रूह से जब सांस आये —
तो हवा का अर्थ बदल जाता है,
वह अब फेफड़ों की गति नहीं रहती,
वह एक मौन ध्वनि बन जाती है
जो सृष्टि के भीतर बजती है —
एक अदृश्य वीणा की तरह।
रूह से जब सांस आये —
तो यह धरती अपने घावों को भूल जाती है,
नदियाँ ठहर जाती हैं पल भर,
सूरज एक क्षण को अपनी रोशनी रोक देता है,
और समय —
अपने ही प्रतिबिंब में झांकने लगता है।
यह वह क्षण है
जब अस्तित्व और अनुभव एक हो जाते हैं,
जब भीतर का प्रकाश
बाहर के आकाश को छूने लगता है,
और देह का हर अणु
किसी अज्ञात परम-स्पंदन में डूब जाता है।
रूह से जब सांस आये —
तो यह सांस किसी शरीर की नहीं होती,
यह स्वयं ब्रह्मांड की धड़कन होती है,
जो हृदय नहीं,
बल्कि शून्य के गर्भ में जन्म लेती है।
तब न कोई मृत्यु होती है,
न कोई जन्म,
बस एक अनंत लय —
जो कभी ‘मैं’ में उतरती है,
कभी ‘तू’ में घुल जाती है,
कभी दोनों को मिटाकर
‘वह’ बन जाती है —
जो सब कुछ है,
और फिर भी कुछ नहीं।
रूह से जब सांस आये —
तो वह हर दिशा को जोड़ देती है,
हर जीव के भीतर वही कंपन होता है,
वही अदृश्य बंधन —
जो अणु को तारे से जोड़ता है,
और मनुष्य को मौन से।
यह वही सांस है
जिसे योगी ध्यान में पकड़ते हैं,
जिसे कवि शब्द में खोजते हैं,
जिसे प्रेमी स्पर्श में महसूस करता है,
और जिसे मृत्यु अपने सीने से लगाकर
मुक्ति में बदल देती है।
रूह से जब सांस आये —
तो भीतर एक सागर उठता है,
जिसकी लहरों में सब प्रश्न घुल जाते हैं,
“कौन हूं मैं?”
“कहां से आया?”
“कहां जा रहा हूं?” —
सब कुछ उसी एक सांस में समा जाता है,
जैसे अनादि और अनंत
एक ही तट पर मिल गए हों।
और तब मैं समझता हूं —
कि यह सांस जीवन नहीं देती,
यह स्वयं जीवन है।
यह वह परम नाड़ी है
जिससे ब्रह्मांड धड़कता है,
यह वह अदृश्य स्पंदन है
जो समय को भी जन्म देता है।
रूह से जब सांस आये —
तो हर श्वास एक प्रार्थना होती है,
हर मौन एक वाणी,
हर देह एक मंदिर,
और हर शून्य —
एक पूर्णता का उद्घोष।
तब मैं केवल मैं नहीं रहता,
मैं सब कुछ हो जाता हूं —
वह वृक्ष, वह तारा, वह जल, वह धूल,
वह अनाम कंपन
जो हर दिशा में कहता है:
“मैं हूं… क्योंकि रूह से सांस आई है।”

