अर्थ : दो ध्रुवों के बीच का नृत्य

अर्थ

कोई शब्द नहीं है,

कोई ठहराव नहीं—

वह एक कंपन है

जो शून्य की देह पर

पहली बार काँपता है।

वह

जैसे अंधकार के भीतर

धीरे-धीरे खुलती हुई एक लय,

जिसमें कोई संगीत नहीं,

पर सब कुछ उसी से जन्म लेता है।

एक ओर—

पूर्ण बिखराव,

जहाँ हर दिशा अपनी ही ओर भागती है,

जहाँ कोई केंद्र नहीं,

कोई नाम नहीं,

केवल अनगिनत संभावनाओं की धूल।

दूसरी ओर—

एक क्षणिक आकृति,

जहाँ सब कुछ एक जगह सिमट जाता है,

जहाँ शब्द

अपने भीतर एक आकाश समेट लेते हैं।

और अर्थ—

इन दोनों के बीच

एक अदृश्य पगचिह्न है,

जो हर बार मिटते हुए भी

अगला कदम रख देता है।

वह

अराजकता से उठता है—

जैसे तूफ़ान की आँख में

अचानक एक बिंदु स्थिर हो जाए,

और उसी स्थिरता से

नई दिशाएँ जन्म लें।

फिर

वह व्यवस्था में टिकता नहीं—

जैसे कोई रेखा

खिंचते-खिंचते

अपने ही आकार को तोड़ दे,

और फिर से बिखर जाए।

अर्थ

किसी संतुलन का नाम नहीं,

वह असंतुलनों की एक निरंतर श्रृंखला है—

जहाँ हर स्थिरता

अपने भीतर टूटने की तैयारी रखती है।

वह

जैसे किसी अनदेखे नर्तक का कदम,

जो जमीन को छूते ही

उसे बदल देता है—

और अगली ही क्षण

उस जमीन को छोड़ देता है।

कोई उसे पकड़ना चाहता है—

तो वह फैल जाता है,

जैसे धुंध

हाथों के बीच से फिसलती हुई।

कोई उसे छोड़ देता है—

तो वह एक बिंदु बनकर

अचानक चमक उठता है।

अर्थ

न तो अराजक है,

न व्यवस्थित—

वह दोनों का एक साथ

अधूरा होना है।

वह

एक ऐसी साँस है

जो लेते ही टूट जाती है,

और टूटते ही

एक नया श्वास बन जाती है।

उसका हर कदम

एक विघटन है,

और हर विघटन

एक नया संयोजन।

कोई केंद्र नहीं—

पर हर दिशा

अपने भीतर एक केंद्र लिए है।

कोई अंतिम आकृति नहीं—

पर हर आकृति

अंतिम होने का भ्रम रचती है।

अर्थ

वह जगह है

जहाँ ब्रह्मांड

अपनी ही लय में

खुद को रचता है

और उसी क्षण

खुद को भंग भी कर देता है।

और इस पूरे नृत्य में—

न कोई शुरुआत है,

न कोई अंत—

केवल

एक अनकहा आवर्तन है,

जहाँ हर अराजकता

व्यवस्था बन जाती है,

और हर व्यवस्था

फिर से अराजकता में खुल जाती है।

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