दृश्य एक : एथेंस की अदालत (Plato’s Apology का अंश)
(अदालत में कोलाहल है। सुकरात कटघरे में खड़े हैं। अभियुक्त हैं, पर चेहरा शांत। सभागृह में जूरी बैठी है। लोग कानाफूसी कर रहे हैं।)
सुकरात (धीरे-धीरे, गहरी आवाज़ में):
एथेंस के नागरिकों!
तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें तंग करता हूँ,
तुम्हारी नींद हराम करता हूँ।
हाँ, यह सच है।
पर सुनो—
मैं यह सब अपनी इच्छा से नहीं करता।
देवताओं ने मुझे
तुम्हारे नगर के लिए नियुक्त किया है।
(भीड़ हलचल करती है। कुछ हँसते हैं, कुछ ताना कसते हैं।)
सुकरात (और ऊँची आवाज़ में):
तुम्हारा नगर महान है,
शक्तिशाली है,
पर यह नगर उसी विशाल घोड़े की तरह है
जो अपनी ताक़त से
सुस्त और आलसी हो गया है।
और मैं?
मैं हूँ एक छोटा-सा गोजर—
हाँ, एक डंक मारने वाला कीड़ा!
मेरा काम है
तुम्हें लगातार काटते रहना,
जगाते रहना,
ताकि तुम सो न जाओ।
(कुछ जूरी सदस्य असहज होकर हिलते हैं।)
सुकरात (धीरे पर पैना):
दिन-रात,
चौराहों पर,
सभा में,
कभी सवाल पूछकर,
कभी समझाकर,
कभी उलाहना देकर
मैं तुम्हें जगाता हूँ।
हाँ, यह चुभता है।
हाँ, यह असुविधाजनक है।
पर सोचो—
यदि तुम मुझे मार दोगे,
तो तुम्हें दूसरा गोजर नहीं मिलेगा।
फिर तुम्हारा नगर
गहरी नींद में चला जाएगा,
जहाँ से जागना कठिन होगा।
(सुकरात ठहरते हैं। सन्नाटा छा जाता है।)
सुकरात (शांत मुस्कान के साथ):
तो, एथेंस के लोगों,
मैं कहता हूँ—
मेरे सवाल डंक हैं,
पर वे डंक नहीं,
तुम्हारे जीवन की दवा हैं।
मुझे बचा लो या मिटा दो,
पर जान लो—
मैं जागरण का प्रतीक हूँ,
और यही मेरा धर्म है।
(भीड़ चुप है। कुछ चेहरे गुस्से से लाल,
कुछ सोच में डूबे,
और कुछ पहली बार
खुद से प्रश्न पूछते हुए।)
नाट्य दृश्य दो : मृत्यु-दंड और सुकरात की अंतिम वाणी
[एथेंस की अदालत – जूरी ने अभी-अभी निर्णय दिया है। भीड़ में हलचल है। कुछ लोग संतोष से, कुछ लोग अपराध-बोध से, कुछ लोग मौन में बैठे हैं।]
जूरी के अध्यक्ष:
सुकरात, बहुमत से यह निर्णय हुआ है कि तुम्हें मृत्युदंड दिया जाए।
[मौन – सभी निगाहें सुकरात पर टिक जाती हैं।]
सुकरात (शांत, बिना किसी भय के):
अथेनियन नागरिको!
