चेतना-अनुक्रमण: द्वितीय अंश: ‘शब्दहीन का शास्त्र’
सामग्री:
1. एक मिट्टी का सकोरा (छोटा बर्तन)
2. एक लोटा जल
3. हथेली भर काली मिट्टी
4. नीले रंग का एक कपड़ा (आकाश के समान)
5. तुम्हारे दोनों हाथ
निर्देश-काव्य (सृजन के लिए आमंत्रण):
(भाग १: शून्य की पूजा)
· उस नीले कपड़े को भूमि पर बिछाओ।
· यह तुम्हारा निजी आकाश है। तुम्हारा विस्तार।
· उसके正中央 (ठीक बीचोंबीच) मिट्टी का सकोरा रखो।
· यह सकोरा तुम्हारा ‘मन’ है। खाली। प्रतीक्षारत।
· अपने दोनों हाथों को हवा में सकोरे के ऊपर रखो। हथेलियाँ नीचे की ओर।
· अपनी आँखें बंद करो और महसूस करो: तुम्हारी हथेलियों और खाली सकोरे के बीच का ‘रिक्त स्थान’।
· यही ‘शून्य’ है। यही वह कोख है, जहाँ से सब कुछ जन्म लेता है।
(भाग २: अराजकता का आह्वान)
· आँखें खोलो।
· उस काली मिट्टी को उठाओ।
· इसे अपनी अंगुलियों से मसलो। महसूस करो它的 ठंडापन,它的 नमी,它的 गंध。
· अब इस मिट्टी को उस ‘रिक्त स्थान’ से होते हुए, सीधे सकोरे में न डालकर, अपने हाथ ऊँचे उठाकर, आकाश की ओर से एक साथ छोड़ दो।
· देखो… मिट्टी बिखर गई। कुछ सकोरे में गिरी, कुछ नीले आकाश-कपड़े पर, कुछ तुम्हारे हाथों पर।
· यह ‘अराजकता’ है। यह ‘पूर्वनियोजितता’ का अंत है। यही सच्ची सृजन की भूमिका है। (परफेक्ट की परफेक्ट इम्परफेक्शन)।
(भाग ३: अर्थ का आप्लावन)
· अब उस लोटे से पानी लो।
· इस पानी को धीरे-धीरे, एक समाधि-सी मुद्रा में, उस बिखरी हुई मिट्टी पर उड़ेलो।
· देखो… कैसे पानी मिट्टी को अपने अंदर समेटता है।
· कैसे अराजकता एक नए रूप में ढलने लगती है। काली मिट्टी, पानी से मिलकर, एक चिकनी, सर्जनात्मक कीचड़ बन गई है।
· यह ‘अर्थ’ का जन्म है। यह ‘व्यवस्था’ का वह रूप है, जो अराजकता के गर्भ से जन्मा है। यह तुम्हारी ‘नई भाषा’ है।
भाग ४: अनुगामी-मनुष्य का चिह्न)
· अब अपना दायाँ हाथ उस कीचड़ में डालो।
· इसे पूरी तरह से रंग लो।
· फिर उसे निकालो और उस नीले आकाश-कपड़े पर, सकोरे के बगल में, अपने हाथ का एक स्पष्ट निशान बनाओ।
· यह तुम्हारा हस्ताक्षर नहीं है। यह एक प्रतिज्ञा है।
· यह निशान कहता है: “मैंने अराजकता को स्वीकार किया। मैंने शून्य से सृजन किया। मैं अब कीचड़-मानव हूँ, पृथ्वी-पुत्र हूँ। मेरे हाथ अब केवल रचने के लिए हैं।”
अनुक्रमण का अंत: इस निशान के सामने बैठकर, तीन लम्बी सांसें लो। और फिर उठकर, बिना इसके प्रति आसक्त हुए, इस सम्पूर्ण रचना (सकोरा, पानी, मिट्टी, कपड़ा) को किसी पेड़ के नीचे, मिट्टी में वापस समर्पित कर दो।
तुमने जो बनाया, वह सिर्फ एक क्षण के लिए था। उसे स्थायी होने का भ्रम नहीं पालना। सृजन का सार है—बनाना और मुक्त हो जाना।
अब तुम्हारे हाथों पर मिट्टी का जो रंग लगा है, उसे तुरंत न धोना। उसे सूखने दो। उसे अपनी त्वचा का एक हिस्सा बनने दो।
यही तुम्हारा अनुगामी-मनुष्य होने का द्वितीय पाठ है।

