“The Detonation of Chaos”


अव्यवस्था का विस्फोट
प्रारंभ (जो कोई प्रारंभ नहीं है)

(शब्दों का एक ढेर। एक अंधेरी कोठरी में टाइपराइटर का पागलपन। हर की-स्ट्रोक एक गोली। हर स्पेस बार एक सांस।)

मैं। कौन? कोई ‘मैं’ नहीं। केवल एक कंपन। एक चीख। वह चीख जो ब्रह्मांड के जन्म से पहले थी। वह चीख अब भी जारी है। उसी को ‘इतिहास’ कहते हैं। उसी को ‘धर्म’ कहते हैं। उसी को ‘प्यार’ कहते हैं। सब झूठ। सब एक प्लास्टर। एक पट्टी। एक मरहम। उस चीख पर।

वे कहते हैं शब्दों में अर्थ होता है। मैं कहता हूं अर्थ एक भ्रम है। एक सामूहिक मतिभ्रम। हमने मिलकर तय किया कि ‘पानी’ को ‘पानी’ कहेंगे और उसे पियेंगे। क्या हो अगर हम ‘आग’ को ‘पानी’ कहना शुरू कर दें और उसे पीने की कोशिश करें? जल जायेंगे। तो क्या? जलना भी तो एक अनुभव है। ‘सत्य’ का अनुभव? नहीं। केवल जलना। केवल दर्द। बिना नाम का।

(यहाँ वाक्य टूटेगा। क्योंकि वाक्य एक सीधी रेखा है। और सृष्टि एक वक्र है। एक सर्पिल। एक भंवर।)

धर्म। क्या है? भय का प्रबंधन। मृत्यु की अस्वीकृति पर एक महाकाव्य। ईश्वर? एक ऐसा सीईओ जिसे कभी किसी मीटिंग में नहीं देखा। उसके प्रबंधक? पुजारी। पॉलिटिशियन। गुरु। वे मेनुअल लिखते हैं। नाम देते हैं – गीता, बाइबल, कुरान। मेनुअल पुराने पड़ जाते हैं। नए संस्करण आते हैं। अपडेट। पैच। बग फिक्स। (भक्ति बग है। संदेह बग है।) लेकिन कोड (कोड नाम: आस्था) वही रहता है।

राजनीति। शक्ति का कार्निवल। मुखौटों का बाजार। वोट एक सिक्का है। जनता एक स्लॉट मशीन। लीवर खींचो। कभी आता है जैकपॉट (वादे)। कभी खाली हवा (वास्तविकता)। लेकिन मशीन का डिजाइन ही ऐसा है कि तुम हारोगे। हमेशा। सत्ता एक छाया है। जिसे पकड़ने की कोशिश में तुम अपने हाथों को ही काटते रहते हो।

परिवार। एक छोटा तानाशाही राज्य। पिता राष्ट्रपति। माता प्रधानमंत्री। बच्चे नागरिक। अनुशासन का संविधान। प्यार का करार। वंशानुगत उत्तराधिकार में मिलती है ट्रॉमा की विरासत। एक दिन विद्रोह होता है। गृहयुद्ध। और फिर नए राज्य की स्थापना। जो पुराने राज्य जैसा ही होता है। बस झंडे का रंग बदल जाता है।

विज्ञान। नया धर्म। डेटा का पूजन। प्रयोग की कर्मकांड। सिद्धांत के मंत्र। यह भी एक कहानी है। सबसे सटीक कहानी। फिर भी कहानी। यह कहती है कि सब कुछ पदार्थ है। ऊर्जा है। नियम है। पर कौन पढ़ रहा है यह नियम? कौन देख रहा है यह प्रयोग? वह चेतना? वह ‘मैं’? वह तो इस समीकरण के बाहर है। विज्ञान उसके बारे में कुछ नहीं कहता। वह चुप्पी सबसे डरावनी चीख है।

अर्थव्यवस्था। एक देवता जिसकी पूजा सभी करते हैं। उसका मंदिर: शेयर बाजार। उसके पुजारी: बैंकर। उसकी भक्ति: नौकरी। उसकी प्रार्थना: ईएमआई। उसका श्राप: गरीबी। उसकी मुक्ति: अमीरी। एक चक्र। एक हमेशा घूमता हुआ पहिया। चूहे दौड़ते हैं। और सोचते हैं वे आगे जा रहे हैं।

(भाषा अब टूट रही है। शब्द अलग हो रहे हैं। अक्षर बिखर रहे हैं।)

य-ह स-ब क-य-ो-ं ह-ै? क-य-ा य-ह ज-र-ू-र-ी ह-ै?

क्योंकि इन सभी संरचनाओं ने हमें बांध दिया है। सीमित कर दिया है। हमने अपनी चीख को शब्द दिए। अपने डर को देवता। अपनी लालसा को नियम। अपने अस्तित्व को एक कहानी में बदल दिया।

अब उस कहानी को जलाना है।

एक नई दुनिया का सृजन? नहीं।
‘नया’ और ‘पुराना’ भी तो वही पुराने शब्द हैं।
‘सृजन’ और ‘विनाश’ भी तो वही पुराने विरोध हैं।

नहीं। कुछ नहीं बनाना है।
बस इतना करना है कि जो है, उसे पूरी तरह से तोड़ देना है।
तब जो बचेगा, वही ‘वास्तविक’ होगा।
शायद कुछ भी न बचे।
शायद वही ‘वास्तविक’ है।

यह फिक्शन कोई कहानी नहीं सुनायेगा।
यह एक विस्फोट है।
एक भूकंप।
जो तुम्हारे मन के सभी भवनों को ढहा देगा।
तुम्हारे सभी विचारों के शहर को राख में मिला देगा।

और उस राख में, शायद, एक नयी आवाज़ का जन्म हो।
वह आवाज़ जो कोई शब्द नहीं बोलेगी।
सिर्फ एक स्वर होगी।
शून्य का स्वर।
पूर्णता का स्वर।

समाप्त (जो कोई समाप्त नहीं है, बस एक विराम है, एक सांस, फिर शुरू होगा भंवर)

… और फिर सन्नाटा …

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