने लगता है।
जब वह किसी अनजान दुःख पर
रो पड़ता है।
जब वह पेड़ को
लकड़ी नहीं,
एक मौन जीवित प्रार्थना की तरह देखता है।
उपयोगिता से बाहर जाना
दरअसल बाज़ार से बाहर जाना है।
और बाज़ार से बाहर जाना
सबसे खतरनाक स्वतंत्रता है।
क्योंकि तब
तुम्हें खरीदा नहीं जा सकता।
एक आदमी
जो केवल कमाने के लिए जीता है,
वह धीरे-धीरे मशीन में बदल जाता है।
उसकी हँसी भी काम करने लगती है।
उसका प्रेम भी निवेश हो जाता है।
उसकी मित्रता भी नेटवर्किंग बन जाती है।
यहाँ तक कि उसका दुःख भी
सोशल मीडिया की सामग्री बन जाता है।
और एक दिन
वह आईने में देखकर पूछता है—
“मैं आख़िर बचा कहाँ हूँ?”
सभ्यता ने मनुष्य को
इतना उपयोगी बना दिया
कि वह महसूस करना भूल गया।
उसे हर समय productive रहना है।
आराम करते हुए भी
वह guilt महसूस करता है।
चुप बैठे हुए भी
उसे लगता है
कि वह पीछे छूट रहा है।
वह अब नदी किनारे बैठ नहीं सकता
बिना यह सोचे
कि इससे हासिल क्या होगा।
यही आधुनिक दासता है।
लोहे की जंजीरें टूट गईं,
पर उपयोगिता की जंजीरें
आत्मा के भीतर उग आईं।
अब मनुष्य को बाँधने के लिए
कारागार नहीं चाहिए—
बस इतना काफी है
कि उसे लगातार व्यस्त रखो।
इसलिए कविता आवश्यक है।
क्योंकि कविता
मनुष्य को कुछ देर के लिए
अनुपयोगी बना देती है।
और वही क्षण
उसकी आत्मा को बचाते हैं।
एक बच्चा
जब मिट्टी में आकृतियाँ बनाता है,
तो वह किसी अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं दे रहा होता।
फिर भी—
वह उस क्षण
सभ्यता से अधिक जीवित होता है।
एक बूढ़ा आदमी
जब शाम को चुपचाप पक्षियों को उड़ते देखता है,
तो वह किसी प्रतियोगिता में नहीं होता।
फिर भी—
वह उस क्षण
ब्रह्मांड के सबसे निकट होता है।
दुनिया को अधिक मानवीय बनाने के लिए
हमें अधिक कुशल मनुष्य नहीं चाहिए।
हमें ऐसे मनुष्य चाहिए
जो कभी-कभी
बिना कारण रो सकें।
जो किसी अजनबी के दुःख में
अपना चेहरा देख लें।
जो पेड़ों को काटने से पहले
उनकी छाया याद कर लें।
जो लाभ से पहले
करुणा का हिसाब रखें।
क्योंकि उपयोगिता
सभ्यता बना सकती है,
लेकिन करुणा नहीं।
करुणा हमेशा
उन क्षणों में जन्म लेती है
जहाँ मनुष्य
अपने लाभ से बाहर चला जाता है।
और शायद
ईश्वर भी सबसे अधिक
उन्हीं लोगों में बचा रहता है
जो दुनिया की दृष्टि में
थोड़े अनुपयोगी होते हैं।
कवि,
संगीतकार,
पागल,
प्रेमी,
बच्चे,
सन्यासी—
वे लोग
जो अभी तक
आकाश को सिर्फ मौसम नहीं समझते।
एक दिन
यह पृथ्वी मशीनों से भर जाएगी।
सब कुछ तेज़ होगा,
सटीक होगा,
गणनात्मक होगा।
पर उस दिन
यदि किसी बच्चे ने
बारिश को देखकर
अचानक हाथ फैलाकर नाचना बंद कर दिया—
तो समझना
मनुष्य हार गया।
इसलिए
अपने भीतर थोड़ा अनुपयोगी बचाकर रखो।
एक कविता,
एक विस्मय,
एक बेकार-सी धुन,
एक ऐसा सपना
जिसका बाज़ार में कोई मूल्य न हो।
क्योंकि वही अनुपयोगी हिस्सा
तुम्हारी अंतिम मनुष्यता है।

