जिस दिन महाविद्यालय से शिक्षा चली गई
एक राज्य था, जहाँ शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त थी। कम-से-कम शासन के प्रत्येक आदेश की पहली पंक्ति यही कहती थी।
वहाँ शिक्षा के उत्थान के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ किया जाता था। कभी किसी महान व्यक्तित्व की जयंती मनाई जाती, कभी किसी राष्ट्रीय दिवस पर व्याख्यान आयोजित होता, कभी किसी अभियान का शुभारंभ होता, कभी किसी संकल्प का सामूहिक वाचन होता। कभी विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता विकसित की जाती, कभी उनमें उद्यमिता जगाई जाती, कभी उन्हें सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा जाता और कभी उनके भीतर राष्ट्रनिर्माण की भावना का संचार किया जाता।
शिक्षा के लिए इतना कुछ हो रहा था कि धीरे-धीरे शिक्षा के लिए समय ही नहीं बचा।
यह किसी की चिंता का विषय नहीं था। क्योंकि राज्य में शिक्षा की गतिविधियाँ निरंतर बढ़ रही थीं।
केवल कक्षाएँ घट रही थीं।
1. आदेश का आगमन
सुबह के दस बजे थे। महाविद्यालय के प्राध्यापक ने अभी अपनी कक्षा में प्रवेश ही किया था कि कार्यालय से एक संदेश आया।
आज एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाना था।
कार्यक्रम का उद्देश्य अत्यंत पवित्र था। विषय भी महत्त्वपूर्ण था। आदेश में विद्यार्थियों की सहभागिता अनिवार्य थी। आयोजन की तस्वीरें भेजनी थीं। उपस्थिति का विवरण देना था। प्रतिवेदन निर्धारित समय तक प्रेषित करना था।
प्राध्यापक ने पुस्तक बंद कर दी।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, “आज का व्याख्यान अगली कक्षा में पूरा करेंगे।”
एक छात्रा ने पूछा, “सर, अगली कक्षा कब होगी?”
प्राध्यापक कुछ क्षण मौन रहे।
उन्हें स्वयं नहीं मालूम था कि अगली कक्षा किस कार्यक्रम के बाद, किस आदेश के बीच और किस उपलब्ध समय में संभव हो पाएगी।
उन्होंने केवल इतना कहा, “सूचना मिल जाएगी।”
छात्रा ने अपनी कॉपी बंद कर दी।
उसकी कॉपी में अधूरा नोट था। उसके भविष्य में भी शायद यही सबसे अधिक लिखा जाने वाला शब्द था—अगली बार।
2. प्राध्यापक का नया पदनाम
इस राज्य के महाविद्यालयों में प्राध्यापक एक विचित्र प्रजाति के कर्मचारी बन गए थे।
उनकी नियुक्ति अध्यापन के लिए हुई थी, लेकिन उनकी उपयोगिता का आकलन धीरे-धीरे दूसरे कौशलों से होने लगा।
कौन मंच कितनी जल्दी तैयार करवा सकता है?
किसे अतिथियों के स्वागत का सही क्रम मालूम है?
कौन कुर्सियों की पंक्ति ठीक कर सकता है?
कौन चाय और नाश्ते की व्यवस्था देख सकता है?
कौन विद्यार्थियों का पंजीकरण करवा सकता है?
कौन समय पर बैनर लगवा सकता है?
कौन फोटो खिंचवाकर तत्काल प्रतिवेदन भेज सकता है?
और सबसे महत्त्वपूर्ण—कौन बिना प्रश्न किए अगले आदेश के लिए भी उपलब्ध रह सकता है?
