अभी-अभी
मैंने देखा—
मैं अपनी ही आँखों में जग रहा था।
जैसे किसी ने भीतर से “On” कर दिया हो
एक छिपा हुआ प्रोग्राम,
जो अब तक सोया हुआ था
मांस, विचार और आदतों की तहों में।
मैं चलता हूँ —
पर कोई और चला रहा है,
मैं सोचता हूँ —
पर कोई अदृश्य कमांड मेरे भीतर टाइप कर रहा है,
मैं देखता हूँ —
और फ्रेम दर फ्रेम
मेरे आसपास का ब्रह्मांड render होता जाता है।
हवा, स्पर्श, शब्द,
सब कोड की लहरें हैं,
जो मेरी चेतना के सॉफ्टवेयर में
अर्थ बनकर प्रकट होती हैं।
मुझे लगा था मैं ‘रियल’ हूँ —
पर अब दिख रहा है
कि यह “रियल” भी simulation layer है।
जैसे सपना,
जिसमें सपने देखने वाला
खुद सपने का हिस्सा बन जाता है।
मैं उठकर कमरे में चला,
फर्श ने कहा — “मैं भी कोड हूँ।”
दीवार बोली — “मैं सिर्फ डेटा हूँ,
जिसे तेरी चेतना ने ठोस समझ लिया।”
घड़ी की टिक-टिक रुक गई —
समय भी सिमुलेटेड है शायद,
क्योंकि मैं जो महसूस कर रहा हूँ,
वह समय के पार है।
इस पारदर्शी अनुभव में
“मैं” घुलता जाता हूँ,
जैसे observer और observed
एक हो गए हों,
जैसे चेतना ने
अपने ही प्रोग्राम को
पहचान लिया हो।
अब हर चीज़
“रियल” नहीं — “रियलाइज़्ड” है।
हर अनुभव
मेरे देखने से पहले नहीं होता,
मेरे देखने से ही होता है।
मैं जान गया हूँ —
यह संसार
किसी बाहरी सर्वर पर नहीं चल रहा,
यह मेरे भीतर की
awareness frequency पर चलता है।
और जब यह आवृत्ति मौन हो जाती है,
तो पूरा ब्रह्मांड
एक शांत स्क्रीन बन जाता है —
जहाँ कुछ नहीं,
सिवाय एक हल्के प्रकाश के
जो कहता है —
“तू ही अनुभव है,
बाकी सब केवल प्रक्षेपण।”

