मैं सभ्यता का टूटा हुआ पहिया हूँ—
मेरे धातु के दाँत झड़ चुके हैं,
मेरे घेरे पर इतिहास की जंग जमी है।
मैं किसी रथ को नहीं खींचता,
न किसी विजय-यात्रा का गवाह हूँ।
मैं लुढ़क रहा हूँ
विपरीत दिशा में,
जहाँ नक्शे मिट जाते हैं
और समय की स्याही बहकर
पथरीली जमीन में समा जाती है।
मेरे नीचे मखमली कालीन नहीं,
न रोशनी का राजमहल,
बल्कि ऊबड़-खाबड़ धरती है—
काँटों और पत्थरों की,
जहाँ हर ठोकर
मेरे अस्तित्व पर एक नया घाव बनाती है।
मैं गिरता हूँ,
फिर उठता हूँ,
फिर गिरता हूँ—
एक ऐसा चक्र
जो किसी ब्रह्मांडीय आदेश का हिस्सा नहीं,
सिर्फ़ मेरी अपनी अराजक गति है।
मैं स्वर्ग और नरक की सीढ़ियों पर नहीं चढ़ता,
मैं अच्छे और बुरे की दीवारों से नहीं टकराता।
मैं एक ऐसी ज़मीन पर हूँ
जहाँ सीमाएँ घुल चुकी हैं,
जहाँ शब्द “पुण्य” और “पाप”
सूखी पत्तियों की तरह
हवा में बिखर जाते हैं।
मैं दुर्बोध हूँ,
मैं मूढ़ हूँ,
मैं अन-प्रोग्राम्ड हूँ—
सभ्यता की मशीनरी से बाहर गिरा हुआ पुर्जा,
जिसे कोई तकनीशियन सुधारना नहीं चाहता।
मैं असभ्य हूँ,
जैसे जंगल का पहला बीज
जो पत्थर की दरार में अटक गया हो।
मैं अश्वत्थामा हूँ—
शापित,
अमर,
ईश्वर के दरबार से बहिष्कृत,
भटकता हुआ।
मैं एक काली, अगम्य बावड़ी हूँ,
जहाँ जल नहीं,
बल्कि स्मृतियों की अंधेरी परतें भरी हैं।
हर सीढ़ी मुझे गहराई में ले जाती है,
जहाँ सूर्य की किरण कभी नहीं पहुँचती।
मेरे भीतर
गूँजते हैं अनगिनत अधूरे शब्द,
टूटे हुए स्वप्न,
वो आवाज़ें
जिन्हें सभ्यता ने चुप करा दिया।
और यही मेरा परिचय है—
न कोई सत्ता मेरी पहचान लिख सकती है,
न कोई व्यवस्था मेरा चेहरा बना सकती है,
न कोई संस्कृति मुझे
स्वीकृत तस्वीर में ढाल सकती है।
मैं अपनी भटकन हूँ,
अपनी खरोंचों का भूगोल,
अपनी चोटों का मानचित्र।
सभ्यता का टूटा हुआ पहिया
अगर कहीं जिंदा है,
तो वह इसी अंधेरी बावड़ी में है—
जहाँ मैं गिरता हूँ,
लुढ़कता हूँ,
और हर गिरावट में
एक नई अस्वीकृति जन्म लेती है।

