मुहाने तक आ गया

मुहाने तक

बचते-बचाते जीवन मुहाने तक आ गया, कितने तूफ़ानों को टालकर, कितने भँवरों से निकलकर, कितनी बार टूटते-टूटते स्वयं को सँभालकर, समय की नदी में बहता हुआ यहाँ तक आ गया।

रास्ते में बहुत कुछ छूटा— कुछ अपने, कुछ सपने, कुछ अनकहे शब्द, कुछ अधूरे अपनेपन के क्षण, कुछ इच्छाएँ जिन्हें उम्र की चौखट पर चुपचाप छोड़ देना पड़ा।

कितनी बार लगा कि अब आगे कोई रास्ता नहीं, कि साँसों की गठरी में अब और कुछ बचा नहीं; लेकिन भीतर कहीं एक जिद्दी-सी लौ जलती रही, अँधेरों से आँख मिलाती रही, और मैं चलता रहा।

कभी समय से बचा, कभी परिस्थितियों से, कभी दूसरों की अपेक्षाओं से, कभी अपने ही भीतर बैठे उस आदमी से जो हर बार मुझसे पूछता था— आखिर इस दौड़ का अंतिम अर्थ क्या है?

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है— जीवन को बचाते-बचाते कहीं जीवन ही तो नहीं छूट गया? जिन खुशियों को कल के लिए टालता रहा, क्या वे कल कभी आएँगी? जिन क्षणों को भविष्य के नाम गिरवी रखा, क्या वर्तमान उन्हें लौटाएगा?

और अब— बचते-बचाते जीवन मुहाने तक आ गया।

सामने एक अनंत जलराशि है, पीछे बहती हुई पूरी नदी, और बीच में खड़ा मैं— नदी का भी, समुद्र का भी नहीं, बस एक क्षण का यात्री।

यह मुहाना अंत है या आरंभ, कौन जाने!

नदी यहाँ आकर अपना नाम खो देती है, पर अपना जल नहीं; अपनी धारा छोड़ देती है, पर अपनी यात्रा नहीं।

शायद जीवन का अर्थ भी यही है— बचे रहना नहीं, बहते रहना; हर चोट से बच जाना नहीं, चोटों के बावजूद अपने भीतर कुछ बचाए रखना।

अब न कोई शिकायत कि रास्ते कठिन थे, न कोई हिसाब कि कितने अपने छूट गए।

बस एक छोटी-सी इच्छा है— जब यह नदी समुद्र में उतरे, तो उसके जल में थोड़ी-सी करुणा बची हो, थोड़ी-सी मनुष्यता, कुछ अधूरे सपनों की चमक और इतना विश्वास कि जीवन व्यर्थ नहीं गया।

बचते-बचाते जीवन मुहाने तक आ गया— अब सोचता हूँ, जिस मृत्यु से उम्र भर बचता रहा, शायद उसी के भय ने मुझे जीवन से इतनी दूर रखा।

और अब पहली बार मैं बिना किसी भय के जल को जल में मिलते देखना चाहता हूँ— बिना कुछ बचाए, बिना कुछ छिपाए, बिना कहीं पहुँचे की जल्दी में।

बस बहना चाहता हूँ— उस अंतिम विस्तार तक, जहाँ नदी समाप्त नहीं होती, केवल यह भ्रम टूटता है कि वह कभी समुद्र से अलग थी।

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