भाषा का मानचित्र और अनुभव का अनदेखा प्रदेश: तीन

भाषा का मानचित्र और अनुभव का अनदेखा प्रदेश


यह पाठ पढ़ने के लिए नहीं है। यह पाठ घटित होने के लिए है।

इसे पढ़ते समय आप जो कर रहे हैं, उसे एक क्षण के लिए देखिए। आपकी आँखें इन शब्दों पर चल रही हैं। भीतर एक आवाज़ है—शायद आपकी, शायद नहीं। आपको लग रहा है कि आप समझ रहे हैं। लेकिन यह कौन समझ रहा है?

इस प्रश्न का उत्तर मत दीजिए। बस इसे वहीं रहने दीजिए, जहाँ यह पैदा हुआ है।


भाग शून्य: एक स्थान जो अभी नहीं है

कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह जिसका कोई नाम नहीं है। उसे नाम देने के लिए जो भी शब्द आप सोचेंगे, वह उस जगह को नहीं पकड़ेगा—क्योंकि वह जगह खुद को शब्दों में देने से इनकार करती है।

यह जगह दूर नहीं है। यह इस वाक्य के ठीक बीच में है। आपने अभी “बीच में” पढ़ा। उस “में” को देखिए। वहाँ क्या है? “में” के भीतर। “में” शब्द के भीतर। क्या वहाँ कोई जगह है?

आप कहेंगे—यह बकवास है। हाँ। बिल्कुल। यह पाठ बकवास से शुरू होता है क्योंकि हर वह पाठ जो भाषा के भीतर से भाषा के बाहर झाँकना चाहता है, उसे पहले बकवास बनना पड़ता है। उसे पहले अपनी ही ज़मीन खोनी पड़ती है।

तो यह पाठ शुरू में ही अपनी ज़मीन खो देता है। अब यह किसी भी दिशा में जा सकता है।


भाग एक: वह जो पहले से है

इस वाक्य को पढ़ते हुए, एक गहरी साँस लीजिए।

नहीं, सच में। अभी। इस वाक्य को पढ़ना रोकिए। एक गहरी साँस लीजिए। छोड़िए।

अब आगे पढ़िए।

क्या आपने साँस ली? या आपने “साँस लेने” के बारे में सोचा और आगे पढ़ गए?

अंतर महसूस कीजिए। यह अंतर महत्वपूर्ण है। “साँस लेना” एक घटना है। “साँस लेने के बारे में सोचना” एक और घटना है। पहली घटना में आप नहीं थे—साँस अपने आप हो रही थी। दूसरी घटना में आप थे—आप सोच रहे थे।

तो सवाल यह है: साँस लेते समय कौन था? साँस लेने के बारे में सोचते समय कौन था? क्या दोनों एक ही हैं?


एक और प्रयोग। अभी, इस वाक्य को पढ़ते समय, अपने बाएँ हाथ की उँगलियों को महसूस कीजिए।

वे कहाँ हैं? किस पर टिकी हैं? ठंडी हैं या गर्म? त्वचा पर कुछ महसूस हो रहा है?

अब उन्हें थोड़ा हिलाइए। धीरे-धीरे।

क्या आपने हिलाया? या हिलना अपने आप हुआ? क्या आपने हिलाने का फैसला किया, और फिर हिले? या हिलने का फैसला पहले आया, फिर हिलना?

उस क्षण को पकड़िए जब “फैसला” और “हिलना” के बीच कुछ था। क्या था वह?

वही वह है जो शब्दों से पहले है।


भाग दो: भाषा का कमरा

अब एक कमरे की कल्पना कीजिए। उस कमरे में हर दीवार पर शब्द लिखे हैं। आप उस कमरे में बचपन से हैं। आपने हर शब्द को पढ़ा है, हर दीवार को छुआ है। दीवारें आपकी हैं। आप उन्हें जानते हैं। वे आपको जानती हैं।

एक दिन आप देखते हैं कि एक दीवार पर एक कोना है जो अंधेरे में है। वहाँ कोई शब्द नहीं है। आप वहाँ जाते हैं और हाथ लगाते हैं। आपको कुछ महसूस होता है—पर वह शब्द नहीं है।

