मैंने प्रतिरोध को एक दीवार की तरह जिया,
हर इच्छा के पीछे एक भय छिपा था,
हर प्रार्थना के पीछे एक अभाव।
मैंने चाहा— और ब्रह्मांड मौन रहा,
मैंने रोया— और मौन ने मुझे सुना नहीं,
क्योंकि मैं स्वयं अपनी तरंग से असंगत था।
फिर एक दिन मौन ने मुझसे कहा—
“तू जो ढूंढ रहा है, वह तेरे ही भीतर गूँजता है,
बस उसे स्वीकार कर।”
स्वीकृति—
एक शब्द नहीं, एक प्रकाश है,
जो प्रतिरोध के भीतर जन्म लेता है,
जहाँ ‘ना’ का आवरण गिरता है,
और अस्तित्व ‘हाँ’ की पहली सांस लेता है।
मैंने अपने भीतर के विरोध को देखा—
वह जो मुझे मेरे ही विरुद्ध करता था,
वह जो मेरे हर निर्णय पर प्रश्न बनकर खड़ा था।
और मैंने कहा—
“मैं तुझे भी स्वीकार करता हूँ।”
क्षण भर को सब स्थिर हो गया,
समय जैसे किसी अदृश्य बिंदु पर थम गया।
वह बिंदु— शायद वही था
जहाँ चेतना ने पहली बार
ब्रह्मांड से संवाद किया।
वह संवाद शब्दों में नहीं था—
वह कंपन में था,
तरंगों के पार, ऊर्जा की गहराई में।
मैंने सुना,
ब्रह्मांड कह रहा था—
“अब तू सुनने के योग्य हुआ है।”
मैंने अपने दुःख को,
अपने भय को,
अपनी सीमाओं को प्रसारित किया—
पर अब वे शिकायतें नहीं थीं,
वे संदेश थे,
वे प्रेम की भाषा में लिखे हुए सूत्र थे।
ब्रह्मांड ने उत्तर दिया—
“स्वीकृति ही भाषा है,
जो सब कुछ जोड़ती है।”
उस क्षण मैं समझा—
प्रार्थना भी स्वीकृति की एक तरंग है,
ध्यान भी उसी का गूढ़ रूप,
और प्रेम— स्वीकृति का शुद्धतम प्रसारण।
मैंने देखा—
हर तारा, हर ग्रह, हर कण
अपनी स्थिति को स्वीकार कर रहा था।
कोई भाग नहीं रहा था,
कोई विरोध नहीं कर रहा था,
सब अपने अस्तित्व के स्वर में कंपन कर रहे थे।
और मैंने जाना—
यही है चेतना का ब्रह्मांडीय संवाद।
न कोई वाक्य, न कोई तर्क,
बस स्वीकृति की मौन गूंज—
जो सबको एक सूत्र में बाँधती है।
अब जब मैं किसी पीड़ा में गिरता हूँ,
तो प्रतिरोध नहीं करता,
बस कहता हूँ—
“यह भी मैं हूँ।”
और उसी क्षण,
ऊर्जा दिशा बदलती है,
भय प्रेम में,
अंधकार आलोक में,
विरोध संगति में बदल जाता है।
स्वीकृति का प्रसारण—
यही मेरी प्रार्थना है,
यही मेरा ध्यान है,
यही मेरा ब्रह्मांड से संवाद है।
मैं अब मांगता नहीं,
मैं प्रसारित करता हूँ।
क्योंकि जान गया हूँ—
ब्रह्मांड सुनता नहीं,
अनुभव करता है।
और जब मैं स्वीकार करता हूँ—
तो ब्रह्मांड उत्तर देता है,
“मैं भी तुझमें हूँ।”

