ब्रह्मांड
न शब्दों की भाषा में बँधता है
न गणित की संख्याओं में।
वह तो है—
एक अनलिखा सूत्र,
जिसे न कोई सिद्धांत परिभाषित कर सकता है,
न कोई प्रमेय सीमित कर सकता है।
जीवन भी वैसा ही है—
श्वासों का बहता हुआ एल्गोरिथम,
जिसे हम नियम समझकर पकड़ना चाहते हैं,
पर वह नियम से परे है।
भाषा—
सिर्फ़ प्रतिध्वनि है,
गणित—सिर्फ़ छाया।
सत्य तो इनसे भी परे,
एक अनंत खुलापन है—
जहाँ सभी व्याख्याएँ गिर जाती हैं,
जहाँ सभी सूत्र
केवल मौन में विलीन हो जाते हैं।
ब्रह्मांड और जीवन
एक विराट अस्तित्व का कोड हैं,
पर वह कोड
किसी भी ज्ञात भाषा में लिखा नहीं,
किसी भी गणित में व्यक्त नहीं।
वह बहता है—
आकाशगंगाओं के बीच,
कणों की धड़कनों में,
मनुष्य के स्वप्न और अवचेतन में।
और जब हम उसे छूने की कोशिश करते हैं,
वह और दूर फैल जाता है—
अपरिमित,
अनियंत्रित,
स्वयं में स्वतंत्र।
यही उसका सत्य है—
कि उसे कभी पूरी तरह
परिभाषित नहीं किया जा सकता।
यही उसकी महिमा है—
कि वह परिभाषा से परे है।