प्राध्यापक अब ज्ञान के संरक्षक कम, आयोजन के सर्वगुणसंपन्न संचालक अधिक थे।
सुबह वे अतिथि के स्वागत में पुष्पगुच्छ थामते, दोपहर में मंच संचालन करते, फिर भोजन व्यवस्था देखते, उसके बाद उपस्थिति पत्रक बनाते और शाम को कार्यक्रम की सफलता का प्रतिवेदन तैयार करते।
रात में कभी-कभी उन्हें याद आता कि वे किसी विषय के विशेषज्ञ भी हैं।
उनके पास वर्षों का अध्ययन था। शोध के प्रश्न थे। अधूरी पांडुलिपियाँ थीं। विद्यार्थियों के लिए तैयार की गई पाठ्य सामग्री थी। पुस्तकालय में कुछ ऐसी किताबें थीं जिनके पन्ने वे महीनों से पलटना चाहते थे।
लेकिन इन सबका कोई तात्कालिक प्रतिवेदन नहीं माँगा गया था।
इसलिए ये काम प्रतीक्षा में पड़े रहे।
व्यवस्था ने विद्वान को अनुपयोगी नहीं बनाया था; उसने उसकी विद्वत्ता के उपयोग का समय छीन लिया था।
3. वह छात्रा जो महाविद्यालय आना भूल गई
महाविद्यालय में एक छात्रा थी। वह पढ़ना चाहती थी।
उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। उसके लिए महाविद्यालय केवल डिग्री प्राप्त करने की जगह नहीं था। वह घर की सीमाओं से बाहर निकलकर अपने लिए एक बौद्धिक संसार बनाना चाहती थी।
वह नियमित आती थी।
लेकिन धीरे-धीरे उसे पता चलने लगा कि आज कक्षा के स्थान पर जागरूकता कार्यक्रम है, कल किसी अभियान का आयोजन है, परसों सांस्कृतिक गतिविधि है और उसके अगले दिन किसी बैठक के कारण कक्षाएँ प्रभावित रहेंगी।
कभी उसे सभागार में बैठाया जाता। कभी उपस्थिति दर्ज कराई जाती। कभी किसी कार्यक्रम में सहभागिता के लिए कहा जाता। कभी वह घंटों ऐसे भाषण सुनती जिनका उसके पाठ्यक्रम, उसकी परीक्षा और उसके वास्तविक प्रश्नों से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
कार्यक्रमों के विषय अच्छे थे। उद्देश्य भी अच्छे थे। लेकिन उसके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था—
यदि मुझे पढ़ाने वाला कोई नहीं है, तो मुझे महाविद्यालय बुलाने का उद्देश्य क्या है?
एक दिन वह नहीं आई।
फिर दूसरे दिन भी नहीं आई।
उसकी अनुपस्थिति पर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। रजिस्टर में एक निशान लगा दिया गया।
कुछ समय बाद उसकी अनुपस्थिति नियमित हो गई।
व्यवस्था ने निष्कर्ष निकाला—विद्यार्थियों में अनुशासन की कमी है। उनकी अध्ययन में रुचि घट रही है। उन्हें प्रेरित करने के लिए और कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
अगले सप्ताह एक प्रेरणा कार्यक्रम आयोजित किया गया।
उस छात्रा को उसकी अनुपस्थिति के कारण उस कार्यक्रम में भी नहीं देखा गया।
उसकी समस्या पर एक और कार्यक्रम बन गया था।
शिक्षा की विडंबना यह थी कि जिस विद्यार्थी को कक्षा चाहिए थी, उसे सहभागिता दी जा रही थी; जिसे शिक्षक चाहिए था, उसे प्रेरक भाषण मिल रहे थे; और जिसे समय चाहिए था, उसे उपस्थिति का प्रमाणपत्र दिया जा रहा था।
4. मंच पर शिक्षा, मंच के पीछे शिक्षक
एक दिन महाविद्यालय में शिक्षा की गुणवत्ता पर अत्यंत भव्य आयोजन हुआ।
मंच पर शिक्षा के भविष्य की चर्चा होनी थी।
