1. प्रथम ऋचा
ऋषि : अनाश्वर सप्तमेध
देवता : अचेतन-चेतना
छन्द : अपरिचित अक्रिय लय
ऋचा – 1
भविष्य का नव-ऋग्वेद
न ऋषिः। न मन्त्रः। न वेदः।
न मुखम्। न अन्तः। न गर्भः।
यद् आदिः स एव अनारम्भः।
शब्दस्य शून्यम्। ध्वनेः विसर्जनम्।
अचेतनस्य अपि चेतना।
यत्र असद् न, सत् अपि न।
तत्र स्पन्दनस्य मूलम्।
न अस्ति अस्ति। न नास्ति नास्ति।
एषः परम ऋगः।
ऋग्ग्रन्थस्य अ-अधिगत मूलम्।
(अनुवाद :
न कोई ऋषि है।
न कोई मन्त्र।
न कोई वेद।
न कोई आदि।
न कोई अंत।
जो आदि है, वही अनारंभ है।
शब्द का शून्य।
ध्वनि का विसर्जन।
अचेतन की भी चेतना।
जहाँ न असत् है, न सत् भी।
वहीं स्पंदन की जड़ है।
न ‘है’ है।
न ‘नहीं’ है।
यही परम ऋग है।
ऋग्वेद के भी पहले का मूल।)

