उत्सव के नीचे दबा हुआ राष्ट्र
धीरे-धीरे
इस देश में
उत्सव मनाए नहीं जाने लगे—
प्रसारित किए जाने लगे।
दीयों की लौ से अधिक
कैमरों की चमक ज़रूरी हो गई।
मंदिरों से ऊँची
एलईडी स्क्रीनें खड़ी हो गईं,
जहाँ देवता नहीं,
प्रायोजक चमकते थे।
और लोग
पहली बार
अपनी ही खुशी को
लाइव टेलीकास्ट में देखने लगे।
पहले उत्सव
थके हुए जीवन की साँस होते थे।
फसल कटती थी,
तो गीत निकलते थे।
बारिश आती थी,
तो बच्चे मिट्टी में कूद पड़ते थे।
अब
बारिश आने से पहले
हैशटैग तय होते हैं।
और गीत—
वे एल्गोरिद्म लिखते हैं।
इस राष्ट्र में
धीरे-धीरे
प्रदर्शन ही संस्कृति बन गया।
गरीब आदमी
भूखा होने से अधिक
देशभक्त दिखने लगा।
अमीर आदमी
दान देने से अधिक
दान करते हुए दिखने लगा।
नेता
काम करने से अधिक
काम का उद्घाटन करने लगे।
और जनता—
वह जीने से अधिक
जीते हुए दिखने लगी।
एक समय था
जब शोक निजी होता था।
अब मृत्यु भी
कैमरे के कोण तलाशती है।
कंधों पर शव कम,
मोबाइल अधिक होते हैं।
लोग रोते कम हैं,
रोते हुए दिखाई अधिक देते हैं।
मानो मनुष्य की संवेदना नहीं,
उसका प्रसारण महत्वपूर्ण हो गया हो।
इस देश में
अब उत्सव का अर्थ
आनंद नहीं रहा।
उत्सव का अर्थ है—
इतना शोर पैदा कर दो
कि प्रश्नों की आवाज़ सुनाई न दे।
ढोल इतने बजाओ
कि बेरोज़गारी की खामोशी दब जाए।
पटाखे इतने छोड़ो
कि भूख की आँतों की आवाज़
आकाश तक न पहुँच सके।
झंडे इतने ऊँचे लहराओ
कि टूटती हुई स्कूलों की छतें
दिखाई ही न दें।
और यह सब
इतना सुंदर बनाया गया
कि लोग
अपनी ही त्रासदी पर ताली बजाने लगे।
उन्होंने रोटी खोई—
उन्हें आयोजन मिला।
उन्होंने काम खोया—
उन्हें नारे मिले।
उन्होंने भविष्य खोया—
उन्हें विशाल मंच मिले
जहाँ रोशनी बहुत थी
पर दिशा कहीं नहीं।
धीरे-धीरे
पूरा राष्ट्र
एक स्थायी मंच में बदल गया।
संसद
स्टूडियो लगने लगी।
समाचार
नाटक।
विचार
स्क्रिप्ट।
और नागरिक—
दर्शक।
जिन्हें हर रात
नया एपिसोड चाहिए था।
भले ही
उनकी अपनी जिंदगी
अंदर ही अंदर
खंडहर बनती जा रही हो।
सबसे भयानक दृश्य तब था
जब किसान आत्महत्या कर रहा था
और उसी समय
शहर में ड्रोन शो चल रहा था।
आकाश में
रंगों से राष्ट्र बन रहा था,
धरती पर
मनुष्य मिट रहा था।
पर कैमरों की दिशा
हमेशा ऊपर थी।
एक बच्चा
अपने पिता से पूछता है—
“क्या उत्सव हमेशा इतने बड़े होते थे?”
पिता कुछ देर चुप रहता है।
फिर कहता है—
“नहीं बेटा,
पहले उत्सव छोटे होते थे
और जीवन बड़ा।
अब उत्सव बहुत बड़े हो गए हैं
और जीवन
धीरे-धीरे
उनके नीचे दब गया है।”
इतिहास जब
इस समय को पढ़ेगा
तो शायद लिखेगा—
“वे लोग दुखी थे,
पर लगातार जश्न मना रहे थे।”
और यह
किसी भी सभ्यता की
सबसे खतरनाक अवस्था होती है।
क्योंकि जब राष्ट्र
अपने घावों को सजावट से ढकने लगे,
तब विनाश
उत्सव की पोशाक पहनकर आता है।