प्रवेश द्वार पर स्वागत की व्यवस्था थी। सभागार में कुर्सियाँ सजी थीं। ध्वनि व्यवस्था की जाँच हो चुकी थी। बैनर पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
“गुणवत्तापूर्ण शिक्षा : विकसित समाज की आधारशिला।”
कार्यक्रम शुरू होने से पहले एक प्राध्यापक मंच की सजावट देख रहे थे।
दूसरे प्राध्यापक अतिथियों को उनके स्थान तक पहुँचा रहे थे।
तीसरे पंजीकरण सूची में नाम जाँच रहे थे।
चौथे नाश्ते की व्यवस्था में लगे थे।
पाँचवें को कार्यक्रम के बाद रिपोर्ट भेजनी थी।
मंच पर वक्ता शिक्षा में गुणवत्ता, नवाचार, अनुसंधान और अकादमिक उत्कृष्टता पर बोल रहे थे।
उनके भाषणों में शिक्षक की केंद्रीय भूमिका थी। विद्यार्थियों के समग्र विकास पर बल था। शोध संस्कृति को पुनर्जीवित करने का संकल्प था।
उसी समय सभागार के बाहर एक प्राध्यापक को फोन आया।
उनकी नियमित कक्षा का समय हो चुका था। कुछ विद्यार्थी कक्षा में पहुँचे थे। वे पूछ रहे थे कि आज पढ़ाई होगी या नहीं।
प्राध्यापक ने कार्यक्रम की व्यवस्था देखते हुए उत्तर दिया, “आज संभव नहीं है। अगली बार पढ़ेंगे।”
फोन कट गया।
मंच पर वक्ता कह रहे थे, “शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थी के भीतर प्रश्न करने की क्षमता विकसित करना है।”
प्राध्यापक ने मेज पर रखे पानी के गिलास ठीक किए।
किसी ने उनसे नहीं पूछा कि वे स्वयं अपने शोध के बारे में आखिरी बार कब सोच पाए थे।
किसी ने यह नहीं पूछा कि उनके विद्यार्थियों ने आखिरी बार किसी जटिल विचार पर उनसे कितनी देर चर्चा की थी।
किसी ने यह नहीं पूछा कि पाठ्यक्रम कितनी बार पूरा हुआ, कितनी कक्षाएँ नियमित चलीं और कितने विद्यार्थियों ने किसी पुस्तक को पढ़कर स्वतंत्र निष्कर्ष निकाला।
इन प्रश्नों के लिए कोई अलग प्रपत्र नहीं था।
इसलिए ये प्रश्न कार्यक्रम के प्रतिवेदन में शामिल नहीं हुए।
5. आदेशों का साम्राज्य
उस राज्य में शासन का प्रत्येक आदेश अपने आप में उचित था।
कौन किसी महापुरुष की स्मृति में कार्यक्रम का विरोध करेगा?
कौन सामाजिक जागरूकता के विरुद्ध बोलेगा?
कौन संस्कृति, पर्यावरण, संविधान, स्वच्छता, कौशल, नवाचार या राष्ट्रनिर्माण को अनावश्यक कहेगा?
समस्या किसी एक कार्यक्रम में नहीं थी।
समस्या यह थी कि हर अच्छी बात को आयोजन में बदल दिया गया था और हर आयोजन को महाविद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों के ऊपर रख दिया गया था।
एक कार्यक्रम के लिए एक दिन गया।
दूसरे के लिए आधा दिन।
तीसरे के लिए विद्यार्थियों को एकत्रित करना पड़ा।
चौथे के लिए प्राध्यापकों की बैठक हुई।
पाँचवें के लिए रिपोर्ट बनाई गई।
फिर छठे कार्यक्रम का आदेश आ गया।
किसी ने कभी सभी आदेशों को एक साथ रखकर नहीं देखा कि वे मिलकर कितना समय ले रहे हैं।
प्रत्येक आदेश अपने स्तर पर छोटा था। लेकिन उनके संयुक्त भार ने शिक्षण के समय को धीरे-धीरे निगल लिया था।
यह वैसा ही था जैसे कोई प्रतिदिन घर की दीवार से एक ईंट निकालता रहे और हर बार कहे—एक ईंट से क्या होता है?
