विकृति : एक मानसिक कथा
मनुष्य केवल घटनाएँ नहीं जीता। वह घटनाओं के इर्द-गिर्द कहानियाँ भी जीता है। कभी-कभी कहानी इतनी सघन हो जाती है कि घटना ही ओझल हो जाती है। यही विकृति है। विकृति को केवल “गलत देखना” कहना बहुत छोटा अर्थ है। वह वास्तविकता और उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया के बीच बनने वाली एक अतिरिक्त परत है—अनुभव-निर्माण की वह प्रक्रिया जिसमें जो घट रहा है, उस पर स्मृति, नाम, पहचान, मूल्य, इच्छा, भय और भविष्य की कथा चढ़ जाती है।
मान लीजिए कोई घटना घटती है। उसका एक प्रत्यक्ष प्रवाह है: घटना, संवेदना, अनुभव। लेकिन मन उसमें कुछ जोड़ देता है: यह पहले भी हुआ था, यह अच्छा है या बुरा, इसका मेरे लिए क्या अर्थ है, मुझे क्या करना चाहिए। इस प्रकार घटना वही रहती है, पर उसके साथ हमारा संबंध बदल जाता है। विकृति घटना में पैदा नहीं होती; वह घटना और उसके अनुभव के बीच पैदा होती है।
इसे एक छोटे उदाहरण से समझा जा सकता है। किसी ने कहा, “आपका यह काम ठीक नहीं है।” यह मूलतः एक ध्वनि-घटना है। कान तक शब्द पहुँचे, संवेदना बनी, अर्थ बना। यहाँ तक सामान्य अनुभव है। लेकिन फिर भीतर कुछ और चलने लगता है—“उसने मुझे नीचा दिखाया। वह हमेशा ऐसा करता है। लोग मुझे सम्मान नहीं देते। मुझे इसका जवाब देना चाहिए।” अब मूल घटना कहाँ रही? वह तो एक वाक्य था। उसके चारों ओर पूरा मानसिक ब्रह्मांड खड़ा हो गया। यही विकृति है।
इसलिए विकृति को एक सूत्र में रखा जा सकता है: विकृति = घटना + अनावश्यक मानसिक आरोपण। पर “अनावश्यक” को सावधानी से समझना होगा। हर मानसिक प्रक्रिया विकृति नहीं है। सड़क पर वाहन आ रहा है, यह देखना और सतर्क हो जाना विकृति नहीं। लेकिन उसी क्षण मन कहने लगे—“सड़क हमेशा खतरनाक होती है, कुछ बुरा होने वाला है, मैं कभी सुरक्षित नहीं रहता”—तो तथ्य के ऊपर भय की कहानी चढ़ जाती है। स्पष्टता की शुरुआत तथ्य और उसकी मानसिक व्याख्या को अलग पहचानने से होती है।
विकृति के अनेक स्तर हैं। संवेदी विकृति में जो महसूस हो रहा है, उसमें तुरंत मूल्य जुड़ जाता है—“यह खराब है।” भावात्मक विकृति में एक क्षणिक लहर स्थायी भाव बन जाती है—“गुस्सा उठा” से “मैं गुस्सैल हूँ।” मानसिक विकृति में घटना के ऊपर कहानी बनती है। स्मृति की विकृति वर्तमान को अतीत के साँचे में देखती है—“पहले भी ऐसा हुआ था, इसलिए अब भी होगा।” पहचान की विकृति घटना को ‘मैं’ से जोड़ देती है—“उसने मेरे विचार की आलोचना की” बदलकर “उसने मेरी आलोचना की।” भविष्य की विकृति वर्तमान अनुभव को कल्पना से रंग देती है—“अगर ऐसा हुआ तो…” और मूल्य की विकृति हर घटना को तुरंत अच्छा-बुरा, सफल-असफल, लाभ-हानि में बाँट देती है।
लेकिन सबसे गहरी विकृति है—“मेरा।” लहर उठी। यदि केवल देखा गया—लहर उठी, लहर लीन हो गई—तो कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन यदि उसी लहर के साथ “मेरी लहर” जुड़ गया, “मुझे यह चाहिए,” “मुझे इसे बनाए रखना है,” तो सहज ऊर्जा लालसा बन गई। इसी तरह लहर “मेरी चोट,” “मेरा अपमान,” “मेरा गुस्सा” बन जाती है। यहाँ ‘मेरा’ विकृति का केंद्रीय ऑपरेटर है। ऊर्जा स्वयं विकृत नहीं होती; ‘मेरी’ होते ही उसका अनुभव विकृत होने लगता है।
