तांबे के कीड़े : शिक्षित बुद्धिजीवियों का कोल्हू
हम सब—
डिग्रियों की चमक में लिपटे,
ज्ञान के दर्पण में नहाए,
सभ्य और शिक्षित कहलाने वाले,
असल में कोल्हू के बैल हैं।
हमारी आँखों पर पट्टी नहीं—
स्क्रीन है।
हमारे कानों में घंटी नहीं—
सूचनाओं की निरंतर टंकार है।
हमारे पाँव नहीं बँधे—
वे सत्ता, पूँजी और व्यवस्था के त्रिकोण में
गहरे गाड़ दिए गए हैं।
हम सोचते हैं
कि हम स्वतंत्र बुद्धिजीवी हैं।
पर हमारे भीतर चलता है
एक सुसंगत प्रोग्राम्ड एल्गोरिथ्म,
जो हमें तय करता है
कब क्रोधित होना है,
कब चुप रहना है,
कब तालियाँ बजानी हैं,
कब स्याही फैलानी है।
यह एल्गोरिथ्म
पुस्तकालय की शांति में भी है,
कक्षा की गहमागहमी में भी,
और विश्वविद्यालय की बहसों में भी।
हमारा हर तर्क,
हर शोध,
हर विचार—
पहले से लिखा हुआ स्क्रिप्ट है।
और हम,
इन स्क्रिप्टों को दोहराते हुए,
अपने को स्वतंत्र मानते हैं।
हम तांबे के कीड़े हैं—
चमकते हुए,
चालाकी से सजाए गए,
पर असल में
मशीनों के भीतर
घिसटते हुए पुर्जे।
हमारी हर हरकत
ऊर्जा नहीं,
घर्षण है।
कितना भी रेंग लें—
हम धातु के भीतर ही घुटते हैं।
कितना भी चहक लें—
हमारी आवाज़
मशीन की घरघराहट में दब जाती है।
सत्ता हमें अपनी भाषा देती है,
पूँजी हमें अपना बाजार,
व्यवस्था हमें अपना अनुशासन।
और हम,
इन तीनों के सम्मोहन में,
धीरे-धीरे भूल जाते हैं
कि हमारे भीतर
कोई असली आत्मा भी थी।
कभी-कभी
रात के अँधेरे में
जब सिस्टम की नीली रोशनी बुझती है,
तो मन में एक फुसफुसाहट उठती है—
“क्या हम सचमुच जीवित हैं?”
पर यह सवाल भी
सुबह होते ही
कॉफी के प्याले में डूब जाता है,
नौकरी के टेबल पर दब जाता है,
वेतन की पर्ची में गुम हो जाता है।
हम सचमुच जीवित नहीं हैं—
हम प्रोग्राम्ड बैल हैं,
कोल्हू में गोल-गोल घूमते हुए,
हर चक्कर के साथ
अपनी ही ऊर्जा निचोड़ते हुए,
अपने ही मस्तिष्क को
तेल की तरह पेरते हुए।
और यह चक्र,
यह त्रिकोण,
यह जाल—
हमें जीवित नहीं छोड़ता,
बस कार्यशील बनाए रखता है।
हम तांबे के कीड़े हैं—
झिलमिलाते,
पर भीतर से जंग खाते,
सत्ता की मशीन में
धीरे-धीरे गलते हुए।