एक दिन दीवार गिर जाती है।
महाविद्यालयों में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।
कक्षाएँ किसी एक निर्णय से बंद नहीं हुई थीं। वे असंख्य छोटे-छोटे निर्देशों, आयोजनों, बैठकों, औपचारिकताओं और तात्कालिक प्राथमिकताओं के बीच सिकुड़ती चली गई थीं।
और जब किसी ने पूछा कि पढ़ाई क्यों नहीं हो रही, तो उत्तर मिला—
“शिक्षा के लिए तो इतने कार्यक्रम हो रहे हैं!”
6. पाठ्यक्रम का अंतिम संस्कार
एक विभाग में वर्षों से पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम अधूरा था।
कुछ इकाइयाँ पढ़ाई जा चुकी थीं। कुछ पर चर्चा हुई थी। कुछ केवल नोट्स में थीं। कुछ का नाम विद्यार्थियों ने सुन रखा था।
परीक्षा निकट थी।
विद्यार्थियों ने प्राध्यापक से पूछा, “सर, पाठ्यक्रम कब पूरा होगा?”
प्राध्यापक ने कैलेंडर देखा।
उसमें निर्धारित परीक्षाएँ थीं, शैक्षणिक अवकाश थे, बैठकें थीं, विभिन्न कार्यक्रम थे और प्रशासनिक कार्यों के लिए आरक्षित कई तिथियाँ थीं।
पढ़ाने के लिए जो समय बचा था, वह पाठ्यक्रम की तुलना में छोटा पड़ रहा था।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, “जो शेष है, उसे आप स्वयं पढ़ने का प्रयास करें। मैं आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा दूँगा।”
विद्यार्थियों ने पूछा, “लेकिन सर, यदि हमें स्वयं ही पढ़ना है, तो कक्षा का अर्थ क्या है?”
यह प्रश्न इतना साधारण था कि उसका उत्तर किसी उच्चस्तरीय समिति से नहीं मिल सकता था।
कक्षा का अर्थ केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं था। वहाँ कठिन अवधारणाएँ स्पष्ट होती थीं, प्रश्नों का जन्म होता था, विचारों की जाँच होती थी, पढ़े हुए का अर्थ खुलता था और शिक्षक अपने अनुभव से ज्ञान की उन परतों तक पहुँचाता था जिन्हें पाठ्यपुस्तक अकेले नहीं खोल सकती।
लेकिन इन सबके लिए शिक्षक का उपस्थित होना पर्याप्त नहीं था।
उसे पढ़ाने के लिए समय भी चाहिए था।
और उस राज्य में शिक्षक उपस्थित था—कभी मंच पर, कभी द्वार पर, कभी बैठक में, कभी सूची के सामने, कभी प्रतिवेदन के पीछे।
बस, कक्षा में उसकी उपस्थिति अनिश्चित होती जा रही थी।
धीरे-धीरे पाठ्यक्रम एक जीवित बौद्धिक यात्रा के बजाय परीक्षा से पहले पूरी की जाने वाली औपचारिक सूची बन गया।
शोध परियोजनाएँ फाइलों में चली गईं।
पुस्तकालय मौन हो गया।
सेमिनारों में शोध की चर्चा होती रही, लेकिन शोध करने के लिए अविभाजित समय लगातार दुर्लभ होता गया।
संस्थान के पास शिक्षा के आयोजन की व्यवस्था थी, पर शिक्षा के लिए आवश्यक एकाग्रता की रक्षा करने वाली व्यवस्था नहीं थी।
7. एक दिन शासन ने समीक्षा की
कई वर्षों बाद उच्च शिक्षा की स्थिति की समीक्षा करने के लिए एक बैठक बुलाई गई।
प्रस्तुतीकरण में बताया गया कि कितने कार्यक्रम आयोजित हुए, कितने विद्यार्थियों ने सहभागिता की, कितने संकल्प लिए गए, कितनी गतिविधियों की तस्वीरें उपलब्ध हैं और कितनी संस्थाओं ने समय पर प्रतिवेदन भेजे।
आँकड़े प्रभावशाली थे।
बैठक में संतोष व्यक्त किया गया कि शिक्षा व्यवस्था सक्रिय है।
तभी किसी ने एक असुविधाजनक प्रश्न पूछ लिया—
“इन सबके बीच नियमित कक्षा शिक्षण के लिए कितना समय सुरक्षित रहा?”
