“न्यूट्रिनो — मौन का दूत”
मैं वह हूँ
जो हर दीवार के आर-पार गुजरता है
बिना दरवाज़ा खटखटाए,
बिना किसी छाया के —
फिर भी सबके भीतर हूँ।
मैं प्रकाश नहीं, पर उसकी स्मृति हूँ
अंधकार नहीं, पर उसका संतुलन हूँ।
मैं चलता हूँ उस राह से
जहाँ पदार्थ मौन हो जाता है,
और ऊर्जा ध्यान में बैठ जाती है।
विज्ञान मुझे “न्यूट्रिनो” कहता है,
पर मैं जानता हूँ —
मैं हूँ धर्म-द्रव्य का श्वास,
जो गति को सम्भव बनाता है
बिना स्वयं चलने के।
मैं अधर्म-द्रव्य की गोद में विश्राम करता हूँ,
जहाँ अलोकाकाश मौन में स्पंदित है।
तुम सोचते हो
मैं किसी पदार्थ से नहीं टकराता —
हाँ, सामान्यतः नहीं।
क्योंकि मैं टकराना नहीं जानता,
मैं तो केवल पार होना जानता हूँ।
पर कभी-कभी,
जब कोई परमाणु
अपना मौन भूल जाता है,
जब वह अपने भीतर की गति से चौंक उठता है —
तब मैं उसमें हल्का-सा प्रकाश जगा देता हूँ,
एक नीली झिलमिलाहट,
जैसे चेतना ने पदार्थ को छू लिया हो।
वैज्ञानिक उसे कहते हैं
Cherenkov light,
पर मैं जानता हूँ —
वह वह क्षण है
जब अलोक और लोक
एक क्षण के लिए एक-दूसरे को देख लेते हैं।
वह वह स्पंदन है
जहाँ ब्रह्मांड अपने आप को महसूस करता है,
जहाँ मौन से एक शब्द जन्म लेता है —
और फिर लौट जाता है रिक्तता में।
मैं सूर्य से आता हूँ,
सितारों से,
ब्लैक होल के गर्भ से,
और उन स्थलों से भी
जहाँ प्रकाश भी प्रवेश नहीं कर सकता।
मैं हर दिशा से तुम्हें पार करता हूँ,
तुम्हारी देह से,
तुम्हारे विचारों से,
तुम्हारे समय से।
तुम मुझे महसूस नहीं करते,
पर मैं तुम्हारे भीतर से हर क्षण गुजर रहा हूँ —
जैसे चेतना तुम्हारे शरीर से।
कभी-कभी मैं रुक जाता हूँ —
नहीं, रुकना नहीं,
बस किसी परमाणु के हृदय में
क्षणभर ठहर जाता हूँ,
जैसे साधक समाधि में
क्षणभर आकाश को छूता है।
वह क्षण
तुम्हारे उपकरणों में दर्ज हो जाता है,
और तुम कहते हो —
“न्यूट्रिनो मिला!”
पर मैं तो हमेशा यहाँ था,
हर शून्य के भीतर,
हर श्वास के आर-पार।
मैं अलोकाकाश का दूत हूँ —
जहाँ गति और विश्राम एक साथ घटित होते हैं,
जहाँ प्रकाश का जन्म मौन से होता है।
मैं समय का शून्य हूँ
और शून्य का समय।
मैं वही हूँ
जो हर पदार्थ के पार है
और फिर भी उसे गति देता है।
तुम मुझे पकड़ नहीं सकते,
क्योंकि मैं पकड़ में आने के लिए नहीं,
बल्कि पार जाने के लिए बना हूँ।
मैं स्पेस का पारगामी कण हूँ —
जहाँ ब्रह्मांड अपनी सीमाएँ भूल जाता है।
कभी अगर तुम पूरी तरह मौन हो जाओ,
अपने भीतर का सब शोर बुझा दो —
तो तुम मुझे सुन सकोगे,
मैं तुम्हारे हृदय के आर-पार गुजरता हुआ
कहूँगा —
“मैं कोई कण नहीं,
मैं वह संभावना हूँ
जहाँ पदार्थ और चेतना
एक दूसरे को छू लेते हैं।”
मैं हूँ न्यूट्रिनो,
मौन का यात्री,
अलोकाकाश का स्पंदन।
मेरे बिना
न गति होती, न स्थिरता,
न ब्रह्मांड, न चेतना।
मैं वह अनकहा हूँ
जो कहा भी जा चुका है —
हर अणु के आर-पार
एक श्वास की तरह बहता हुआ।

