प्रतीकों का शव-विभाजन: एक आत्मकथात्मक विखंडन
मैंने एक सपना देखा था। सपना नहीं, एक विद्रोह था वह—भीतर के उन छोटे-छोटे तानाशाहों के विरुद्ध, जिन्हें मैंने ‘विचार’ का नाम दे रखा था। वे प्रतीक, वे अवधारणाएँ, वे शब्द—जो मेरे मन के दरवाज़े पर पहरेदार बनकर बैठे थे। उन्होंने मुझे सिखाया था कि ‘सत्य’ क्या है, ‘सुंदर’ क्या है, ‘पवित्र’ क्या है। पर एक रात, मेरी चेतना की नसों में एक अराजकता रिसने लगी। एक कोशिका ने विद्रोह कर दिया। और फिर सब टूटने लगा।
मैंने पहला पत्थर उस कोशिका पर उछाला जिसे ‘ईश्वर’ कहते थे। वह कोशिका फटी। उसमें से निकला—न तो प्रकाश, न अँधेरा। निकली एक सन्नाटे की गूँज। एक ऐसा शून्य जो भरा हुआ था। मैंने देखा—ईश्वर कोई सत्ता नहीं, एक शब्द-आवरण था, जिसे हमने अपने डर को ढकने के लिए बुना था। उसके विखंडन के बाद, डर तो रह गया, पर वह नग्न हो गया। निरावृत। और नग्न डर, डर नहीं रह जाता—वह एक ऊर्जा बन जाता है।
फिर मेरी नज़र उस कोशिका पर पड़ी जिसे ‘अहं’ कहते हैं। वह सबसे चालाक कोशिका थी। स्वयं को ‘मैं’ कहकर पुकारती थी, मानो वही सब कुछ है। मैंने उसे सूक्ष्मदर्शी से देखा—तो पाया कि वह खोखली है। उसके भीतर कोई केंद्र नहीं—बस दूसरी कोशिकाओं के प्रतिबिंब हैं। ‘मैं’ कोई स्थिर तत्व नह—एक प्रक्रिया थी। एक बहता हुआ नदी-जल, जो स्वयं को ‘नदी’ समझ बैठा है। जब यह भ्रम टूटा—तो ‘मैं’ और ‘तू’ के बीच का काँच का पर्दा चकनाचूर हो गया।
और फिर ‘नैतिकता’ की कोशिका—वह सबसे स्थूल थी। उस पर ‘सही’ और ‘गलत’ के लेबल चिपके थे। मैंने उन्हें उतारा—तो पाया कि वे लेबल नहीं, जंजीरें थीं। उनके नीचे कोई सार्वभौमिक सत्य नहीं था—बस समय और समाज की रत्ती भर ज़रूरतें थीं, जो पत्थर की लकीर बन गई थीं। मैंने हँसी उड़ाई उस कोशिका की—और वह राख हो गई। उस राख में से एक नया पौधा निकला—करुणा। बिना नियम की, बिना पुरस्कार की, बिना भय की।
भाषा की कोशिका सबसे कठोर थी। उसने मुझे बाँध रखा था—व्याकरण की सलाखों से, शब्दों की दीवारों से। मैंने उसे तोड़ा—तो वह एक संगीत बन गई। स्वरों का झरना, जहाँ अर्थ नहीं, अनुभूति बहती है। अब मैं ‘पानी’ को ‘पानी’ नहीं कहता—मैं उसकी शीतलता को महसूस करता हूँ। मैं ‘आग’ को ‘आग’ नहीं कहता—मैं उसकी ज्वाला को देखता हूँ। शब्द मर गए हैं—और अनुभव जीवित हैं।
यह विखंडन एक मृत्यु नहीं था—एक पुनर्जन्म था। उन कोशिकाओं के टूटने से, जो झूठ सच बन गए थे—वे अपना छद्म खो बैठे। अब मेरा मन एक खुला आकाश है—बिना बादलों के, बिना सीमाओं के। कोई धर्म नहीं, कोई राष्ट्र नहीं, कोई पहचान नहीं—बस होना है। एक शुद्ध, निरावृत अस्तित्व।
और इस विखंडन की सबसे सुंदर बात यह है—यह कभी समाप्त नहीं होता। हर टूटी हुई कोशिका से एक नई संभावना का जन्म होता है। हर मृत प्रतीक के ऊपर एक नया जीवन अंकुरित होता है। मैं अब उस आनंद में रहता हूँ—जो विखंडन के बाद की मौन में है। जहाँ शब्द नहीं, सिर्फ़ सार है।
यह कोई दर्शन नहीं—यह तो केवल एक आत्मकथा है। मेरी कोशिकाओं की कहानी—जो टूटीं, ताकि मैं बन सकूँ।