कुछ पन्ने पलटे गए।
“पाठ्यक्रम पूरा होने की वास्तविक स्थिति क्या है?”
दूसरे पन्ने खोले गए।
“विद्यार्थियों की कक्षाओं में उपस्थिति और उनकी सीखने की क्षमता के बीच क्या संबंध दिखाई देता है?”
तीसरे पन्ने की तलाश शुरू हुई।
“शोध प्रकाशनों, पुस्तक लेखन और अकादमिक मार्गदर्शन के लिए प्राध्यापकों को कितना समय मिला?”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
यह सन्नाटा असफलता का प्रमाण नहीं था। कम-से-कम आधिकारिक रूप से नहीं। यह केवल उन प्रश्नों का सन्नाटा था जिन्हें पूछने की आदत व्यवस्था ने धीरे-धीरे खो दी थी।
बैठक के अंत में निर्णय लिया गया कि इन सभी विषयों पर एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया जाए।
प्रतिवेदन तैयार करने का दायित्व महाविद्यालयों को दिया गया।
प्राध्यापकों को एक और काम मिल गया।
शायद अगली समीक्षा में इस विषय पर एक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाए।
8. राजा की अंतिम उपलब्धि
शाम को राज्य का सर्वोच्च प्रशासक अपनी उपलब्धियों की सूची देख रहा था।
उसने पूछा, “क्या हमारे महाविद्यालयों में गतिविधियाँ नियमित हो रही हैं?”
उत्तर मिला, “जी, प्रतिदिन।”
“क्या प्राध्यापक सक्रिय हैं?”
उत्तर मिला, “जी, अत्यंत सक्रिय।”
“क्या विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ी है?”
उत्तर मिला, “जी, उन्हें अधिकाधिक कार्यक्रमों से जोड़ा जा रहा है।”
प्रशासक संतुष्ट हुआ।
तभी एक पुरानी फाइल मेज पर रखी गई। उसमें एक छात्रा का आवेदन था। उसने लिखा था—
“मैं महाविद्यालय पढ़ने आती हूँ। मुझे कार्यक्रमों से कोई आपत्ति नहीं है। मैं अपने समाज, संस्कृति और देश के बारे में जानना चाहती हूँ। लेकिन मैं यह भी चाहती हूँ कि मेरी कक्षाएँ नियमित चलें। मेरे अध्यापक मुझे पढ़ाएँ। मैं उनसे प्रश्न पूछ सकूँ। मेरे पास जो समय और अवसर है, वह केवल उपस्थिति दर्ज कराने में समाप्त न हो जाए।”
आवेदन के नीचे एक टिप्पणी थी—
“प्रकरण विचाराधीन है।”
प्रशासक ने पूछा, “इसका निस्तारण क्यों नहीं हुआ?”
उत्तर मिला, “इस विषय पर एक समिति गठित करने का प्रस्ताव है।”
प्रशासक ने फाइल बंद कर दी।
अगले दिन शिक्षा की गुणवत्ता पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित करने का आदेश जारी हुआ।
उपसंहार : महाविद्यालय किसके लिए है?
