मैं भी, सिसिफ़िस की तरह,
हर सुबह उठता हूँ
एक नई शुरुआत के भ्रम में—
सोचता हूँ आज का दिन अलग होगा,
पर वही ईमेल, वही स्क्रीन, वही आवाज़ें,
वही समय की पथरीली चढ़ाई।
मेरे हाथों में अब चट्टान नहीं,
एक मोबाइल है—
जो मेरे इशारों पर नहीं,
मेरे भीतर की इच्छाओं पर शासन करता है।
मैं “फ्री विल” में जीता हूँ,
पर मेरे निर्णय पहले से कोडित हैं—
एल्गोरिद्म की परतों में छिपे हुए।
मेरी चेतना अब
क्लिकों और नोटिफ़िकेशनों के बीच झिलमिलाती है,
हर सूचना एक नया “आवश्यक कार्य” बन जाती है,
हर क्षण “ज़रूरी” बनता जाता है।
मैं दौड़ता हूँ,
पर नहीं जानता कि कहाँ।
मेरी मांसपेशियाँ तनाव में हैं,
मेरा मस्तिष्क
डोपामिन के आदेशों से भरा है,
मेरे विचार—
किसी और के शब्दों के प्रतिरूप।
मैं सोचता हूँ कि मैं सोच रहा हूँ,
पर सोच पहले ही बिक चुकी है।
दिन के अंत में,
जब थकान मुझे दीवार की तरह रोकती है,
मैं भी सिसिफ़िस की तरह
नीचे उतरता हूँ—
अपने बोझ को फिर से उठाने के लिए।
पर मेरी चट्टान अब दिखाई नहीं देती,
वह मेरे भीतर रहती है,
मेरी आकांक्षाओं,
मेरे डर,
और मेरी अपूर्ण इच्छाओं के रूप में।
कभी-कभी मैं रुकता हूँ,
थोड़ा शांत होकर देखता हूँ—
कि यह सब कौन चला रहा है?
मेरे भीतर कौन धकेलता है उस अदृश्य पत्थर को?
कौन कहता है —
“चलो, और ऊँचा, और तेज़”?
और तभी समझ आता है—
स्वतंत्रता का यह रूप
सिर्फ़ एक परिष्कृत कैद है।
मैं जिस क्षण को जीता समझता हूँ,
वह पहले से योजनाबद्ध है।
पर फिर भी,
सिसिफ़िस की तरह,
मैं भी उस क्षण में
सचेत हो सकता हूँ—
जब मैं जान लूँ
कि मैं धकेल रहा हूँ,
और वही धकेलना मेरा साक्षात्कार है।
क्योंकि जब मैं उस “धकेलने” को
पूरा महसूस करता हूँ,
जब मैं अपने ही दोहराव को
स्पष्ट देखता हूँ,
तभी थोड़ी देर के लिए
चट्टान का भार हल्का हो जाता है।
उस क्षण में
मैं किसी एल्गोरिद्म से नहीं,
अपनी सजगता से संचालित हूँ।
वह क्षण भले छोटा हो,
पर वही मेरा सच्चा जीवन है।
और इस तरह—
मैं भी,
आधुनिक सिसिफ़िस हूँ,
जो अपनी ही बनाई चट्टान को
हर दिन
सजगता से,
थोड़ा कम भ्रम में
धकेलता चला जा रहा है।