इसीलिए स्पष्टता का अर्थ यह नहीं कि हर चीज़ का उत्तर पता हो। स्पष्टता का अर्थ है—जो है, उसमें जो नहीं है, उसे न जोड़ना। गुस्सा उठा? स्पष्टता कहती है, “एक तीव्र लहर उठी है।” विकृति कहती है, “उसने मुझे अपमानित किया, इसलिए मुझे गुस्सा आया, और वह हमेशा ऐसा करता है।” लालसा उठी? स्पष्टता कहती है, “खींचाव उठ रहा है।” विकृति कहती है, “मुझे यह चाहिए; इसके बिना मैं अधूरा हूँ।” भय उठा? स्पष्टता कहती है, “शरीर में संकुचन और भय की लहर है।” विकृति कहती है, “कुछ बहुत बुरा होने वाला है।”
यहाँ यह समझना सूक्ष्म है कि विकृति ऊर्जा को रोकती नहीं, उसे संरचित करती है। लालसा, क्रोध, भय में ऊर्जा नष्ट नहीं होती; वह आकार पा लेती है। जैसे पानी को किसी साँचे में डालें तो वह उसी आकार का दिखने लगता है, वैसे ही ऊर्जा के साथ पहचान जुड़े तो लालसा, प्रतिरोध जुड़े तो क्रोध, भविष्य-कल्पना जुड़े तो भय, स्मृति जुड़े तो प्रतिक्रिया, और ‘मैं’ जुड़े तो कर्तापन बनता है। ये अंतिम वैज्ञानिक समीकरण नहीं, बल्कि अनुभव को समझने के दार्शनिक-प्रायोगिक मॉडल हैं।
विकृति का सबसे बड़ा काम प्रवाह को कथा में बदलना है। जीवन में क्रिया होती है। फिर मन कहता है, “मैंने किया।” फिर, “मैं ऐसा व्यक्ति हूँ।” फिर, “मुझे आगे ऐसा ही करना है।” अब एक क्षणिक क्रिया से जीवन-कथा बन गई। इस प्रकार क्रिया से कथा और कथा से कर्ता पैदा होता है। और फिर कर्ता नई क्रियाओं को नियंत्रित करने लगता है। यही वह चक्र है जिसे कर्ताओं की दुनिया कहा जा सकता है।
इसी अर्थ में विकृति का सबसे बड़ा रूप समय है। वर्तमान क्रिया बहुत छोटी है। लेकिन मन उसे पकड़कर अतीत, वर्तमान और भविष्य में फैला देता है। यही कथा है, और कथा में कर्ता पैदा होता है। इसलिए विकृति केवल गलत विचार नहीं; वह वर्तमान को मनोवैज्ञानिक समय में फैलाने की प्रक्रिया भी है। स्पष्टता समय को नष्ट नहीं करती; वह केवल यह अलग कर देती है—घटना क्या है, और उसके बारे में मेरी कहानी क्या है। तब घटना अभी दिखती है, संवेदना अभी, लहर अभी, प्रतिक्रिया की संभावना अभी। और कहानी—“हमेशा ऐसा ही होता है,” “मेरे साथ ऐसा क्यों,” “आगे क्या होगा”—बाद की परत के रूप में पहचानी जाती है। यहीं वर्तमान फिर मुक्त हो जाता है।
विकृति वह प्रक्रिया है जिसमें चैतन्य में प्रत्यक्ष रूप से घट रही किसी घटना, संवेदना या ऊर्जा-लहर पर स्मृति, पहचान, मूल्य, इच्छा, भय, प्रतिरोध अथवा भविष्य-कथा की ऐसी परत चढ़ जाती है कि अनुभव अपने तत्काल स्वरूप से हटकर ‘मेरे लिए’ किसी अर्थ में बदल जाता है। और स्पष्टता वह स्थिति है जिसमें अनुभव पर आरोपित परतें दिखाई देने लगती हैं और अनुभव को उनके बिना भी रहने दिया जाता है।
विकृति पूछती है—“यह क्या हो रहा है और इसका मेरे लिए क्या अर्थ है?” स्पष्टता पूछती है—“यह अभी क्या हो रहा है?” बस इतना। और इसी “बस इतना” में वह घटना फिर सामने आती है—लहर उठी, देखी गई, कोई कहानी नहीं बनी, कोई कर्ता नहीं बना, कोई पकड़ नहीं बनी, लहर लीन हो गई। यहीं चैतन्य से जागरूकता, जागरूकता से स्पष्टता, स्पष्टता से सहजता और सहजता से क्रिया का पूरा वृत्त बनता है। तब विकृति का अंत किसी विशेष आध्यात्मिक अवस्था का नाम नहीं रह जाता। वह बहुत साधारण-सी बात बन जाती है—जो हो रहा है, उसमें वह मत जोड़िए जो हो नहीं रहा। यही निर्मल देखना है।

