Manifesto of Humanity

मनुष्य का घोषणापत्र : स्वर्ग, नर्क और युद्ध का सत्य

1. प्रश्न की मशाल
अपने नेताओं से पूछो—
क्यों युद्ध के मैदानों में
हमारे बेटों का खून बहता है,
पर तुम्हारे घरों की खिड़कियाँ
हमेशा सुरक्षित रहती हैं?
क्यों सीमा पर सैनिक मरते हैं,
शहरों में नागरिक मरते हैं,
पर सत्ता के महलों में
बस शराब और योजनाएँ छलकती हैं?

2. राष्ट्रवाद का रक्त
क्यों राष्ट्रवाद का झंडा
हमारे कंधों पर लाद दिया जाता है?
क्यों हमें कहा जाता है—
“मरना है तो मातृभूमि के लिए मरो”?
जबकि मातृभूमि तो वही धरती है
जो पड़ोसी के खेत से
अलग नहीं है।
क्या मिट्टी की खुशबू में
कभी पासपोर्ट लिखा गया है?

3. पड़ोसी का प्रश्न
पड़ोसी देश का आदमी
हम जैसा ही साँस लेता है।
उसकी रोटियाँ भी आँच पर सिकती हैं,
उसकी बेटियाँ भी हँसती और सपने देखती हैं।
क्या हम उसके बिना हो सकते हैं?
नदी क्या बाँधों की दीवारों से
अपना पड़ोसी जल खो देती है?
हवा क्या वीज़ा पूछकर बहती है?

4. सत्ता और धर्म का षड्यंत्र
राजनेता—
हमारे शरीर को बाँधता है
करों और कानूनों के रस्से से।
धर्मनेता—
हमारी आत्मा पर कब्ज़ा करता है
स्वर्ग और नर्क की धमकियों से।
दोनों मिलकर
पूरी मानवता को
एक ऐसी फैक्ट्री में बदल देते हैं
जहाँ दुख और अभाव
सामूहिक उत्पादन की वस्तुएँ हैं।

5. युद्ध का बाजार
युद्ध उनका उत्सव है,
जहाँ हथियार बिकते हैं
और कब्रें सजती हैं।
हमारे शव उनके सौदों की गारंटी हैं,
हमारा शोक उनका लाभांश।
नेता मरते नहीं—
वे बस
नई पीढ़ी के लिए
नई कब्रगाह की रूपरेखा बनाते हैं।

6. स्वर्ग और नर्क का मिथक
वे हमें बताते हैं—
“मरोगे तो स्वर्ग मिलेगा।”
या
“अधर्मी हुए तो नर्क मिलेगा।”
पर सच यह है
कि स्वर्ग उनके बैंक खातों में है,
और नर्क हमारे घरों की भूख में।
सत्ता और धर्म ने
इन अदृश्य जेलों से
मनुष्य की स्वतंत्रता को
हज़ार साल से बाँध रखा है।

7. विद्रोह की चिंगारी
पर मानवता अब पूछ रही है:
क्यों युद्ध में तुम नहीं मरते?
क्यों तुम्हारे बच्चे कभी सीमा पर नहीं जाते?
क्यों हमारी आत्माएँ
तुम्हारे ग्रंथों और भाषणों में
बंधक रखी जाती हैं?
यह प्रश्न
एक चिंगारी है
जो महलों की दीवारें
जलाने को तैयार है।

8. नया घोषणापत्र
समस्त देशों के नागरिक,
एक स्वर में कहो:
हम पड़ोसी के बिना नहीं हैं,
हम दुश्मन नहीं—
हम मनुष्य हैं।
नदी, हवा, आकाश—
इनका कोई राष्ट्रवाद नहीं।
हम भी उसी सृष्टि के बच्चे हैं,
जिसका नाम ईश्वर है—
और ईश्वर की संतानें
कभी दुश्मन नहीं होतीं।

9. मानवता का स्वर्ग
सच्चा स्वर्ग
न सत्ता की गद्दियों में है,
न धर्म के ग्रंथों में।
सच्चा स्वर्ग
हमारे साझा श्रम में है,
हमारी हँसी में है,
हमारे बच्चों के सपनों में है।
और सच्चा नर्क
नेताओं और धर्मगुरुओं का षड्यंत्र है
जो हमें एक-दूसरे से काट देता है।

10. अंतिम उद्घोष
तो उठो, मनुष्य!
न राष्ट्रवाद की छड़ी को मानो,
न धर्म के कोड़े को।
स्वतंत्रता को अपने हाथ में लो।
क्योंकि यही
मानवता का नया धर्म है,
यही
जीवन का सच्चा उत्सव है।
और यही
नेताओं और धर्मनेताओं से
हमारा अंतिम प्रतिरोध है।

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