1. टूटी हुई दीवारों के गीत
(क)
दीवार टूटी तो
उसके भीतर से आवाज़ निकली—
वह आवाज़ ईंटों की नहीं थी,
वह सदियों से दबे सपनों की थी।
हर टूटा टुकड़ा
एक अधूरी चीख़ था,
जो अब गीत बनकर गूँजता है।
(ख)
दीवारें कभी घर नहीं होतीं,
वे हमेशा पहरेदार होती हैं।
जब वे टूटती हैं,
तो मनुष्य पहली बार देखता है—
क्षितिज का खुला दरवाज़ा,
जहाँ पक्षी बिना पासपोर्ट उड़ते हैं।
(ग)
टूटी दीवारों पर उगते हैं फूल,
फूलों पर बैठती हैं तितलियाँ,
और तितलियाँ
दीवार का शोक नहीं करतीं—
वे उसे रंगों में बदल देती हैं।
यही गीत है,
मलबे से जन्मा।
—
2. आवाज़ के नीचे आवाज़
(क)
एक आवाज़ है,
जो इतनी धीमी है
कि कानों से नहीं,
रगों से सुनी जाती है।
वह सत्ता से छिपकर
धरती की नसों में गाती है—
वह है आवाज़ के नीचे आवाज़।
(ख)
लाउडस्पीकर पर गूँजता है आदेश,
भीड़ उस आदेश को सुनती है,
पर भीड़ के भीतर,
हर दिल की धड़कन कहती है—
“नहीं।”
वह “नहीं” कभी छपता नहीं,
मगर वही इतिहास का असली गीत है।
(ग)
आवाज़ के नीचे आवाज़
वही है
जो आँखों से आँसू बहाती है,
और शब्दों से नहीं।
वह है मौन का गीत,
जो बिना ध्वनि के भी
दीवारें गिरा देता है।
—
3. अदृश्य जंजीरों का महाकाव्य
(क)
जंजीरें न धातु की हैं,
न लोहे की—
वे ख्यालों में डाली गई हैं।
तुम मुस्कुराते हो,
पर तुम्हारे सपनों तक में
अनुमति की मुहर लगी होती है।
यह वही महाकाव्य है,
जो किसी किताब में नहीं लिखा,
बल्कि हमारी नसों पर खुदा है।
(ख)
अदृश्य जंजीरें
सबसे भयानक होती हैं,
क्योंकि वे दिखाई नहीं देतीं।
तुम सोचते हो—तुम चल रहे हो,
पर तुम्हारे पाँव
एक अदृश्य खूँटी से बंधे हैं।
यह महाकाव्य
हमारे झूठे विश्वासों का इतिहास है।
(ग)
इन जंजीरों को तोड़ने के लिए
हथौड़े की ज़रूरत नहीं,
सिर्फ़ एक “सवाल” काफी है।
क्योंकि सवाल
धातु से ज़्यादा धारदार होता है।
यही अदृश्य जंजीरों का रहस्य है—
वे नज़र नहीं आतीं,
पर जवाब उन्हें घुला देता है।
4. मनुष्य के छिपे हुए चेहरे
(क)
हर आदमी
एक मुखौटे के भीतर छिपा है।
उसका असली चेहरा
इतना गुप्त है
कि कभी-कभी वह खुद भी नहीं जानता।
पर जब प्रेम या विद्रोह जागता है—
वह चेहरा
बिजली की तरह चमकता है।
(ख)
सत्ता वही चाहती है
कि सभी चेहरे
एक जैसे दिखें।
मगर हर मनुष्य
अपने भीतर
एक अज्ञात जंगल लिए है।
उस जंगल में छिपे चेहरे
कभी पालतू नहीं बन सकते।
(ग)
छिपा हुआ चेहरा
वह है,
जो मृत्यु के बाद भी
फोटो में मुस्कुराता है।
जो इतिहास की धूल से झाँककर
भविष्य को आँख मारता है।
मनुष्य कभी
सिर्फ़ वही नहीं होता
जो दिखाई देता है।
5. भ्रमित रोशनी और छिपी आग
(क)
भ्रमित रोशनी
वही है
जो हमें यक़ीन दिलाती है
कि हम आज़ाद हैं।
पर भीतर ही भीतर
एक आग है,
जो कहती है—
“तुम कैद हो।”
यह आग ही
आज़ादी की असली चिंगारी है।
(ख)
भ्रमित रोशनी
सड़क पर लगे नियॉन बोर्ड हैं,
जो सपनों का विज्ञापन करते हैं।
छिपी आग
उन मजदूरों की है
जो उस बोर्ड के नीचे
पसीना बहाते हैं।
इतिहास हमेशा
रोशनी से नहीं,
आग से लिखा जाता है।
(ग)
भ्रमित रोशनी
तुम्हें आँखें चकाचौंध कर देती है,
ताकि तुम देख न सको।
छिपी आग
तुम्हारे सीने में धड़कती है,
ताकि तुम भूल न सको।
जब यह आग फूटेगी,
तो रोशनी की परछाई
खुद जलकर ख़ाक हो जाएगी।