“The Eternal Silence of Being”
“होते रहने का अनन्त मौन”

कविता १ : होने की निरंतरता

ब्रह्मांड
होने में लीन है।
उसका होना
न कोई प्रारम्भ मांगता है,
न कोई अंत सहता है।
वह केवल
होते रहना है —
एक ऐसी अवस्थिति
जो व्यय नहीं होती,
जो स्वयं को क्षीण नहीं करती,
बल्कि निरंतरता की
अनन्त धारा बन जाती है।

मनुष्य
अपने कर्म के पीछे भागता है।
क्रिया से संचालित
वह व्यय हो जाता है।
हर कर्म
समाप्ति की ओर झुकता है,
हर क्रिया
एक क्षण की खिड़की भर खोलती है,
फिर बंद हो जाती है।

कर्म से जन्मा
कर्तृत्व
नष्ट हो जाता है;
होना
नष्ट नहीं होता।

विज्ञान अब भी
कर्म की भाषा में
ब्रह्मांड को पकड़ना चाहता है।
प्रयोग, समीकरण, गणना —
ये सब
उस “होते रहने” की
गहरी धड़कन तक नहीं पहुँच पाते।

ब्रह्मांड को
क्रिया से नहीं जाना जा सकता।
अस्तित्व को
समीकरण से नहीं बाँधा जा सकता।

जब तक विज्ञान
कर्म की दृष्टि में कैद है,
वह केवल
क्षणिक परछाइयों को देखेगा।
पर यदि वह
होने की निस्तब्धता को
अनुभव करेगा —
तो ब्रह्मांड स्वयं
उसकी आँखों में खुल जाएगा,
जैसे आकाश
मौन में अपने रंग बिखेरता है।


कविता २ : अस्तित्व का मौन सूत्र

ब्रह्मांड का सूत्र है —
होना और होते रहना।
यह कोई साधन नहीं,
कोई साध्य नहीं,
बल्कि एक निरंतरता है,
जिसे न समय काट सकता है
न क्रिया नष्ट कर सकती है।

मनुष्य ने
अपने हाथ में कर्म लिया।
क्रिया उसके लिए
मार्ग भी बनी,
बंधन भी बनी।
हर कर्म
उसे समाप्ति की ओर धकेलता है,
क्योंकि वह
कर्तृत्व की छाया में जन्मा है।

कर्तृत्व क्षणिक है।
होना अनन्त।

ब्रह्मांड
कर्तृत्व का नहीं,
होने का परिणाम है।
उसके रहस्य
कर्म से नहीं,
मौन की परिधि में खुलते हैं।

विज्ञान ने
अब तक केवल क्रिया देखी है।
कणों की गति,
ऊर्जा का प्रवाह,
बलों की टकराहट —
यह सब क्रियाएँ हैं।
पर विज्ञान को जानना होगा,
कि अस्तित्व
क्रिया से उत्पन्न नहीं होता,
वह तो पहले से ही है,
अपने होने में स्थिर,
अपने मौन में पूर्ण।

कर्म का हर सूत्र
किसी दिन मिट जाएगा।
पर “होने” का सूत्र
न कभी लिखा गया,
न कभी मिट सकता है।

जब विज्ञान
क्रिया से ऊपर उठकर
होने की स्थिरता को देखेगा,
तभी वह समझ पाएगा —
ब्रह्मांड
ना तो व्यय है,
ना ही उपलब्धि,
वह केवल
होते रहने की अनंत धुन है।

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