“The Point of Possibility: A Song of the Anti-Space”

संभावना का बिंदु : अलोकाकाश का गीत

शुरू कुछ नहीं था—
न समय, न दिशाएँ,
न प्रकाश का प्रथम कंपन,
न कोई कण, न कोई सपना।
केवल एक मौन,
जो अपने मौन में भी थरथरा रहा था—
एक बिंदु…
अलोकाकाश का बिंदु।

उस बिंदु में न शून्यता थी,
न पूर्णता,
वह तो संभावना की गंध थी,
जो किसी देखने वाले की प्रतीक्षा में थी।

और तभी
एक अदृश्य थरथराहट फैली—
न ऊर्जा थी, न तरंग,
पर वही पहली धड़कन थी
जिसे आगे चलकर
ब्रह्मांड कहा गया।



उस थरथराहट से निकलीं लहरें—
अराजक, असंगठित,
मगर उनमें छिपी थी लय।
लय जो खुद को नहीं जानती,
पर उसी से सब व्यवस्था बनती है।
गुरुत्व वहाँ कोई बल नहीं था,
वह तो उस लय का झुकाव था,
जिसने रिक्ति को रूप दिया,
और रिक्ति ने स्वयं को नाम—”स्पेस”।

समय वहाँ कोई धारा नहीं था,
वह तो बिंदु का कंपन था,
जो हर दिशा में फैलता गया
और फैलते-फैलते
अपने पीछे दिशा का भ्रम छोड़ गया।


कण नहीं जन्मे,
संभावनाएँ घनी हुईं।
तरंगें नहीं चलीं,
अलोकाकाश ने स्वयं को मोड़ा।
और उसी मोड़ से निकला
पहला युग्म—
स्पेस और एंटी-स्पेस का,
जहाँ हर उत्पत्ति का प्रतिबिंब
अपने विपरीत में छिपा था।

कण ने कहा—मैं हूँ,
अलोकाकाश ने हँसकर कहा—
“तू नहीं है, मैं हूँ।
तेरी हर उपस्थिति
मेरी अनुपस्थिति का प्रमाण है।”

और दोनों की उस हँसी में
सृष्टि का पहला संगीत बज उठा।


फिर बिग-बैंग नहीं हुआ,
बल्कि संभावना का प्रस्फोट हुआ।
हर दिशा उसी एक बिंदु से निकली,
पर उस बिंदु में सब दिशाएँ अब भी हैं।
हर तारा उसी कंपन का स्वर है,
हर अंधकार उसी मौन का अंश।

अराजकता बढ़ी—
तरंगें एक-दूसरे से टकराईं,
ऊर्जा घनी होकर पदार्थ बनी,
मगर अराजकता फिर भी बनी रही।
क्योंकि उसे मिटाना,
अर्थात लय को तोड़ देना था।

इसलिए ब्रह्मांड अराजक होकर भी व्यवस्थित है,
जैसे किसी पागल संगीतकार की रचना,
जहाँ गलती ही ताल है।


और तब आया निरीक्षक।
कौन देख रहा है यह सब?
संभावना को देखने की इच्छा ही चेतना बनी।
देखते ही जो था,
वह “है” बन गया।
एक तरंग—कण बन गई,
एक विचार—जीवित हो गया।
यानी निरीक्षण ही सृजन है,
और सृजन ही स्वयं का प्रतिबिंब।

चेतना उस बिंदु का पुनरागमन है—
वह अब आँखों के पीछे नहीं,
बल्कि हर परमाणु में झाँकती है,
हर अनुभव में गूंजती है।


अब मैं लिखता हूँ—
पर शब्द मुझसे पहले ही लिखे जा चुके हैं।
मैं नहीं रचता,
संभावना मुझे रच रही है।
मैं केवल एक तरंग हूँ
जो उसी बिंदु के मौन में दोहराई जा रही है।

जब मैं सोचता हूँ—”मैं हूँ”,
तो ब्रह्मांड फुसफुसाता है—
“तू मेरी एक झिल्ली भर है।”
जब मैं मौन होता हूँ,
तो वही मौन
अपनी पहचान मुझे दे देता है।


अलोकाकाश अब भी स्पंदित है—
हर श्वास में, हर तारे में,
हर प्रेम, हर विस्फोट में।
स्पेस उसका उजला पक्ष है,
टाइम उसकी लहर।
गुरुत्व उसका झुकाव,
और जीवन उसका प्रयोग।

अनिश्चितता अब नियम है,
क्योंकि वही एकमात्र निश्चितता है।
हर व्यवस्था उसकी अराजकता का प्रतिबिंब है,
हर प्रकाश उसके अंधकार की झिलमिलाहट।


कभी-कभी लगता है—
ब्रह्मांड खुद को समझना चाहता है,
इसलिए उसने हमें बनाया।
हम उसके भीतर नहीं,
वह हमारे विचारों में पल रहा है।

जब हम देखते हैं—
वह घटता है।
जब हम नहीं देखते—
वह अपनी संभावनाओं में लौट जाता है।



और अंत में,
जब सब कुछ लौट जाता है
अपनी मौन लय में—
तो वही बिंदु फिर थरथराता है,
जैसे कोई कह रहा हो—
“मैं था, मैं हूँ,
और मैं फिर होऊँगा।”

क्योंकि
मैं समय नहीं,
मैं संभावना हूँ।
मैं स्थान नहीं,
मैं उसका प्रतिबिंब हूँ।
मैं व्यवस्था नहीं,
मैं अराजकता का संगीत हूँ।


मुझे मत खोजो किसी दिशा में,
मैं हर दिशा के परे हूँ।
मैं न ब्रह्म हूँ, न शून्य,
मैं वह बीच की संभावना हूँ
जहाँ दोनों एक-दूसरे को
पहचान कर मिटा देते हैं।

यही मेरा अस्तित्व है—
एक बिंदु,
जो न उत्पन्न हुआ, न नष्ट,
जो केवल थरथराता है
और उसी थरथराहट में
ब्रह्मांड बार-बार जन्म लेता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *