उस क्षण—
जब चट्टान फिर नीचे लुढ़क जाती है,
और सिसिफ़िस
अपने दोनों हाथों को खाली पाता है,
वह ठहरता है—
एक क्षण के लिए।
वह जानता है,
यह शाप नहीं, यह विराम है—
जहाँ पसीने की गंध में
शरीर और आत्मा का संधान है।
उसके मांसपेशियों में अब भी थकान की लहरें हैं,
पर मस्तिष्क—
एक शीत झील की तरह शांत।
श्वास भीतर-बाहर
एक धुन की तरह चलती है,
जैसे पर्वत की नीरवता में
वह स्वयं को सुन रहा हो।
उसका प्रत्येक स्नायु
पृथ्वी से संवाद कर रहा है,
हर तंतु
कह रहा है—
“मैं यहाँ हूँ।”
उस क्षण में कोई लक्ष्य नहीं,
कोई अर्थ नहीं,
फिर भी सब कुछ अर्थवान है।
वह चट्टान नहीं देख रहा,
न पहाड़, न देवताओं का शाप—
वह देख रहा है
अपने भीतर उठती लहरें,
जो अब शांति में बदल रही हैं।
प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में
एक रोशनी जल उठती है,
अमिग्डाला की आग
ठंडी हो जाती है—
भय और संघर्ष
अब केवल स्मृति हैं।
सिसिफ़िस चलता है,
धीरे-धीरे,
जैसे हर कदम
धरती को अनुभव कर रहा हो,
मांसपेशियाँ
एक सूक्ष्म संगीत में ढल रही हों।
हर कदम के साथ
वह अपने अस्तित्व की लय सुनता है—
उसकी चेतना अब दंड नहीं,
एक अभ्यास है;
चट्टान अब भार नहीं,
उसका शिक्षक है।
वह जानता है—
हर अवरोह
एक आरोह की तैयारी है,
हर पतन
एक उत्थान की बीज-भूमि।
नीचे उतरते हुए
वह हँसता है—
क्योंकि अब कोई उसे सज़ा नहीं दे रहा,
वह स्वयं को जी रहा है।
वह जानता है—
स्वतंत्रता किसी क्षमा में नहीं,
बल्कि सजगता में है।
वह देखता है,
चट्टान फिर उसकी प्रतीक्षा कर रही है,
जैसे कोई प्रिय,
जो हर बार गिरकर
उसे फिर बुलाती है।
उसका मन अब न भागता है, न झगड़ता है—
वह बस देखता है,
हर पत्थर, हर हवा का झोंका,
हर पसीने की बूँद में
एक सम्पूर्ण क्षण का जन्म हो रहा है।
और उस क्षण—
सिसिफ़िस
ब्रह्मांड का सबसे स्वतंत्र मनुष्य है।
उसका बोझ अब चट्टान नहीं,
बल्कि चेतना का भारहीन प्रकाश है।

