मैंने देखा —
भीड़ में मैं ही था,
जो चला जा रहा था,
और जो देख रहा था,
दोनों मैं था।
लोग रो रहे थे,
कुछ मौन थे,
कुछ के चेहरों पर
एक अधूरी जिज्ञासा थी —
“क्यों चला गया?”
और मैं बस देख रहा था
जैसे समय खुद
मुझे दफ़न कर रहा हो।
शरीर जा रहा था,
पर मैं वहीं ठहरा हुआ,
हवा के कणों में बँधा,
सुन रहा था —
हर फुसफुसाहट,
हर आह,
हर अधूरा वाक्य।
मुझे लगा —
मैं मर नहीं रहा,
बस अपनी सीमाओं से बाहर निकल रहा हूँ।
मेरे जाने का दुख
दरअसल मेरे होने की आदत थी,
और उनका शोक
मेरे अंशों का विसर्जन।
उस क्षण
मुझे जीवन की पूरी परिभाषा समझ आई —
हम तब तक जीवित हैं
जब तक कोई हमें पहचानता है,
और तब मुक्त
जब पहचान भी राख बन जाती है।
मैं मुस्कराया —
क्योंकि मैंने पहली बार
स्वयं को देखा
बिना किसी नाम, बिना किसी शरीर के।
मैं था —
बस “मैं”,
अविनाशी, निराकार,
अपने ही जनाज़े में शामिल
और उसी में जन्म लेता हुआ।
अपनी ही अग्नि में
मैंने देखा —
श्मशान में सन्नाटा था,
और उस सन्नाटे में मैं ही था —
जो लकड़ियाँ सजा रहा था,
जो लेटा हुआ था,
और जो अग्नि दे रहा था।
हवा स्थिर थी,
मानो समय ने साँस रोक ली हो।
कोई शोक नहीं,
बस एक गहरी स्वीकृति —
कि अंत भी मेरा ही कर्म है,
और आरंभ भी।
मैंने अपने ही शरीर को
धीरे-धीरे धुआँ बनते देखा —
जैसे कोई पुरानी परछाई
रौशनी में घुल रही हो।
हर चिनगारी कह रही थी —
“अब लौट चल, जहाँ से आया था,
वहाँ कोई नाम नहीं।”
मेरे हाथों की लौ
मेरे ही अहं को भस्म कर रही थी।
मैंने पहली बार जाना —
मरना दरअसल जलना नहीं होता,
बल्कि स्वयं को राख में रूपांतरित करना होता है।
उस राख में मैंने देखा —
मेरी सारी इच्छाएँ, भय,
स्मृतियाँ और पहचान
धीरे-धीरे विलीन हो रही हैं।
और उस विलय में
एक अद्भुत शांति जन्म ले रही है —
जैसे मैं स्वयं अग्नि बन गया हूँ।

