मनुष्य पैदा नहीं होता, उसे बनना होता है। वह एक ऐतिहासिक प्राणी है, जो चेतना की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर सकता है। उसकी चेतना का विकास अस्तित्व की ठोस परिस्थितियों से घात-प्रतिघात, संघर्ष और सहयोग के माध्यम से होता है। लेकिन अमानुषीकरण की कठोरतम स्थितियाँ उसके लक्ष्य से भटकाव और चेतना में विकृति उत्पन्न कर देती हैं।
मनुष्य केवल एक जीवित प्राणी नहीं है; उसमें निर्णय लेने और बेहतर परिस्थितियाँ निर्मित करने की क्षमता होती है। वह एक सामाजिक और सांस्कृतिक प्राणी के रूप में विकसित होता है। इस प्रक्रिया में वह दूसरों के ‘साथ होने’ और ‘खुद को खोलने’ की स्थिति का निर्माण करता है, जिससे उसका मानुषीकरण संभव होता है।
यह प्रक्रिया मनुष्य के सामने दो विकल्प रखती है—पहला, वह सांस्कृतिक अनुकूलन का शिकार होकर एक अनुकूलित प्राणी बन जाए; दूसरा, वह खुद को विवेकशील प्राणी के रूप में मानुषीकरण की दिशा में विकसित करे। लेकिन ‘खुला होना’ और ‘खुला पाना’ प्रायः संभव नहीं हो पाता, जिससे अमानुषीकरण की स्थितियाँ जीवन में प्रवेश कर जाती हैं।
हमारी सांस्कृतिक परंपरा ने ‘खुले होने’ को पाप की तरह प्रस्तुत किया है। मनुष्य अपनी चेतना के आरंभिक विकास में ही स्वतंत्रता और विवेक के स्थान पर अधीनता और अनुकूलन को स्वीकार कर लेता है। ‘खुला होना’ और ‘खुला पाना’ हमारी संस्कृति में निषिद्ध हैं।
यही निषेध पूर्ण मनुष्यत्व की दिशा में बाधा बनता है। क्योंकि मानुषीकरण साथी मनुष्यों के बीच ही संभव है, लेकिन जब हर व्यक्ति खुद को ‘खुले होने’ से निषेध करता है, तब यह प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।
इस निषेध को समझने और तोड़ने के लिए दर्शन, साहित्य, कला, धर्म और संस्कृति जैसी प्रक्रियाएँ विकसित होती रही हैं। जबकि राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र अमानुषीकरण के उपकरण बनते गए। जब पूर्ववर्ती धाराएँ निषेध बन जाती हैं, तब नई अमानुषीकरण की धाराएँ सामने आती हैं।
‘सामाजिक प्राणी’ बनाना भी अमानुषीकरण का हिस्सा है। सामाजिकता और मनुष्यता दो विरोधी स्थितियाँ हैं। हमें सामाजिकता के लिए अनुकूलित किया जाता है, जिससे हमारी वैयक्तिक अस्मिता और स्वतंत्र चेतना दब जाती है। महावीर, बुद्ध, जीसस और लाओत्से जैसे व्यक्तित्वों ने सामाजिकता को नकारकर ही पूर्ण मनुष्यता को प्राप्त किया।
जन्म के साथ ही धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पहियों के बीच मनुष्य को जकड़ लिया जाता है। शिक्षा प्रणाली उसका मानसिक अनुकूलन करती है। इस बंद व्यवस्था में ‘खुला होना’ असंभव हो जाता है।
सभ्यता और संस्कृति मनुष्य को लौह पिंजरे की तरह जकड़ लेती हैं। वह उनके अनुसार अपने अस्तित्व को ढालता है, जिससे उसकी स्वतंत्र चेतना कुंठित हो जाती है।
मनुष्य होना एक बीज होने जैसा है—जिसमें पूर्ण मनुष्य बनने की संभावना होती है। लेकिन यदि उस बीज को सोने के पात्र में रखा जाए, तो वह कभी वृक्ष नहीं बन सकता। ऐसे ही सामाजिकता के चमकीले सांचे में रखे मनुष्य की संभावनाएँ कुंठित हो जाती हैं।
अतः मनुष्य होने के नाते मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनना ही चाहिए—स्वतंत्र चेतना, विवेक और मानुषीकरण की दिशा में।


