अनुभवों के बीहड़ में एक यात्री
वह चला। उसके पास कोई मानचित्र नहीं था, केवल एक अदृश्य बेचैनी थी जो उसे आगे धकेल रही थी। उसका रास्ता उसके सामने स्वयं बनता जाता था, और पीछे मिटता जाता था। वह एक ऐसे बीहड़ में था जो उसके अपने अनुभवों का था—उभरी हुई यादों की चट्टानें, डर की गहरी खाइयाँ, और अचानक मिल जाने वाले आनंद के हरे-भरे ओएसिस।
शुरुआत उसने एक घाटी से की, जहाँ ‘विश्वास’ के पेड़ लगे थे। उनकी जड़ें मजबूत थीं, पत्ते हरे थे। लोग उनकी छाया में आराम करते थे। पर यात्री ने देखा, उन पेड़ों के पत्तों पर लिखे थे ऐसे शब्द जिनका कोई अर्थ नहीं था। वे सुन्दर थे, सुगन्धित थे, पर खोखले। उसने एक पत्ता तोड़ा—वह उसकी उंगलियों में ही मुरझा कर राख हो गया। उसने समझा, यह घाटी एक भ्रम है। और उसने चलना जारी रखा।
फिर वह एक मैदान में पहुँचा, जहाँ ‘डर’ की ठंडी हवा बहती थी। वह हवा उसके शरीर में समा जाती, उसकी हड्डियों को जमा देती। उसके चारों ओर छायाएँ डोलतीं, उसे रोकने की कोशिश करतीं। “तुम अकेले हो,” वे कहतीं, “तुम कमजोर हो। लौट जाओ।” यात्री ने अपना कोट कसकर पहना और आगे बढ़ा। उसने देखा, जैसे ही वह एक कदम आगे बढ़ाता, छायाएँ एक कदम पीछे हट जातीं। डर सच था, पर वह उतना शक्तिशाली नहीं था, जितना दिखता था।
एक दिन, वह ‘इच्छा’ की एक नदी के किनारे खड़ा हो गया। पानी साफ था, और नीचे सुनहरी मछलियाँ तैर रही थीं—सफलता, प्यार, सम्मान। वह उन्हें पाना चाहता था। उसने हाथ डाला, पर पानी उसकी उंगलियों के बीच से फिसल गया। जितना वह उन्हें पकड़ने की कोशिश करता, मछलियाँ उतनी ही दूर चली जातीं। वह थक गया। तब उसने देखा, नदी का पानी उसे प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त था। उसने पिया। और उसकी इच्छा, मछलियों को पकड़ने की, नहीं रही। बस प्यास बुझाने की रह गई।
अब उसका सामना ‘महत्वाकांक्षा’ के पहाड़ से हुआ। शिखर बादलों में छिपा था। सभी कहते, उसे चढ़ना ही होगा। सफलता वहीं है। उसने चढ़ाई शुरू की। रास्ता कठिन था। कई बार वह फिसला, उसके हाथ-पैर छिले। पर वह चढ़ता गया। जब वह ऊपर पहुँचा, तो वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ ठंडी हवा थी और एक विस्तृत, खाली आकाश। उसने नीचे देखा—छोटे-छोटे घर, नदियाँ, लोग। उसे एहसास हुआ, असली सुन्दरता तो नीचे थी। चढ़ाई का आनंद था, शिखर पर पहुँचना नहीं। उसने महसूस किया, महत्वाकांक्षा एक सीढ़ी है, मंजिल नहीं। मंजिल तो रास्ता है।
अंत में, वह एक विशाल, शांत मरुस्थल में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। यहाँ न कोई पेड़ था, न नदी, न पहाड़। बस रेत थी और आकाश। यहाँ उसके सभी प्रतीक—विश्वास, डर, इच्छा, महत्वाकांक्षा—सब विलीन हो गए थे। वह खाली था। पर इस खालीपन में वह पूर्ण था।
उसने देखा, सूरज अस्त हो रहा था। आकाश लाल हो रहा था। रेत पर सुनहरी रोशनी बिखर गई। उसके भीतर कोई शब्द नहीं उठा, कोई विचार नहीं आया। कोई इच्छा नहीं हुई कि यह क्षण स्थिर हो जाए। वह बस था। और वह क्षण था।
उसे एहसास हुआ, यही तो यात्रा का अंत है—जब यात्री और यात्रा एक हो जाएँ। जब कोई मंजिल न रहे, सिर्फ चलना रहे। जब कोई प्रतीक न रहे, सिर्फ अनुभव रहे।
वह मरुस्थल के बीचोबीच बैठ गया। रात हो गई। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसने अपना सिर रेत पर टिका दिया। उसे लगा, वह कोई यात्री नहीं, बल्कि स्वयं रेत का एक कण है, रात की शीतलता का एक अंश है, तारों की चमक की एक झिलमिलाहट है।
और इस तरह, अनुभवों के बीहड़ से गुजरता हुआ यात्री, अपने भीतर ही विलीन हो गया।

