हम सबने अपने चेहरे गिरवी रख दिए हैं—
बाज़ार की चमक में,
सभ्यता की शिष्टता में,
और विनम्र मुस्कानों की प्लास्टिक में।
अब कोई चेहरा नहीं बचा
जिस पर धूप वैसी ही पड़े
जैसी सृष्टि के पहले दिन पड़ी थी।
हर दिशा में एक मेला लगा है—
मुखौटों का,
जहाँ लोग अपने असली चेहरे को
“अनुचित” कहकर
कूड़े में फेंक देते हैं।
यहाँ हर हँसी प्रशिक्षित है,
हर आँसू नियोजित,
हर आलिंगन में कोई डील छिपी है।
हम बिजूका बन गए हैं—
हवा से डरते हैं,
पर हवा ही हमारे होने का प्रमाण थी।
हम मुस्कराते हैं— ताकि कोई शक न करे
कि भीतर सब मर चुका है।
हम बोलते हैं— ताकि मौन की सच्चाई
बाहर न आ जाए।
कभी चेहरा होना
एक ईश्वरत्व था।
अब चेहरा होना
असभ्यता है।
यहाँ सब “इमेज” में रहते हैं—
चेहरों की जगह प्रोफ़ाइल्स हैं,
आवाज़ों की जगह कैप्शन,
और आत्मा की जगह फ़िल्टर।
मुखौटे अब स्थायी हो गए हैं—
इतने कि जब कोई बच्चा
पहली बार रोता है,
हम कहते हैं—
“शांत रहो, सभ्य बनो।”
और उसके पहले रोने में जो
स्वतंत्रता थी,
वह वहीं मर जाती है।
अब चेहरे के बिना कोई पहचान नहीं,
और चेहरा असली हो
तो कोई पहचानता नहीं।
हम सब एक ही मेकअप में ढले हैं—
नकली नैतिकता,
सुव्यवस्थित पाखंड,
और “सामाजिक” सद्भावना का शहद।
कभी कोई पागल आता है—
सबके बीच अपना मुखौटा उतारता है।
लोग हँसते हैं—
“देखो, यह असभ्य है!”
पर वही पागल
पहली बार हवा में साँस लेता है।
मैंने भी आज कोशिश की—
एक मुखौटा उतारने की।
पर नीचे दूसरा था,
फिर तीसरा,
फिर सैकड़ों और।
हर परत के नीचे
एक और झूठ सिसकता मिला।
और अंत में—
जब मैं थककर बैठा,
तो भीतर से एक हल्की आवाज़ आई—
“मुखौटे नहीं उतारते,
बस सच को भीतर से पुकारो।
वह आएगा—
और सब मुखौटे स्वयं गल जाएँगे।”
तब जाना—
असली चेहरा कोई दिखाता नहीं,
वह भीतर से प्रकट होता है
जब सारी नक़ली सभ्यताएँ
टूटकर धूल हो जाती हैं।
और वही क्षण—
मनुष्य का पुनर्जन्म है।