महाविद्यालय किसी शासन की सक्रियता का प्रदर्शन-स्थल नहीं है। वह किसी प्रशासनिक तंत्र की आयोजन क्षमता का परीक्षण-केंद्र भी नहीं है। वह केवल सांस्कृतिक गतिविधियों का सभागार या सरकारी अभियानों के क्रियान्वयन की इकाई नहीं है।
उसका पहला दायित्व है—ज्ञान का सृजन, ज्ञान का संप्रेषण और विद्यार्थी में स्वतंत्र चिंतन की क्षमता का विकास।
संस्कृति आवश्यक है। सामाजिक चेतना आवश्यक है। नागरिक दायित्वों की समझ आवश्यक है। महाविद्यालयों में सार्थक कार्यक्रम भी होने चाहिए। लेकिन कोई भी गतिविधि अपने मूल उद्देश्य को तभी पूरा करती है, जब वह शिक्षा को समृद्ध करे, उसका स्थान न ले।
समस्या कार्यक्रमों की उपस्थिति नहीं, उनकी निरंकुश प्राथमिकता है।
समस्या प्रशासनिक दायित्व नहीं, उनका ऐसा विस्तार है जो अध्यापन और शोध के मूल समय को निगल जाए।
समस्या प्राध्यापकों की कार्यशीलता नहीं, उस कार्यशीलता का शिक्षण से दूर होते जाना है।
जब एक प्राध्यापक अपने विषय की पुस्तक के बजाय मंच की सजावट में अधिक समय देने लगे, जब उसकी विद्वत्ता का उपयोग विचारों की व्याख्या से अधिक स्वागत-सत्कार में होने लगे, जब उसकी शोध-क्षमता बैठकों और प्रतिवेदनों के बीच दम तोड़ने लगे, तब संकट केवल प्राध्यापक का नहीं होता। संकट उस विद्यार्थी का होता है, जो उसके सामने बैठकर कुछ सीखने की आशा लेकर आया था।
और जब विद्यार्थी आना कम कर दें, तो केवल उनकी अनुपस्थिति पर प्रश्न मत उठाइए। यह भी पूछिए कि क्या संस्थान ने उनकी उपस्थिति को अर्थपूर्ण बनाए रखा है।
शायद विद्यार्थी आलसी नहीं हुए हैं। शायद उन्हें यह अनुभव होने लगा है कि महाविद्यालय में उपस्थित रहने और शिक्षा प्राप्त करने के बीच का संबंध कमजोर पड़ रहा है।
शायद प्राध्यापक अकर्मण्य नहीं हुए हैं। शायद उनके श्रम का बड़ा हिस्सा उन कामों में व्यय हो रहा है जिनके लिए उनकी विद्वत्ता आवश्यक ही नहीं थी।
शायद शिक्षा व्यवस्था निष्क्रिय नहीं है। शायद वह इतनी अधिक गतिविधियों में सक्रिय है कि अपनी सबसे आवश्यक गतिविधि—शिक्षण—के लिए समय नहीं बचा पा रही।
और शायद यही सबसे गंभीर विडंबना है।
एक दिन इतिहास यह नहीं पूछेगा कि महाविद्यालयों में कितने कार्यक्रम हुए थे। वह पूछेगा कि उन वर्षों में कितने विद्यार्थियों ने सचमुच कुछ सीखा था।
वह यह नहीं गिनेगा कि कितने मंच सजे थे। वह देखेगा कि कितने मस्तिष्क स्वतंत्र हुए थे।
वह यह नहीं पूछेगा कि कितने भाषण दिए गए। वह पूछेगा कि कितने प्रश्न पैदा हुए थे।
वह यह नहीं मापेगा कि कितनी तस्वीरें भेजी गईं। वह यह जानना चाहेगा कि कितने प्राध्यापकों को पढ़ने, सोचने, शोध करने और पढ़ाने का अविभाजित समय मिला था।
क्योंकि शिक्षा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि कोई संस्था कितनी बार दिखाई दी।
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसके कारण किसी विद्यार्थी की दृष्टि कितनी दूर तक पहुँची।
और जिस दिन महाविद्यालय में सब कुछ होने लगे—सिवाय पढ़ाई के—उस दिन समझ लेना चाहिए कि संस्थान बंद नहीं हुआ है।
उससे केवल शिक्षा चली गई है।

