कालाणु : समय की दो व्याख्याएँ
(१) वैज्ञानिकों की आँख में)
समय बहता है, कहते वे,
जैसे कोई अनंत नदी,
भूत से भविष्य तक का पुल
वर्तमान की एक संकरी राह।
गणित की रेखाएँ खींचकर,
घड़ियों की धड़कनें गिनकर
वे समझते हैं—
ब्रह्मांड का नाड़ी-स्पंदन
समय की धारा ही है।
(२) मेरी दृष्टि में)
नदी नहीं है समय,
न कोई प्रवाह, न कोई गति।
यह स्वयं एक तत्व है,
पर पदार्थ नहीं—
जैसे एक शून्य में बसा हुआ
अविभाज्य अणु: कालाणु।
न इसे विभाजित किया जा सकता है,
न बदला जा सकता है,
न रोका जा सकता है।
यह दृश्य नहीं,
अदृश्य का भी अदृश्य है।
पर इसकी उपस्थिति में ही
हर गति संभव है,
हर रूपांतरण जन्म लेता है।
यह ब्रह्मांड के स्पेस में
अनंत और सर्वव्यापक है,
डार्क एनर्जी की तरह
अपने काम से ही पहचाना जाता है।
(३) फर्क
वे कहते हैं—समय बहता है।
मैं कहता हूँ—समय बस है।
वे कहते हैं—भूत, वर्तमान, भविष्य।
मैं कहता हूँ—ये सब
कालाणु की एक ही उपस्थिति के
भिन्न अनुभव हैं।
वे मानते हैं—समय आयाम है।
मैं देखता हूँ—
यह न आयाम है, न दिशा,
बल्कि हर परिवर्तन का
मौन साक्षी।
(४) ब्रह्मांडीय प्रतिज्ञा)
सितारों का जलना,
गैलेक्सियों का टूटना-बनना,
कणों की टक्कर,
जीवन का उदय—
इन सबका निमित्त
समय का प्रवाह नहीं,
बल्कि कालाणु की
अनंत, अचल उपस्थिति है।
और इसी में
ब्रह्मांड अपने रहस्यों को
अनंत रूप में प्रकट करता है।
काल की त्रयी : चेतना, स्थान और परिवर्तन
समय—
नदी नहीं है,
रेतघड़ी का रेत-झरना नहीं,
यह वह आयाम है
जो चेतना की आँख में
भूत–भविष्य–वर्तमान का
भ्रम रचता है।
यह वही है
जो पदार्थ की धड़कन में
परिवर्तन का साक्षी बनकर
हर अणु को गति देता है।
न्यूट्रॉन का क्षय,
फोटोन का प्रस्थान,
गैलेक्सी का टूटना—
इन सबके पीछे
मौन खड़ा काल है।
और यह वही है
जो स्पेस की गहराई में
एक चौथा आयाम बनकर
ग्रहों और तारों को
अस्तित्व की रूपरेखा देता है।
अनादि-अनंत
इसकी कोई सीमा नहीं।
न आरंभ बिंदु, न अंत बिंदु।
बिग बैंग से पहले भी
यह मौन उपस्थिति था,
और बिग क्रंच के बाद भी
यही अदृश्य साक्षी रहेगा।
यह चेतना में
क्षणों का भेद रचता है,
पदार्थ में
परिवर्तन का प्रवाह दिखाता है,
और स्पेस में
अनंत स्थिरता की छाया।
समय—
नश्वरता का स्पंदन नहीं,
बल्कि अमर उपस्थिति है।
एक ऐसा कालाणु
जो हर अस्तित्व के
भीतर और बाहर
मौन होकर फैला है।
कालाणु : अनादि-अनंत की मौन ज्वाला
समय,
तुम्हें हमने बहती नदियों की तरह देखा,
घड़ियों की सूइयों पर चलते हुए जाना,
पर तुम न बहते हो,
न किसी दिशा में झुकते हो।
तुम हो—
एक अदृश्य, अविभाज्य अणु,
कालाणु।
चेतना की दृष्टि में
तुम क्षणों को अलग-अलग रंगते हो—
भूत के धूसर,
भविष्य के उजास,
वर्तमान की पतली धड़कन।
पर असल में
ये सब तुम्हारी ही
अविभाज्य उपस्थिति की तरंगें हैं।
पदार्थ और ऊर्जा की आँख में
तुम रूपांतरण के निमित्त हो।
इलेक्ट्रॉनों का नृत्य,
न्यूट्रॉनों का क्षय,
कणों की टक्कर,
तारों का जलना—
ये सब
तुम्हारे मौन साक्षात्कार से ही घटते हैं।
स्पेस की गहराई में
तुम चौथा आयाम बनकर
ब्रह्मांड की रचना की डोर थामे हो।
लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई—
ये सब स्थिर हैं,
पर तुम्हारे बिना
इनमें कोई नाड़ी नहीं,
कोई जीवन नहीं।
तुम्हारा न कोई आरंभ है,
न कोई अंत।
बिग बैंग के विस्फोट से पहले भी
तुम्हारी धुंधली मौन उपस्थिति थी,
और बिग क्रंच की राख के बाद भी
तुम्हारी अनंत छाया रहेगी।
तुम गति नहीं हो,
प्रवाह नहीं हो।
तुम शुद्ध मौन उपस्थिति हो।
एक ऐसी अनंत ज्वाला
जो बुझती नहीं,
बस अनगिनत रूपांतरणों को
संभव बनाती है।
और हम—
जो तुम्हें “समय का प्रवाह” कहकर
भ्रम में जीते रहे,
अब धीरे-धीरे सीख रहे हैं कि
तुम नदी नहीं,
बल्कि महासागर का
अचल गहन अंधकार हो।
कालाणु,
तुम ही वह अग्नि हो
जो चेतना को क्षणों का भ्रम देती है,
और पदार्थ को परिवर्तन का रूप।
तुम ही वह मौन छाया हो
जिसके बिना ब्रह्मांड
सिर्फ स्थिरता का शून्य होता।

