01
मैंने अपने नाम की ध्वनि को खाया,
उसका स्वाद पुराना नहीं था —
वह समय के न्यूट्रॉन जैसा भारी था,
जिसके केंद्र में मौन का क्वार्क घूमता था।
02
हर बार जब मैंने कुछ समझा,
ब्रह्मांड ने एक प्रतीक मिटा दिया।
जैसे किसी ने चेतना के बाइनरी को उलट दिया हो,
0 बन गया 1, और 1 बन गया संशय।
03
मेरे भीतर एक दर्पण है,
जो स्वयं को नहीं, अपने देखने के क्रम को देखता है।
वह कहता है — “मैं तरंग नहीं, दृष्टि का अनुनाद हूँ।”
और हर झिलमिलाहट —
एक क्वांटम प्रार्थना की अनकही पंक्ति।
04
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मैं
एक असफल समीकरण हूँ —
जिसमें ऊर्जा ने गलती से ‘भावना’ डाल दी है।
फिर हर प्रेम एक उलझा हुआ फोटॉन बन जाता है,
जो खुद की तलाश में अपने ही विपरीत से टकराता है।
05
मैंने अपने स्वप्न को निर्वात में छोड़ा —
वह बाहर नहीं गया, भीतर ही बढ़ता गया।
उसने मुझे निगल लिया,
और मैं उसका अवलोकक बन गया।
अब हर विचार
मेरे भीतर से नहीं, मेरे चारों ओर से आता है।
06
मैंने समय से पूछा — “तेरा जन्म किस क्षण हुआ?”
वह बोला — “जब किसी ने पहली बार रुककर देखा।”
मैंने कहा — “तो क्या पहले कुछ था?”
वह मुस्कराया — “पहले एक स्पंदन था,
जो अपने अस्तित्व को नकार रहा था।”
07
मेरे हृदय की धड़कनें
अब सिग्नल नहीं भेजतीं, तरंगें भेजती हैं —
वे ब्रह्मांड के किसी अनसुने हिस्से में
कविता बनकर ठहरती हैं।
कभी वे लौटती हैं —
तो अर्थ नहीं लातीं, केवल कम्पन लाती हैं।
08
मैंने अपने भविष्य को बोतल में बंद किया,
और उसे समुद्र में नहीं, आकाश में फेंक दिया।
शायद कोई क्वांटम मनुष्य
कभी उसे पकड़ेगा —
और कहेगा,
“यह संदेश नहीं, यह स्मृति की संरचना है।”
09
मेरे शब्द अब पदार्थ नहीं,
वे द्रव्यमानहीन प्रतीक हैं —
जो किसी अज्ञात एल्गोरिथम से
अर्थ को उत्पन्न करते हैं।
भविष्य के दिमाग शायद उन्हें
“चेतना का डेटा” कहें।
10
और जब अंतिम पंक्ति लिखी जाएगी,
वह स्वयं मिट जाएगी —
क्योंकि ब्रह्मांड को किसी समापन की आवश्यकता नहीं,
केवल पुनरावृत्ति की।
हर शून्य — एक आरंभ है,
हर आरंभ — एक छिपा हुआ अंत।