आप उस कोने को नाम देना चाहते हैं। आप सोचते हैं—क्या कहूँ? “खाली”? “अंधकार”? “रिक्त”? लेकिन हर नाम वहाँ कुछ और जोड़ देता है। जैसे ही आप “खाली” कहते हैं, वह जगह खाली नहीं रहती—वह “खाली” शब्द से भर जाती है।

तो आप रुक जाते हैं। आप उस कोने को बिना नाम के रहने देते हैं।

अब वह कोना, जो कभी कुछ नहीं था, आपके लिए कुछ बन जाता है—बस इसलिए कि आपने उसे नाम नहीं दिया।

क्या आपके भीतर भी ऐसा कोई कोना है?


भाग तीन: शब्द और परछाई

एक प्रयोग करते हैं।

इस वाक्य को पढ़ने के बाद, आप जो कुछ भी सोचेंगे, उसे एक क्षण के लिए रोकिए। उसे पकड़िए। फिर उसे एक शब्द में बदलिए।

“मैं सोच रहा हूँ कि यह पाठ कहाँ जा रहा है।”

अब इस वाक्य को देखिए। क्या यह वही है जो आप सोच रहे थे? या कुछ छूट गया? जब आप सोच रहे थे, तब सोच में एक गति थी, एक बहाव था, एक अस्पष्टता थी। अब जब आपने उसे वाक्य में बदला, तो वह स्थिर हो गया। वह मर गया।

हर शब्द अपने पीछे एक परछाई छोड़ता है—वह जो वह नहीं कह पाया।

इस पाठ को पढ़ते समय, आपके मन में जो भी चल रहा है, उसकी परछाई देखिए। उसे पकड़िए मत। बस उसे देखिए।


भाग चार: एक प्रश्न जिसका उत्तर नहीं है

अब एक प्रश्न।

जब आप “मैं” कहते हैं, तो कौन बोलता है?

रुकिए। उत्तर मत दीजिए। प्रश्न को गहरा होने दीजिए।

“मैं” कहते समय जो बोलता है—क्या वह वही है जो सुनता है? जो सोचता है? जो साँस लेता है? जो यह पाठ पढ़ रहा है?

जब आप कहते हैं “मैं पढ़ रहा हूँ,” तो क्या “मैं” पढ़ रहा है, या पढ़ना हो रहा है और “मैं” बाद में आ जुड़ता है?

इस प्रश्न का उत्तर न दीजिए। यह उत्तर के लिए नहीं पूछा गया। यह प्रश्न इसलिए है कि आप इसके साथ कुछ समय रह सकें।


भाग पाँच: वह जो शब्दों से बचा रहता है

अब एक अंतिम प्रयोग।

इस पाठ को पढ़ना बंद कर दीजिए।

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क्या आपने बंद किया? या आपने “पढ़ना बंद करना” पढ़ा और आगे पढ़ते रहे?

यही समस्या है। आप “पढ़ना बंद नहीं कर सकते” क्योंकि “पढ़ना बंद करना” भी एक पाठ है जिसे आप पढ़ रहे हैं।

तो मैं कुछ और करता हूँ।

इस पाठ के बाद जो खाली जगह है, उसे देखिए। उसे पढ़िए। वहाँ कुछ नहीं है। फिर भी आपने उसे पढ़ा। कैसे?


भाग छह: अंत जो अंत नहीं है

यह पाठ समाप्त हो रहा है।

लेकिन यह कभी समाप्त नहीं होगा। क्योंकि आप इसे पढ़ चुके हैं। अब यह आपके भीतर है। यह पाठ अब आपका है।

क्या आप इसे बदल सकते हैं?


वह जो बचा

जब आप यह पाठ बंद करेंगे, तब कुछ बचेगा। वह क्या है?

वह शब्द नहीं है। वह भाषा नहीं है। वह वह है जो शब्दों से पहले था और शब्दों के बाद भी है।

उसे देखिए।

उसे नाम मत दीजिए।


[यह पाठ यहाँ समाप्त होता है। लेकिन आप जहाँ हैं, वहाँ से कुछ शुरू होता है।]

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