तुम सोचते हो कि मृत्यु सबसे बड़ा डर है।
मैं कहता हूँ—अन्याय करना, आत्मा को कलुषित करना—यही सबसे बड़ा डर है।
मृत्यु केवल एक परिवर्तन है,
शायद आत्मा का किसी और लोक की ओर प्रस्थान।
पर अन्याय आत्मा की मृत्यु है,
जो जीवित रहते हुए भी मनुष्य को मृत कर देता है।
भीड़ में कुछ लोग आपस में फुसफुसाते हैं।
सुकरात (अपनी आवाज़ को दृढ़ बनाते हुए):
तुमने मुझे मृत्यु का दंड दिया है।
पर मैं तुम्हें एक सच्ची भविष्यवाणी देता हूँ—
मेरी मृत्यु के बाद और भी गडफ़्लाई जन्म लेंगे।
सवालों की डंक-भरी आवाज़ें हर गली और चौक में गूंजेंगी।
तुम सोचते हो कि मुझे चुप कराकर सत्य को दबा दोगे।
नहीं! सत्य को न तलवार मार सकती है,
न ज़हर बुझा सकती है।
[भीड़ में खामोशी छा जाती है।]
सुकरात (अंतिम भावुक स्वर में):
मृत्यु से मत डरो, नागरिको।
उस जीवन से डरो,
जिसमें विवेक न हो, सत्य न हो, न्याय न हो।
“एक अनपरखी जिंदगी जीने लायक नहीं है।”
और मैं उस अनपरखी जिंदगी को अस्वीकार करता हूँ।
[सुकरात धीरे-धीरे मंच से बाहर ले जाए जाते हैं। भीड़ का शोर धीमा होता जाता है,
मानो पूरे नगर में एक भारी प्रश्न तैर गया हो।]
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नाट्य दृश्य तीन : सुकरात का अंतिम क्षण
[एक अंधियारी जेल कोठरी। सुकरात अपने शिष्यों—क्रिटो, फेडो, एपोलोडोरस, और अन्य के बीच बैठे हैं। वातावरण गहन शोकपूर्ण है, पर सुकरात के चेहरे पर अद्भुत शांति है।]
क्रिटो (कंपित स्वर में):
गुरुवर! हम आपके लिए दंड को टाल सकते हैं।
भागने के उपाय अभी भी हैं।
क्या न्याय वही है जो बहुमत तय कर दे?
क्या आपको मरना ही होगा?
सुकरात (मुस्कराकर):
क्रिटो, न्याय से भागकर जीना,
अन्याय को स्वीकार कर जीने से कहीं अधिक भयानक है।
मृत्यु कोई शत्रु नहीं—
यह तो आत्मा का उस बंधन से मुक्त होना है,
जिसे हम शरीर कहते हैं।
[शिष्य अश्रुपूर्ण हैं।]
फेडो (आवाज़ टूटते हुए):
गुरुवर, हमें बताइए—
आत्मा मृत्यु के बाद कहाँ जाएगी?
क्या वह नष्ट हो जाती है?
सुकरात (गंभीर स्वर में):
नहीं फेडो!
आत्मा अमर है।
शरीर तो मिट्टी में लौट जाएगा,
पर आत्मा ज्ञान, सत्य और न्याय की खोज में आगे बढ़ेगी।
जिसने सद्गुण और विवेक से जीवन जिया,
उसकी आत्मा उच्चतर लोकों में जाएगी।
और जिसने अज्ञान और अन्याय में जीवन बिताया,
वह नीचे के अंधकारमय लोकों में भटकेगी।
[कारागार का प्रहरी आता है, हाथ में ज़हर का प्याला लिए। कमरे में सन्नाटा छा जाता है।]
प्रहरी (धीमे स्वर में):
सुकरात, समय आ गया है।
कृपया यह प्याला पी लीजिए।
[प्रहरी आँखें झुका लेता है, आँसू रोकते हुए।]
सुकरात (शांत स्वर में प्याला उठाकर):
तो चलो मित्रो,
अब हम मृत्यु की ओर प्रस्थान करें।
तुम जीवन की ओर, मैं मृत्यु की ओर—
पर ईश्वर ही जानता है, कौन बेहतर मार्ग की ओर जा रहा है।
[सुकरात हेमलॉक पी जाते हैं। शिष्य रो उठते हैं। सुकरात लेट जाते हैं और कहते हैं—]
सुकरात (धीरे से):
क्रिटो, एस्क्लेपियस को हम एक मुर्गा उधार हैं।
उसे चुका देना।
क्योंकि मृत्यु—
जीवन की बीमारी से मुक्ति है।
[धीरे-धीरे उनका शरीर शिथिल हो जाता है। शिष्य विलाप करते हैं।
मंच पर मौन छा जाता है। केवल एक गहरी गूंज रह जाती है—]
“सत्य की खोज मरकर भी जीवित रहती है।”

