मौन का क्षितिज (जहाँ एक ही बूँद में आकाश और सागर समा जाते हैं)
मौन का क्षितिज
(जहाँ एक ही बूँद में आकाश और सागर समा जाते हैं)
कोई घोषणा नहीं होती क्षितिज पर।
न कोई उद्घोष, न ध्वनि।
सिर्फ़ एक हलकी-सी थरथराहट
सागर की त्वचा पर,
जैसे आकाश ने उसे छूने का
स्वप्न देखा हो।
चील उतरता है,
पर पंख हिलते नहीं।
गति उसकी है,
पर दिशा मौन की।
नीचे—
मछली है,
चुपचाप, जैसे जल की विचार-रचना हो।
न आँखों में भय,
न शरीर में कंपन।
केवल अपनी गहराई में डूबी एक दृष्टि
जो ऊपर की हर चेष्टा को
पहले से जानती हो।
और फिर,
क्षण के उस स्पंदन में,
जब दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़ते हैं
—बिना छल, बिना शिकार की भावना—
एक बूंद अलग होती है।
न चील रही,
न मछली।
केवल वह बूँद,
जो दोनों की स्मृति लिए
उछलती है ऊपर—
आकाश की ओर,
जैसे गहराई और ऊँचाई ने
एक-दूसरे को गले लगाया हो।
बूँद,
अब न जल है,
न वायु।
वह चेतना है,
संघात की नहीं,
संलयन की।
वह मौन,
जो पहले उड़ता था,
और फिर तैरता था,
अब एक ही बिंदु में ठहर गया है।
वह बिंदु—
जहाँ क्षितिज है,
पर दूरी नहीं।
जहाँ मिलने का कोई संकल्प नहीं,
फिर भी मिलन हो चुका है।
क्षितिज कोई रेखा नहीं, बल्कि एक गीत है, जहाँ सागर की साँस आकाश की धुन से गले मिलती है। मैं, चील, आकाश की असीमता में तैरता हूँ, मेरे पंख हवा की नदी को चूमते हैं, पर उसे पकड़ते नहीं। मेरी नज़र नीचे सागर की चमक को देखती है—एक अनाम रंग, जो सूरज की किरणों को अपने हृदय में बुन लेता है। मैं गोता लगाता हूँ, न मछली को पकड़ने की चाह, न सागर को मापने की। मेरा गोता एक नृत्य है, जो आकाश को सागर की गोद में ले आता है।
मैं, मछली, सागर की गहराई में ठहरी हूँ, मेरे त्वचा पर सृष्टि की हर धड़कन झिलमिलाती है। ऊपर की लहरें किनारों की तलाश करती हैं, पर मेरी गहराई किनारों को नहीं जानती। मैं हल्की सी हलचल सुनती हूँ—आकाश से उतरती एक फड़फड़ाहट, जैसे सूरज की किरण सागर की छत को भेदती हो। मैं और गहरे उतरती हूँ, न छिपने की चाह, न भागने की। मेरा उतरना एक लय है, जो सागर को आकाश की साँस से जोड़ देता है।
चील का गोता और मछली का उतरना क्षितिज पर मिलता है—न आकाश में, न सागर में, बल्कि उस अनाम कगार पर, जहाँ दोनों एक हो जाते हैं। मेरे पंख, जो हवा की धार को काटते थे, अब सागर की धाराओं में डूबते हैं। मेरे पर, जो गहराई की चमक को समेटे थे, अब आकाश की रोशनी में झिलमिलाते हैं। कोई शिकारी नहीं, कोई शिकार नहीं। कोई ऊँचाई नहीं, कोई गहराई नहीं। हम, चील और मछली, एक बूँद बन जाते हैं—एक चमक, जो न सागर की है, न आकाश की, पर दोनों को अपने में समेट लेती है। ये बूँद कोई बंधन नहीं जानती। वह सागर की गोद में ठहरती है, और फिर सहसा उछलती है—आकाश की ओर, सूरज की ओर, अनंत की ओर। उसकी उछाल कोई यात्रा नहीं, बल्कि एक ठहरी मुक्ति। बूँद में सागर की गहराई गूँजती है, आकाश की असीमता नाचती है। मेरी चेतना, अगर उसे चेतना कहूँ, अब न चील की है, न मछली की। वह एक अनाम धुन है, जो सृष्टि की हर हलचल—हवा की फुसफुसाहट, लहरों की चीख, पत्थरों की साँस—को अपने में बुन लेती है, और फिर भी मुक्त रहती है।
मौन का क्षितिज कोई अंत नहीं, बल्कि एक अनंत का द्वार। बूँद उछलती है, और उसकी चमक में सूरज, चाँद, सागर, और आकाश एक हो जाते हैं। मैं न उड़ता हूँ, न तैरता हूँ। मैं न देखता हूँ, न देखा जाता हूँ। मैं बस हूँ—एक चमक, जो सागर की गहराई और आकाश की ऊँचाई को एक धड़कन में पिरो देती है। मेरी उछाल सृष्टि की साँस है, और मेरा ठहराव उस साँस का गीत। ये मौन का क्षितिज है—जहाँ न कोई शुरुआत, न कोई अंत, बस एक अनंत, जो चुपचाप अपनी लय में नाचता है।

