The Shared Sleep
(A long, deep, and unsettling poem)
साझा नींद
(एक लंबी, गहरी और बेचैन करने वाली कविता)

सोए हुए लोग चल रहे हैं—
टचस्क्रीन पर उँगलियाँ रेंग रही हैं,
चेहरे चमक रहे हैं पर आँखें बुझी हैं।
वे कहते हैं— “हम जागे हुए हैं!”
पर उनकी चेतना किसी ऐप की अधिसूचना में सोई है।

यह युग—
एक विशाल बिस्तर है,
जहाँ अरबों मनुष्य एक ही तकिये पर सिर रखे हैं—
तकनीक और पूँजी के दो पंखों पर।
एक पंख कहता है “सुविधा”,
दूसरा फुसफुसाता है “विकास”,
और दोनों मिलकर नींद को नया नाम देते हैं—
प्रगति।

हम सब नींद में निर्माण कर रहे हैं—
नींद में ही ख़रीद रहे हैं,
नींद में ही प्रेम कर रहे हैं,
नींद में ही क्रांति के नारे पोस्ट कर रहे हैं।
यह नींद इतनी साझा है कि
अब कोई भी अकेले नहीं सोता—
हर स्वप्न में कंपनी का लोगो चमकता है।

कभी देवता स्वप्न में आते थे,
अब विज्ञापन आते हैं।
कभी आत्मा बोलती थी,
अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स जवाब देता है।
हम प्रश्न पूछना भूल गए हैं,
क्योंकि उत्तर पहले से तय हैं।
हम “क्यों” नहीं बोलते—
हम “ओके” बोलते हैं।

यह साझा नींद—
मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे गहरी पराजय है।
हमने खुद को इतना जगाया कि
अंततः सो गए।
हमारी जागरूकता अब डाटा है,
हमारी भावनाएँ सर्वर में संग्रहित हैं।
हर क्लिक एक नई जंजीर है,
हर स्क्रॉल एक नया सम्मोहन।

कितनी सहजता से हमने स्वीकार कर लिया
कि नींद ही जीवन है,
कि आराम ही अर्थ है,
कि चुप रहना ही सभ्यता है।
अब शब्द नहीं चीखते—
वे मार्केटिंग के नारे बन गए हैं।
अब विरोध नहीं होता—
वह ट्रेंड बन जाता है।

कभी मनुष्य ने सपनों को जगाया था,
अब सपनों ने मनुष्य को सुला दिया है।
यह नींद—
इतनी गहरी है कि
देवता भी इस पर आश्चर्य करते होंगे:
“क्या यही वह प्राणी है जिसने ब्रह्मांड को नापा था?”

हमारी चेतना
अब बिजली के बिल से बँधी है,
हमारा आत्मबोध
नेटवर्क कवरेज से मापा जाता है।
और हम फिर भी गर्व करते हैं—
“देखो, हम कितने जुड़ गए हैं!”
हाँ, हम जुड़े हैं—
पर केवल उस नींद के नेटवर्क में
जहाँ सबकी आँखें बंद हैं,
और सबको लगता है कि वे एक-दूसरे को देख रहे हैं।

कभी-कभी कोई आवाज़ उठती है—
किसी बच्चे की, किसी कवि की, किसी पागल की—
जो कहता है,
“अरे, यह नींद नहीं—यह विस्मरण है!”
पर तुरंत भीड़ कहती है,
“चुप रहो, हमें सोने दो,
कल काम पर जाना है।”
और वह आवाज़
रात के किसी सर्वर में म्यूट कर दी जाती है।

जागना अब अपराध है।
क्योंकि जागरण से अर्थव्यवस्था बिगड़ती है,
जागरण से भय उठता है,
जागरण से सवाल पैदा होते हैं।
और सवाल— इस नींद के सबसे बड़े शत्रु हैं।

पर एक दिन—
यह नींद टूटेगी।
शायद किसी असहज सन्नाटे से,
किसी भूखे बच्चे की पुकार से,
किसी नदी के सूखने से,
किसी स्क्रीन के अंधेरे हो जाने से।
जब यह सामूहिक स्वप्न भंग होगा,
तो धरती पर एक नई चीत्कार उठेगी—
“हम कहाँ थे इतने वर्षों तक?”

और तब शायद
मनुष्य फिर से मनुष्य होगा,
उसकी आँखें फिर से धूप में खुलेंगी,
और वह कहेगा—
“मैं सोया नहीं था, बस खो गया था।”
फिर वह अपनी मुट्ठी बाँधेगा,
अपने ही भीतर की नींद पर वार करेगा,
और पहली बार सचमुच जागेगा।

वह जागरण—
न किसी तकनीक से होगा,
न किसी विचारधारा से।
वह आएगा उस अनसुनी धड़कन से
जो अब भी किसी कोने में कहती है—
“मैं अभी भी जीवित हूँ।”

और जब वह धड़कन
हर हृदय में एक साथ गूँजेगी,
तब यह साझा नींद
फट पड़ेगी—
जैसे ब्रह्मांड के आरंभ में
अंधकार फटा था।
उस क्षण—
मनुष्य फिर से
अपना अर्थ खोजेगा।

और शायद,
फिर कोई कवि लिखेगा—
“नींद से जागना ही नहीं,
नींद को पहचानना भी क्रांति है।”

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