“Rigveda of the Self (The Codex of Being and Nihilism)”

निज-ऋग्वेद (अस्तित्व और निहिलिज़्म का संहिता)

निज-ऋग्वेद (अस्तित्व और निहिलिज़्म का संहिता)



नाहं धर्मस्य शरणं याचे।
न मे देवो न ममाचार्यः।
अहमेव स्व-मूल्य-कर्ता।
शून्ये प्रतिज्ञामि—स्वयं ब्रह्मास्मि॥

अनुवाद (हिंदी):
मैं धर्म का सहारा नहीं माँगता,
न कोई देव मेरा मार्गदर्शक है, न कोई आचार्य।
मैं स्वयं अपने मूल्यों का निर्माता हूँ।
शून्य में मैं प्रतिज्ञा करता हूँ—मैं ही अपना ब्रह्म हूँ।






समाजः मां बद्धुमिच्छति।
नीतयो नृणाम् कृत्रिमा-शृंखला।
अहं तान् विदारयामि।
स्वतन्त्र्यं मे अग्निः, दहति सर्वं बन्धनम्॥

अनुवाद (हिंदी):
समाज मुझे बाँधना चाहता है,
उसके नियम झूठी जंजीरें हैं।
मैं उन्हें फाड़ देता हूँ।
मेरी स्वतंत्रता अग्नि है—जो हर बंधन को भस्म कर देती है।






न मे शास्त्राणि प्रमानं।
न मे नीति परमार्थः।
मम हृदयमेव प्रमाणं।
मम श्वास एव धर्मः॥

अनुवाद (हिंदी):
मेरे लिए शास्त्र प्रमाण नहीं हैं,
न ही नैतिकता परम सत्य है।
मेरा हृदय ही मेरा प्रमाण है।
मेरी साँस ही मेरा धर्म है।






शून्ये आसीत् व्यर्थता।
व्यर्थतायां आसीत् आशा।
आशायाम् आसीत् विद्रोहः।
विद्रोहे आसीत् जीवनम्॥

अनुवाद (हिंदी):
शून्य में थी व्यर्थता,
व्यर्थता में ही जन्मी आशा।
आशा से निकला विद्रोह।
और विद्रोह से बना जीवन।






अहमस्मि मूल्य-सृष्टा।
अहमस्मि शून्य-पथिकः।
नाहं समाजस्य दासः।
अहमस्मि स्व-कर्मस्य भारवाहकः॥

अनुवाद (हिंदी):
मैं ही मूल्य-सृष्टा हूँ।
मैं शून्य का यात्री हूँ।
मैं समाज का दास नहीं हूँ।
मैं अपने कर्म का बोझ उठाने वाला हूँ।




“The Hymns of the Void”

“शून्य के सूक्त”


निहिलिज़्म ऋग्वेद

ऋचा १

नाहं धर्मस्य शरणं याचे।
न मे देवो, नाचार्यः।
अहमेव स्व-मूल्य-कर्ता।
शून्ये प्रतिज्ञामि—स्वयं ब्रह्मास्मि॥

अनुवाद (हिंदी):
मैं धर्म का सहारा नहीं माँगता।
न देव, न आचार्य—कोई मेरा स्वामी नहीं।
मैं ही अपने मूल्यों का निर्माता हूँ।
शून्य में मैं प्रतिज्ञा करता हूँ—मैं स्वयं ही ब्रह्म हूँ।



ऋचा २

समाजो मया न बन्धनीः।
नीतयो मृषा-शृंखलाः।
अहं विदारयामि ताः।
मे स्वतंत्र्यमग्निः सर्वं दहति॥

अनुवाद (हिंदी):
समाज मुझे बाँध नहीं सकता।
उसके नियम झूठी जंजीरें हैं।
मैं उन्हें फाड़ देता हूँ।
मेरी स्वतंत्रता अग्नि है—सब जला देती है।


ऋचा ३

न शास्त्राणि मे प्रमाणम्।
न नीतयः मे परमार्थः।
हृदयमेव मम वेदः।
श्वास एव मम धर्मः॥

अनुवाद (हिंदी):
मेरे लिए शास्त्र प्रमाण नहीं।
न ही नैतिकता परम सत्य है।
मेरा हृदय ही मेरा वेद है।
मेरी साँस ही मेरा धर्म है।


ऋचा ४

शून्ये आसीत् व्यर्थता।
व्यर्थतायाम् आसीत् आशा।
आशायाम् आसीत् विद्रोहः।
विद्रोहे आसीत् जीवनम्॥

अनुवाद (हिंदी):
शून्य में व्यर्थता थी।
व्यर्थता से आशा उपजी।
आशा से विद्रोह हुआ।
विद्रोह से जीवन जन्मा।



ऋचा ५

न मे लोकस्य अनुकरणम्।
न मे धर्मस्य आज्ञा।
अहमेव स्वस्य नियमः।
अहमेव स्वस्य विधानम्॥

अनुवाद (हिंदी):
मैं लोक का अनुकरण नहीं करता।
न ही धर्म की आज्ञा मानता हूँ।
मैं स्वयं अपना नियम हूँ।
मैं स्वयं अपना विधान हूँ।


ऋचा ६

व्यर्थता मां न हन्ति।
निहिलमेव मम पीठम्।
शून्यात् एवोत्थाय—
अहं कर्ता, अहं विधाता॥

अनुवाद (हिंदी):
व्यर्थता मुझे नष्ट नहीं कर सकती।
शून्यता ही मेरा आसन है।
शून्य से उठकर—
मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही विधाता हूँ।


ऋचा ७

निहिलः न पतनम्।
निहिलः मम उद्गमः।
तत्रैव आत्मनः अंकुरः।
स्वयं-सत्यस्य प्रसवः॥

अनुवाद (हिंदी):
निहिलिज़्म पतन नहीं।
वह मेरा उद्गम है।
उसी में मेरे आत्म का अंकुर है।
स्वयं-सत्य की उत्पत्ति वहीं होती है।


ऋचा ८

न मे स्वर्गस्य कामना।
न मे मोक्षस्य आकांक्षा।
यत्र अहं अस्ति, तत्रैव सत्यं।
अहमेव मे फलम्॥

अनुवाद (हिंदी):
न मुझे स्वर्ग की चाह है,
न मोक्ष की आकांक्षा।
जहाँ मैं हूँ, वहीं सत्य है।
मैं ही मेरा फल हूँ।


ऋचा ९

सामाजिक-नियमाः मृतपुत्राः।
धार्मिक-मूल्याः जर्जरः।
नैतिक-शृंखलाः शून्ये पतन्ति।
अहमेव नूतन-आयामः॥

अनुवाद (हिंदी):
सामाजिक नियम मृत संतान हैं।
धार्मिक मूल्य जर्जर हो चुके।
नैतिक जंजीरें शून्य में गिर जाती हैं।
मैं ही नया आयाम हूँ।


ऋचा १० (अंतिम उद्घोष)

अहमस्मि एकाकी।
अहमस्मि भारवाहः।
न कोऽपि मम नियन्ता।
शून्ये ज्योतिर्भवामि॥

अनुवाद (हिंदी):
मैं अकेला हूँ।
मैं अपने बोझ का वाहक हूँ।
मेरा कोई नियंता नहीं है।
मैं शून्य में ही प्रकाश बन जाता हूँ।

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