१. मुखौटे का त्याग
एक दिन मैंने अपने मुखौटे उतारे,
जिनसे लोग मुझे पहचानते थे—
सच बोलने से पहले झूठ के लहज़े में मुस्कराता था मैं।
फिर जब हवा ने उन्हें उड़ा दिया,
तो लोगों ने कहा— “देखो, वह पागल है!”
पर मुझे पहली बार अपने चेहरे का ताप मिला,
और सूर्य ने मुझे “स्वतंत्र” कहा।
२. मेरा मित्र
मित्र जो था, वह मेरे भीतर ही छिपा था,
उसकी आँखों में मैं स्वयं का प्रतिबिंब देखता,
पर जब मैंने उससे प्रेम किया,
वह दूर चला गया—
क्योंकि सच्चा मित्र वही होता है
जो हमें अकेले रहना सिखा दे।
३. दो साधु
दो संन्यासी— एक प्रार्थना में, एक शंका में—
एक ने ईश्वर की स्तुति की, दूसरे ने ईश्वर से युद्ध किया।
और जब आकाश से मौन बरसा,
दोनों एक ही धूल में विलीन हो गए।
मैंने समझा— भक्ति और विद्रोह
एक ही जड़ से फूटते हैं—
सत्य की प्यास।
४. लोमड़ी और मुखौटे
मैंने एक लोमड़ी देखी
जो अपने पुराने पंजों के निशान पर चलती थी—
वह सोचती थी कि वह आगे बढ़ रही है।
मैंने अपने विचारों को देखा,
वे भी वैसी ही थीं—
मेरे ही पुराने शब्दों के पदचिह्नों पर घूमती।
तब मैंने मौन होना सीखा—
क्योंकि मौन ही नये मार्गों का पहला कदम है।
५. बुद्धिमान कुत्ता
एक कुत्ता था— सड़कों पर घूमता,
जो मनुष्यों के देवताओं पर भौंकता था।
वह कहता— “मेरे लिए तो ईश्वर वही है
जो भूख में भी मुझसे खेलता है।”
तब मैंने जाना— श्रद्धा का अर्थ भय नहीं,
साझा खेल है।
६. शुभ और अशुभ देवता
एक दिन दो देवता मिले—
एक ने कहा, “मैं भला हूँ,” दूसरा बोला, “मैं बुरा।”
फिर वे दोनों मुस्कराए—
क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य
दोनों की पूजा एक ही वेदी पर करता है।
मैंने भीतर झाँका—
वहाँ भला और बुरा एक ही दीपक की दो लौ थीं।
७. दो ज्ञानी पुरुष
एक ने कहा— “मैंने सत्य पाया है।”
दूसरे ने कहा— “मैंने झूठ का रहस्य जाना।”
और जब दोनों मरे,
लोगों ने उनकी समाधियों पर एक ही वाक्य लिखा—
“यहाँ वे सोते हैं, जो जागृत थे।”
८. निद्राचारी (Sleep-walkers)
मैंने देखा— लोग सोते-सोते चलते हैं,
बोलते हैं, मुस्कराते हैं,
पर भीतर कोई नहीं होता।
फिर मैंने स्वयं को देखा—
मैं भी उनके बीच चलता था—
नींद और जागृति के बीच का एक भ्रम।
तब मैंने कहा—
“शायद यही जीवन है— स्वप्न को देखती नींद।”
९. सात स्वरूप (Seven Selves)
मेरे भीतर सात स्वयं हैं—
एक जो रोता है, एक जो हँसता है,
एक जो चुप रहता है,
एक जो सबको धोखा देता है,
एक जो ईश्वर से प्रेम करता है,
एक जो उसे नकारता है,
और एक जो बाकी सब को देखता है—
मूक साक्षी बनकर।
वह साक्षी ही मेरा सत्य है।
१०. समाधि खोदने वाला (The Grave-Digger)
एक दिन मैंने एक कब्र खोदी—
वहाँ अपने सपनों को दफ़नाया,
अपने भय, अपनी प्रेमिकाएँ, अपने प्रश्न।
फिर उस मिट्टी से एक फूल निकला—
जो मेरे पागलपन की सुगंध था।
लोगों ने कहा— “यह मृत्यु का फूल है।”
पर मैंने जाना—
यह तो जागरण का पुष्प है।
अंतिम गान : पागल का आशीर्वाद
अब जब मैं चलता हूँ,
तो मेरे पाँव धरती को नहीं छूते—
क्योंकि मैंने अपने भीतर की ज़ंजीरों को खोला है।
मैं हँसता हूँ— क्योंकि जानता हूँ,
संसार मुझे कभी समझ नहीं पाएगा।
और यही मेरी मुक्ति है—
समझ से परे होना ही सच्चा ज्ञान है।

